नासिर ख़ुसरो-1
जैसा कि आपको यह बताया था कि नासिर ख़ुसरो चूंकि इस्माइली रुझान रखते थे, इसलिए उन्होंने दरबारी सेवा से हटने का फ़ैसला लिया और अपनी उम्र अपने विचारों के प्रचार-प्रसार में गुज़ार दी।
इस तरह उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी 15 साल मूल्यवान किताब लिखने में बिताये। नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी का पद्य संकलन अपने विचारों और साहित्यिक शैली की नज़र से अपने आप में अनूठा है। नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी फ़ारसी भाषा के उन दक्ष शायरों और लेखकों में हैं जिन्होंने न सिर्फ़ समर्थकों बल्कि पर्यवेक्षकों के ध्यान को भी अपनी ओर खींचा है।
हालांकि नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी अपनी ज़िन्दगी में उपेक्षा का शिकार रहे लेकिन दुनिया के बुद्धिजीवियों की नज़र में उन्हें विशेष स्थान हासिल रहा है। रूसी शोधकर्ता आंद्रे यूगिनोविच बर्टेल्स नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के शेरों के बारे में कहते हैं, “ नैतिकता व नसीहत पर आधारित उनके शेर ईरान और ताजिकिस्तान में पाठ्यक्रम में शामिल किए गए हैं। ईरानी प्रिंट मीडिया नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी की रचनाओं में बहुत ज़्यादा रूचि लेता है। उनकी किताबे पूरब और पश्चिम में हर दिन अधिक से अधिक लोकप्रिय होती जा रही हैं जिससे उनकी रचनाओं के अध्ययन की ज़रूरत का पहले से ज़्यादा आभास किया जा रहा है।
नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के बारे में आर्बरी कहते हैं, “नासिर ख़ुसरो से पहले के कवि राजाओं और शहज़ादों की तारीफ़ में शेर कहते थे लेकिन नासिर ख़ुसरो के शेर ईश्वर की अनंतः और महानता, धर्म की अहमियत, सदाचारिता, सुचरित्रता, भले कर्म और ज्ञान की प्रशंसा पर आधारित हैं।”
अल्लामा क़ज़्वीनी ने भी उन्हें बहुत बड़ा कवि बताया है और उनका मानना है कि नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी की पूरी रचना ज्ञान और अध्यात्म से भरी हुयी है।
ईरानी साहित्य के शोधकर्ता, डाक्टर ज़बीहुल्लाह सफ़ा नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के शेरों की विशेषताओं के बारे में कहते हैं, “नासिर ख़ुसरो फ़ारसी शायरी के बहुत बड़े शायर हैं। उन चीज़ों पर ध्यान नहीं देते जिसकी ओर आम तौर से शायर आकर्षित होते हैं। उनकी निगाह तथ्य और धार्मिक आस्थाओं पर है। यही कारण है कि वह तार्किक व धार्मिक विषयों के लिए प्राकृतिक विशेषताओं से लाभ उठाते हैं। इसके साथ ही प्राकृति की विशेषताओं को बयान करने में नासिर ख़ुसरों की व्यापक क्षमता की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने मौसम, रात, आसमान और तारों के बारे में जो शेर कहे हैं वैसे शेर फ़ारसी शायरों ने कम कहे हैं।”
डाक्टर अब्दुल हुसैन ज़र्रीन कूब नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के शेरों और तत्कालीन अत्याचारी शासकों की आलोचना करने के उनसे साहस के बारे में कहते हैं, “उनके शेर बहुत प्रभावशाली हैं। उस सैलाब की तरह जो बहुत ही शक्तिशाली हो। पूरी दृढ़ता से बात कहते थे और पढ़ने वाला ख़ुद को किसी महान हस्ती के सामने महसूस करता है। उनका दीवान पढ़ने से ऐसा लगता है कि वह भ्रष्ट शासकों के हाथ की कठपुतली बनने वालों और इच्छाओं के ग़ुलामों को जैसे ग़ुस्से से घूर रहे हों और जोश में आ जाते हों।
डाक्टर ग़ुलाम हुसैन यूसुफ़ी नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी की इन शब्दों में तारीफ़ करते हैं, “नासिर ख़ुसरों के शेर विषयवस्तु, संरचना, शब्दावली, लय, भावनाओं में उतार चढ़ाव और प्रवाह की नज़र से उनके सोचने की शैली है जिसने शेर का रूप ले लिया है। उनके व्यक्तित्व के रूखेपन की झलक उनके शेरों में दिखाई देती है। उनके शेर भीतर से मज़बूत और सुनने में लय से भरपूर। उनके शेर उस तपे हुए लोहे की तरह हैं जो लुहार के हथोड़े खाकर पूरी तरह ठोस हो गया हो। यह सब उनकी निरंतर संघर्ष व सुधार की कोशिश को दर्शाते हैं।”
नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के दीवान में छपाई की ग़लतियों को सही करने वाले डाक्टर महदी मोहक़्क़िक़, उनकी नैतिक विशेषताओं के बारे में कहते हैं, “उनकी यह विशेषता दूसरों से उन्हें अनुपम बनाती है वह यह कि उन्होंने अपने ज्ञान व साहित्य को सांसारिक मोहमाया के प्रभाव से दूर रखा और पैसों और ताक़त के पुजारियों की कभी भी प्रशंसा नहीं की। उनका दीवान नसीहत, उपमा, आत्मज्ञान के संकलन के साथ साथ मानवीय सिद्धांतों का पाठ भी हैं। उन्होंने अपने दौर के समाज की बुराइयों को पूरी तरह समझा और अकेले उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी। नासिर ख़ुसरो ने आज की प्रचलित शब्दावली के अनुसार शीत युद्ध की नीति अपनायी। वह शासकों और उनके पिट्ठुओं को नसीहत करते और उनकी बुराइयों से पर्दा उठाते और इस प्रकार उन्होंने दौर के शासकों और बिके हुए धर्मगुरुओं की बुराइयों से पर्दा उठाकर उनके अध्यात्म के महल की बुनियाद के खोखले पन को सामने लाते थे। वह उन शायरों की निंदा करते थे जो अपने शेर में शासकों की तारीफ़ करते थे और इसी प्रकार उन धर्मगुरुओं की भी आलोचना करते थे जो पैसे के बदले में शासकों की बुनाइयों का औचित्य दर्शाते थे।
डाक्टर मोहम्मद अली इस्लामी नदूशन नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के शेर और साहित्य के बारे में कहते हैं, “फ़ारसी भाषा के किसी भी शायर ने किसी शासन की इतने कठोर शब्दों में आलोचना नहीं की जिस तरह नासरि ख़ुसरो ने सलजूक़ी शासन की आलोचना की है। अलबत्ता वह ग़ज़्नवी शासन श्रंख्ला का भी समर्थन नहीं करते थे। वह बड़ी हसरत से सामानी शासन काल को याद करते थे क्योंकि उन्हें ईरानी संस्कृति से श्रद्धा थी। वह संपूर्ण रूप से एक ऐसे शायर है जिसके शेर राजनैतिक अर्थ पर आधारित हैं। उन्होंने जो बात भी कही है उसके पीछे एक सामाजिक लक्ष्य निहित है।
नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी ने अपने शेरों से ईरानी संस्कृति की रक्षा की और अमर हो गए। वे फ़िरदोसी के शाहनामे से प्रेरित थे और फ़िरदोसी से श्रद्धा रखते थे। इन दोनों में ईरानी संस्कृति की रक्षा की दृष्टि से सबसे ज़्यादा समानता पायी जाती है। फ़ारसी शायरी में ग़ज़ल और प्रशंसा पर आधारित शेर मौजूद हैं लेकिन नासिर ख़ुसरों के शेर में इन दोनों में से किसी शैली के नहीं हैं। वह अंतर्रात्मा की आवाज़ से जागे और उस स्थान पर पहुंचे जहां उनकी इच्छा थी। इसे नासिर ख़ुसरों में एक तरह की बैचेनी कहा जा सकता है जिसने उनकी साहित्यिक रचना को जन्म दिया।
नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी ने उस दौर में जो दिखावे और जनमत को धोखा देने का दौर था, ज्ञान में रूचि दिखायी और मिस्र के फ़ातेमी शासन की ओर झुके। यह रुझहान उनके अंदर ईरान में व्याप्त अत्याचार के कारण था। शायद यह मामला नासिर ख़ुसरों की सादगी के कारण था कि वह मिस्र के फ़ातेमियों या इस्माइलियों की ओर झुके। सवाल यह पैदा होता है कि एक पवित्र स्वभाव के होते हुए उनके मन में मिस्र के फ़ातेमियों के लिए क्यों झुकाव था? इस बात में शक नहीं कि मिस्र के फ़ातेमी शासन में कमियां थीं लेकिन वह अब्बासी शासकों से बेहतर थे।
नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के यात्रावृत्तांत की प्रस्तावना लिखने वाले डाक्टर मोहम्मद दबीर सियाक़ी ने उनकी क्षमताओं का यूं वर्णन किया है, “एक मुसाफ़िर जिसका नाम नासिर ख़ुसरो है, उसने अपने काल के प्रचलित ज्ञान को व्यापक रूप से हासिल किया है। उनका ख़ानदान शायरों का है। वह मुन्शी के काम और पत्राकार की कला में माहिर थे। उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में नाम कमाया। सामाजिक संबंधों के विभिन्न पहलुओं से अवगत थे। वह बेलाग टिप्पणी करते थे। जो सुनते और देखते थे उसे बहुत अच्छे ढंग से पेश करते थे।”
इसी प्रकार नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के यात्रावृत्तांत की प्रस्तावना लिखने वाले एक और विद्वान डाक्टर नादिर वज़ीनपूर, उनकी सही बात को सही ढंग से पेश करने की क्षमता का उल्लेख करते हुए कहते हैं,“घटनाओं के वर्णन में अतिश्योक्ति, बुरे या घटिया शब्द या द्वेष से प्रेरित जैसी बातें उनकी किताब में मौजूद नहीं। उनके यहां अंध विश्वास और कल्पना का कोई स्थान नहीं है। क्योंकि वह हक़ीक़त पर नज़र रखते थे। वह आम लोगों की निराधार आस्था का पालन नहीं करते थे।”
डाक्टर अली रवाक़ी नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी के बारे में यूं कहते हैं, “नासिर ख़ुसरो के शेर उनकी दृढ़ आत्मा की झलक है। उनके शेरों का आधार उनके उच्च धार्मिक व नैतिक विचार हैं। उनके कुछ शेर ऐसे हैं जिनसे वह बहुत कठोर प्रतीत होते हैं जो उनकी एक रूखे सदाचारी व्यक्ति की छवि पेश करते हैं। इसके साथ ही वह बहुत ही संवेदनशील नज़र आते हैं। उनका कोमल मन उन्हें उनके समय की बुराइयों के संबंध में ज़बान खोलने पर मजबूर करता है और फिर वह अपनी ज़बान से बिके हुए धर्मगुरुओं, आम लोगों और विशेष वर्ग को भी नहीं बख़्शते।
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