नासिर ख़ुसरो-2
हमने कहा था कि नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी युवा अवस्था से ही दरबार की सेवा में व्यस्त रहे, लेकिन 43 वर्ष की आयु में एक सपने के परिणाम स्वरूप, उनके भीतर परिवर्तन हुआ और वे काबे की ज़ियारत करने के लिए पवित्र शहर मक्का चले गए।
वतन से वर्षों तक दूर रहने के बाद, वे स्वदेश लौट आए और शिक्षा-दीक्षा में व्यस्त हो गए और धीरे धीरे दरबारी सेवाओं से दूर होते गए।
इस्लाम का इस्माईलिया मत स्वीकार करने के कारण, धीरे धीरे उनके विरोधियों की संख्या बढ़ती गई और जीवन उनके लिए कठिन हो गया। दुश्मनी और विरोध से दूर शांति प्राप्ति के लिए वे बदख़शान में यमगान घाटी चले गए। उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाएं इसी इलाक़े में 15 वर्षों के निवास के दौरान लिखीं। पिछली कड़ी में हमने उनकी किताबों का उल्लेख किया। उनकी काव्य रचनाओं में से सबसे पहला उनका दीवान अर्थात कविताओं का संग्रह है कि जो अनेक बार प्रकाशित हुआ। इसके अलावा दो संग्रह मसनवी के हैं जिनके नाम रोशनाई नामा और सआदतनामा हैं। यह दोनों भी कई बार प्रकाशित हो चुके हैं।
नासिर ख़ुसरो का दीवान 11 हज़ार छन्दों पर आधारित है, लेकिन निश्चित रूप से इसमें उनके समस्त शेर नहीं हैं। इसका प्रमाण वह शेर हैं जिन्हें विभिन्न अवसरों पर नासिर ख़ुसरो से संबंधित माना गया है, लेकिन वह उनके दीवान में मौजूद नहीं हैं। नासिर ख़ुसरो का दीवान उनके व्यक्तित्व और उनकी आध्यात्मिक स्थिति को जानने के लिए बेहतरीन दस्तावेज़ है।
रोशनाई नामे में 592 छन्द और सआदतनामे में 300 छन्द हैं और इनका विषय उपदेश है। मलिकुशुअरा अपनी सब्क शनासी किताब में सआदतनामे की मसनवी के बारे में कहते हैं कि इसका संबंध नासिर ख़ुसरो शरीफ़ इस्फ़हानी से है जिनका निधन वर्ष 753 में हुआ न कि नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी से। लेकिन अन्य शोधकर्ताओं ने इस नासिर ख़ुसरो से संबंधित माना है। सआदतनामे का अनुवाद सन् 1880 में फ़गनन ने फ़्रांसीसी भाषा में किया और पूर्वी जर्मनी के एक संगठन की पत्रिका में उसे प्रकाशित किया। रोशनाईनामे की एक गद्य प्रति 1949 में व्लादमिर इवानोव के प्रयासों से लीडेन में प्रकाशित हुई।
नासिर ख़ुसरो अपने साहित्य की रचना और विशेष रूप से काव्य रचना में नई शैली के अग्रदूत हैं। उनकी समस्त शायरी उस विचार से संबंधित है जिसकी वह कल्पना करते हैं। इस प्रकार उनकी शायरी में प्रतिबद्धता है और वह स्वयं ऐसे कवि हैं जो अपनी रचना को भूले नहीं है। नासिर ख़ुसरो अपने काल के विवेक की आवाज़ हैं। वे फ़ार्सी साहित्य के सबसे साहसी एवं सबसे स्पष्ट शेर कहने वाले कवि हैं और उन्हें फ़ार्सी रहस्यवाद एवं ज्ञान से संबंधित साहित्य का अग्रणि कहा जाना चाहिए।
नासिर ख़ुसरो ऐसे महान व्यक्ति हैं जिन्होंने मनोग्रस्ति चरित्र को बातचीत के साथ रखा। वह ऐसे संघर्ष का नेतृत्व करते हैं जिससे एक हज़ार वर्ष से ईरानी साहित्य जूझ रहा था। वह संघर्ष पाखंड, धोखा और छलकपट के ख़िलाफ़ है।
नासिर ख़ुसरो की शायरी की विशेषता उसका उपदेशों पर आधारित होना है और इस विषय में उन्होंने अपने पूर्ववर्ती कवि केसाई का अनुसरण किया है। केसाई की अंतिम आयु का काल नासिर ख़ुसरो की आयु का शुरूआती काल था। जब नासिर ख़ुसरो मर्व में न्यायिक पेशे से जुड़े हुए थे उस समय साहित्यकारों की ज़बान पर केसाई के नाम की चर्चा थी और उनकी शायरी की धूम थी। निश्चित रूप से केसाई की शायरी का नासिर ख़ुसरो की शायरी पर प्रभाव था। यह प्रभाव सरल भाषा, प्रकृति के विवरण, उपदेश और अपने काल के शासकों की आलोचना में स्पष्ट था। इसी कारण नासिर ख़ुसरो बुद्धिमत्तापूरण विचारों और विचारों के प्रकट करने की शैली में उनसे प्रभावित थे। नासिर ख़ुसरो स्वयं इसका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि मैंने हमेशा उनकी शायरी को मद्देनज़र रखा है। हालांकि दोनों कवियों की शायरी की गुणवत्ता में काफ़ी अधिक अंतर है। यह अंतर इतना अधिक है कि नासिर ख़ुसरो इस पर गर्व करते हुए कहते हैं कि मेरी शायरी एक कोमल परिंदा है और केसाई की शायरी एक खुरदरी चादर।
निःसंदेह नासिर ख़ुसरो फ़ार्सी के एक प्रतिभाशाली कवि हैं। उनका स्वभाव शक्तिशाली है, संबोधन मज़बूत और शैली अद्वितीय एवं स्पष्ट है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस कवि की भाषा सामानियों के अंतिम काल के कवियों से निकट है, यहां तक कि उनकी शायरी की भाषा की शैली ग़ज़नवी के आरम्भिक काल से अधिक पुरानी है। उनके दीवान में अनेक ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है कि जो चौथी हिजरी शताब्दी में प्रचलित थे और प्रयोग होते थे, ऐसा प्रतीत होता है कि समय ने इस प्रतिभाशाली कवि को बिल्कुल प्रभावित नहीं किया है। इसके बावजूद नासिर ख़ुसरो ने जहां कहीं भी ज़रूरी था नई अरबी और ताज़ी के शब्दों का काफ़ी मात्रा में प्रयोग किया। सामानियों के अंतिम काल की कविताओं में प्रयोग होने वाले ऐसे शब्दों का उन्होंने अपनी कविताओं में अधिक इस्तेमाल किया।
नासिर ख़ुसरो ने नए मत इस्माईलिया को स्वीकार करने के बाद ख़ुरासान में उसके प्रचार प्रसार की ज़िम्मेदारी संभाली, जिसके बाद उनकी शायरी को नया मैदान मिला। इस ज़िम्मेदारी के कारण, उन्होंने एक धार्मिक प्रचारक की भांति धर्म के प्रचार का ध्यान रखा। यही कारण है कि उनकी कविताओं में जो विषय प्रस्तुत किया गया है और जो परिणाम निकाला गया है वह एक प्रचारक की बातों से अधिक मेल खाता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि नासिर ख़ुसरो ने अपनी शायरी में नए विषयों का अविष्कार नहीं किया है, बल्कि उनकी शायरी उनकी आस्थाओं को समझने एवं शिक्षाओं को समझने का माध्यम है। दूसरे शब्दों में उन्होंने दर्शनशास्त्र के विभिन्न विषयों को, जिनके संबंध में मतभेद थे अपनी शायरी में पेश किया और शायरी की कठिन भाषा में बहुत ही दक्षता से अपनी बात का नतीजा निकाला। एक ज्ञानी कवि होने के कारण वे तर्कशास्त्रियों की शैली से बहुत अधिक प्रभावित हैं। उनका बयान तर्कशास्त्र के सिद्धांतों से समन्वित है। इसी प्रकार उनका बयान बौद्धिक परिणामों से परिपूर्ण है, इसी कारण काव्य जोश और विचारों से ख़ाली है।
मूल रूप से नासिर ख़ुसरो ने ऐसे विषयों की ओर ध्यान नहीं दिया जो सामान्य रूप से आम कवियों को आकर्षित करते हैं, जैसे कि सुन्दरता और नज़रों को धोखा देने वाले दृश्य, बल्कि उनकी नज़र धार्मिक विश्वासों और बौद्धिक वास्तविकताओं पर अधिक थी। यही कारण है कि उन्होंने प्राकृतिक विषयों को धार्मिक एवं बौद्धिक विषयों की व्याख्या के उद्देश्य से प्रयोग किया है।
नासिर ख़ुसरो एक दरबारी कवि नहीं थे और अगर ऐसा रहा भी होगा तो इस संदर्भ में उनके द्वारा कहे गए शेर हम तक नहीं पहुंचे हैं। वे ऐसे सबसे पहले कवि हैं कि जिसने उपदेश देने के लिए पूर्ण मसनवी कही है। यह विचार उनके क़सीदों में भी देखा जा सकता है। उन्होंने दुनिया से अपना संबंध तोड़कर पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके परिजनों की मोहब्बत की छत्रछाया में शरण ली, इसीलिए उनकी नज़र में दुनिया का कोई महत्व नहीं था।
नासिर ख़ुसरो के काल में प्रकृति की व्याख्या का काफ़ी प्रचलन था और उस काल के कवियों के काव्य संग्रह बहार, पतझड़, बादल, आसमान, फूलों से भरे हुए बाग़, जंगल और पहाड़ों की व्याख्या से भरे पड़े थे। फ़रख़ी और मनूचेहरी जैसे उस्ताद कवियों ने इस संबंध में काफ़ी प्रयास किया है। इसके बावजूद नासिर ख़ुसरो का इस क्षेत्र में भी विशेष स्थान है। उनकी व्याख्या स्पष्ट है और उसमें दार्शनिक गहराई और आश्चर्यचकित करने वाली कला है। नासिर ख़ुसरो के शेरों में आश्चर्य में डालने वाला बिंदु यह है कि वे दुनिया को तुच्छ समझते हैं और बहार एवं फूलों की प्रशंसा और प्रकृति से प्रेम को मूर्खता मानते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे स्वयं प्रकृति के दीवाने थे और उन्होंने उसकी अद्वितीय व्याख्या की है। विशेष रूप से आसमान की, वे आसमान से आध्यात्मिक आस्था रखते थे और सूर्य एवं तारों ने भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया और उन्होंने इस संदर्भ में काफ़ी संख्या में शेर कहे कि जो अपने आप में अद्वितीय हैं।
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