सनाई ग़ज़्नवी-4
डाक्टर शफ़ीई कदकनी का मानना है कि जब फ़ारसी साहित्य के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि सनाई से पहले के शेर और सनाई के बाद से शेरों को पढ़ा जाता है तो जो सनाई को जानता है वह दोनों शेरों में अंतर की गहराई को भलिभांति समझता है और साअदी, हाफ़िज़ और मौलवी जैसे महान ईरानी शायरों में से किसी ने भी फ़ारसी शेर के इतिहास में इस प्रकार का दौर उत्पन्न नहीं किया।
डाक्टर मोहम्मद रज़ा शफ़ीई कदकनी का यह वक्तव्य अबुल मज्द मजदूद बिन आदम सनाई ग़ज़्नवी के उच्च स्थान को बयान करने वाला है। अबुल मज्द मजदूद बिन आदम सनाई ग़ज़्नवी शायर, हकीम और महान ईरानी परिज्ञानी का जन्म आठ मई ११३१ को ग़ज़्ने नगर में हुआ था और उसी नगर में उनका निधन हुआ।
यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि उस समय ग़ज़्ने नगर ईरान का भाग था जबकि इस समय वह अफ़ग़ानिस्तान का एक नगर है। सनाई का बचपना और जवानी दोनों ग़ज़्ने नगर में गुज़रे। उन्होंने ग़ज़्ने नगर में इस्लामी ज्ञान अर्जित करना आरंभ किया और धर्मशास्त्र, हदीस, पवित्र क़ुरआन की व्याख्या, चिकित्सा, ख़गोलशास्त्र आदि विषयों में दक्ष हो गये यहां तक कि उनकी एक रचना से उनके इस स्थान को समझा जा सकता है।
सनाई का कुटुम्ब ग़ज़्ने में अस्ल ईरानी था और उनके पिता एक शिक्षित व ज्ञानी व्यक्ति थे। सनाई की रचना से इस बात का भी पता लगाया जा सकता है। सनाई के पिता बच्चों की शिक्षा- प्रशिक्षा में अपने समय के प्रतिष्ठित व गणमान्य लोगों में थे। सनाई ने इस प्रकार के परिवार में और ग़ज़्ने नगर के वातावरण में ज्ञान अर्जित करना आरंभ किया। उल्लेखनीय है कि उस समय ग़ज़्ने नगर को ज्ञान का केन्द्र समझा जाता था। उन्होंने जवानी में ही वह सारी क्षमताएं व योग्यताएं पैदा कर ली थीं जो एक दरबारी शायर के लिए ज़रूरी समझी जाती थी। धर्म की महत्वपूर्ण शाखाओं के ज्ञान और स्वभाव के अनुसार शायरी ने उन्हें जवानी के शुरु में ही साहित्यकारों व विद्वानों की महफ़िल में उठने- बैठने का मौक़ा दिलाया।
सनाई ने अपनी उम्र सफ़र में गुज़ारी। उन्होंने बल्ख़, सरख़्स, हेरात और नेशापूर सहित ख़ुरासान के दूसरे शहरों का सफ़र किया था और इन शहरों की यात्रा के दौरान मोहम्मद बिन मंसूर सरख़्सी सहित अपने काल के मशहूर विद्वानों व आत्मज्ञानियों की संगत से लाभ उठाया।
सनाई की शायरी का एक भाग शासकों की तारीफ़ पर आधारित है। वे विभिन्न शासकों के दरबार में रहकर उनकी तारीफ़ में शेर कहते थे और अपने समय के दूसरे शायरों की तरह सुख- सुविधा से संपन्न ज़िन्दगी गुज़ारते थे। इस तरह उनकी शायरी जारी रही यहां तक कि उन्होंने पवित्र काबे का दर्शन करने अर्थात हज का इरादा किया और बल्ख़ से मक्का के लिए निकल पड़े। उनकी शायरी की समीक्षा करने वालों का मानना है कि मक्के के दर्शन के वक़्त उनके मन में दूसरे विचार पैदा हुए। समकालीन इतिहासकार, लेखक व शोधकर्ता डाक्टर ज़बीहुल्लाह सफ़ा के अनुसार, लालच की ज़न्जीरों से उन्हें मुक्ति मिली और महान ईश्वर की आध्यात्मिक सुन्दरता ने उन्हें अपनी ओर सम्मोहित कर लिया। इस तरह उन्होंने दुनिया वालों से अपेक्षा छोड़ दी और एक समृद्ध शायर बन गए।
जिस समय सनाई पवित्र नगर मक्का से बल्ख़ लौट रहे थे, उनके विचारों में बहुत बड़ी क्रान्ति आयी। उन्होंने दरबारी शायरी से मुंह मोड़ लिया और संतों जैसा जीवन गुज़ारना आरंभ कर दिया। यह चीज़ उनके शेरों से भलिभांति झलकती है। उनके बहुत से शेर धार्मिक रुझान पर आधारित हैं। पवित्र नगर मक्के से लौटने के बाद बल्ख़ में कहे गए ये शेर उन्हें उनके समकालीन प्रतिष्ठित शायरों पर वरीयता दिलाते हैं।
सनाई बहुत अधिक यात्रा और आध्यात्मिक परिवर्तन के बाद कुछ समय के बाद ग़ज़्ने लौट आये और उन्होंने एकांत को चुना और नैतिक एवं परिज्ञान के संबंध में शेरों को एकत्रित करना आरंभ किया। क़सीदों और ग़ज़लों पर आधारित उनके १४ हज़ार शेरों का दीवान है। इन शेरों के अतिरिक्त उनके कुछ दूसरे शेर भी हैं जिन्हें उन्होंने यादगार के रूप में छोड़ा है।
तुर्क अध्ययनकर्ता प्रोफेसर अहमद आतश का सनाई की रचनाओं के बारे में मानना है कि सनाई ने अपने दीवान को एकत्रित किया है और बाद में शायद अहमद बिन मसऊद तीशा के कहने पर उसमें कुछ परिवर्तन किया है। इसी प्रकार उन्होंने एक अन्य पध संकलन भी एकत्रित किया है और उसे अंतिम रूप देने से पहले सनाई का निधन हो गया। इस आधार पर सनाई के मित्रों और शिष्यों ने उनके अधूरे कार्य को पूरा किया। सनाई के पुराने और नये दीवान में स्पष्ट अंतर को इस प्रकार बयान किया जा सकता है। सनाई का जो पुराना दीवान है उसमें कुछ ऐसे शेर हैं जो नये दीवान में मौजूद नहीं हैं।
हदीक़तुल हक़ीक़त, सैरुल एबाद एलल माअद और कारनामये बल्ख़ आदि सनाई की कुछ रचनाएं हैं। सनाई का जो प्राचीन पध संकलन था उसमें बयान की गयी बातों को विषयों के आधार पर विभाजित किया गया था और कवियों की कुछ जीवनी लिखने वालों का मानना है कि सनाई के दीवान में तीस हज़ार शेर थे। वर्तमान समय में मुदर्रिस रिज़वी ने जिन्होंने दीवान को सही की किताब १३७८० शेर हैं। साथ ही सनाई के इस समय के दीवान में और तेहरान विश्व विद्यालय के डाक्टर मुसफ्फा ने जिस दीवान को छपवाया है उसमें कुछ अधिक शेर हैं जबकि ये शेर उस दीवान व पधसंक्लन में मौजूद नहीं हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे स्वयं सनाई ने लिखा है। उदाहरण स्वरूप सनाई के पधसंक्लन में १३७ क़सीदे, २०६ ग़ज़लें और ४४३ चौपाई है परंतु दूसरे प्रकाशन में ३०० से अधिक क़सीदे,४०८ ग़ज़लें और ५३७ चौपाई है। भारत और लंदरा में हाथ से लिखे हुए जो दीवान मौजूद हैं उसमें वे शेर नहीं हैं जो दूसरे प्रकाशन में मौजूद हैं।
“कारनामये बल्ख़” सनाई की मसनवी की छोटी सी किताब है और इसे केवल “कारनामा” भी कहा जाता है और इसमें ४९७ शेर हैं। सनाई की रचनाओं में सुधार करने वालों का मानना है कि यह सनाई की जीवनी का अनुवाद है और इस दृष्टि से वे इसे विशेष महत्व देते हैं।
दिवंगत उस्ताद मुदर्रिस रिज़वी ने सनाई के कारनामे को सही किया और उसे छपवाया। यह किबात शब्द और अर्थ की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। कारनामा उस किताब को कहा जाता है जो महत्वपूर्ण कार्य की सूचक हो। उदारहण स्वरूप कारनामा अर्दशीर पायकान।
सनाई की किताब को भी कारनामा इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसमें कुछ महान हस्तियों के कार्यों के बारे में बहस की गयी है। उसे मताइबे नामा भी कहा जाता है। सनाई के जीवन के बारे में जानने के लिए कारनाम बल्ख़ बेहतरीन किताब हो सकती है। क्योंकि सनाई ने लगभग ५०० शेरों में अपने, अपने पिता और अपने समय के कुछ लोगों के जीवन के कुछ पहलुओं की ओर संकेत किया है। इसलिए जो लोग सनाई के बारे में अध्ययन व शोध करना चाहते हैं उनके लिए यह किताब बेहतरीन स्रोत हो सकती है।
सनाई की एक किताब “हदीक़तुल हक़ीक़ा व तरीक़ुश्शरीया” है। इस किताब को एलाही नामा के नाम से भी जाना जाता है। इस किताब में सनाई ने महान ईश्वर और पैग़म्बरे इस्लाम की प्रशंसा में शेर कहे हैं। इस किताब में सनाई ने अपने विश्वासों व आस्थाओं को बयान करने के लिए बहुत अच्छी और रोचक कहानियों से लाभ उठाया है। अब तक इस किताब की बहुत सी व्याख्यायें लिखी जा चुकी हैं और नेज़ामी और ख़ाक़ानी जैसे बड़े शायरों ने शेर कहने में उससे लाभ उठाया है। मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी ने इस किताब को बहुत पसंद किया है और उसके समस्त महत्वपूर्ण विषयों का उल्लेख अपनी मसनवी में किया है। हदीक़तुल हक़ीक़ा की सबसे अच्छी व सही प्रति वह है जिसमें उस्ताद मुदर्रिस रिज़वी ने सुधार किया है।
सैरुल एबाद एलल माअद भी सनाई की एक अन्य किताब है। इस किताब में आध्यात्मिक बातों को बहुत ही सुन्दर भाषा में बयान किया गया है। बहुत से अध्ययन कर्ताओं के अनुसार परिज्ञान के संबंध में फार्सी भाषा में सनाई की यह सबसे प्रसिद्ध किताब है। इसके अलावा अक़्ल नामा, इश्क़ नामा, तरीक़ुत्तहक़ीक़ आदि किताबों को भी सनाई की किताब बताया गया है कि अध्ययनकर्ताओं और शैली की पहचान करने वाले विशेषज्ञों की दृष्टि से इस दावे की सच्चाई में संदेह है।
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