नासिर ख़ुसरो-3
हमने कहा था कि नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी युवा अवस्था से ही दरबार की सेवा में व्यस्त रहे, लेकिन 43 वर्ष की आयु में एक सपने के परिणाम स्वरूप, उनके भीतर परिवर्तन हुआ और वे काबे की ज़ियारत करने के लिए पवित्र शहर मक्का चले गए।
वतन से वर्षों तक दूर रहने के बाद, वे स्वदेश लौट आए और शिक्षा-दीक्षा में व्यस्त हो गए और धीरे धीरे दरबारी सेवाओं से दूर होते गए।
इस्लाम का इस्माईलिया मत स्वीकार करने के कारण, धीरे धीरे उनके विरोधियों की संख्या बढ़ती गई और जीवन उनके लिए कठिन हो गया। दुश्मनी और विरोध से दूर शांति प्राप्ति के लिए वे बदख़शान में यमगान घाटी चले गए। उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाएं इसी इलाक़े में 15 वर्षों के निवास के दौरान पूरी की। पिछले कड़ी में हमने उनकी एक महत्वपूर्ण किताब सफ़रनामे की समीक्षा की थी।
उनकी किताबों से उनके ज्ञान और जानकारी का अच्छी तरह अनुमान लगाया जा सकता है। वे अपने समय के अधिकांश विषयों में दक्षता रखते थे और अपनी इसी प्रतिभा के आधार पर उन्होंने फ़ार्सी भाषा में अनेक किताबें लिखीं। हालांकि उन अनेक रचनाओं में से केवल 9 रचनाएं बाक़ी हैं। उनमें से कुछ गद्य हैं और कुछ पद्य। गद्य पर आधारित किताबों में से सफ़रनामा, ख़्वाने इख़्वान, गुशायिश व रिहायिश, जामे अल-हिकमतैन, वज्हे दीन व ज़ादुल मुसाफ़ेरीन हैं। जैसा कि हम पिछले कार्यक्रम बता चुके हैं, सफ़रनामा, नासिर ख़ुसरो की सात वर्ष की यात्रा पर आधारित किताब है, यह किताब सरल गद्य में लिखी गई है। यह किताब भौगोलिक एवं ऐतिहासिक जानकारियों पर आधारित है। नासिर ख़ुसरो की अन्य किताबें इस्माईलिया मत के धार्मिक विश्वासों पर आधारित हैं। इस प्रकार की उनकी समस्त किताबें सरल गद्य और पुरानी भाषा में लिखी गई हैं और धर्मशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र की जानकारी के लिए एक अच्छा स्रोत समझी जाती हैं और उन्हें समझने के लिए दर्शनशास्त्र की प्राथमिक जानकारी होना ज़रूरी है।
नासिर ख़ुसरो की इस प्रकार की किताबों में ज़ादुल मुसाफ़ेरीन इस्माईलिया मत की सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध किताबों में से एक है। यह किताब सन् 453 हिजरी क़मरी में लिखी गई थी। इसमें 27 क़ौल अर्थात कथन हैं। नासिर ख़ुसरो ने इन कथनों में ज्ञान के विभिन्न विषयों का उल्लेख किया है। यह किताब इस्माईलियों की महत्वपूर्ण दर्शनशास्त्र की किताबों में से एक है। ज़ादुल मुसाफ़ेरीन फ़ार्सी भाषा में दर्शनशास्त्र की प्राचीन किताबों में से है। इस किताब में प्रयोग किए गए दर्शनशास्त्र से संबंधित शब्दों का बहुत महत्व है।
ज़ादुल मुसाफ़ेरीन की भाषा भी नासिर ख़ुसरो की अन्य किताबों की भांति सामानी काल की भाषा है। ऐसी शैली कि जो अपनी समकालीन किताबों से पुरानी लगती है, हालांकि ग़ज़नवी काल में फ़ार्सी भाषा में होने वाले परिवर्तनों की एक झलक उसमें स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
फ़ार्सी शब्दों के दृष्टिगत ज़ादुल मुसाफ़ेरीन का एक विशेष महत्व है। इस किताब में ऐसे अनोखे शब्दों का प्रयोग किया गया है कि या तो वह अन्य प्राचीन किताबों में नहीं मिलते हैं, या बहुत कम इस्तेमाल किए गए हैं। दूसरे यह कि नासिर ख़ुसरो इस किताब में अरबी दार्शनिक शब्दों के समांतर फ़ार्सी के ऐसे सुन्दर शब्द लाए हैं कि जिनमें से कुछ अद्वितीय हैं।
इस विषय का महत्व उस समय अधिक स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि ज़ादुल मुसाफ़ेरीन में प्रयोग किए गए कुछ शब्द वर्तमान शब्दकोषों में से किसी में नहीं मिलते हैं।
बज्हे दीन नामक किताब नासिर ख़ुसरो की एक अन्य महत्वपूर्ण किताब है। इस किताब में उन्होंने इस्माईलिया मत के धार्मिक विश्वासों के बारे में संक्षेप विवरण पेश किया है और इबादत की गोपनीयता के बारे में बातचीत की है। इसी प्रकार इस्माईलियों की शैली में गोपनीय इबादत और धार्मिक आदेशों का उल्लेख किया है। इस किताब को इस्माईलिया मत का विवरण कहा जा सकता है, हालांकि उसके लिखने की सही तारीख़ स्पष्ट नहीं है। इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि इसे 453 हिजरी क़मरी के बाद, प्रवासन के दौरान परदेस में लिखा गया है, इसलिए कि नासिर ख़ुसरो ने इसके कुछ भागों में ज़ादुल मुसाफ़ेरीन किताब की ओर संकेत किया है और ख़ुरासान में उपद्रव, इस इलाक़े से ईमान के प्रकाश के समाप्त हो जाने और धर्म में कमज़ोर आस्था रखने वालों के सिर से ईश्वरीय प्रतिनिधियों का हाथ उठ जाने की चर्चा की है।
नासिर ख़ुसरो इस किताब को बहुत महत्व देते थे, उन्होंने उसकी प्रस्तावना में लिखा है, जो बुद्धिजीवी इस किताब को पढ़ेगा, वह धर्म से अवगत हो जाएगा और उसे चाहिए कि वह अपनी जानकारी के मुताबिक़ आचरण करे। नासिर ख़ुसरो की इस किताब का काफ़ी लम्बे समय तक कुछ अता-पता नहीं था। रूसी बुद्धिजीवी ज़ारूबीन द्वारा काफ़ी प्रयास के बाद उसकी दो प्रतियां अफ़ग़ानिस्तान के बदख़शान इलाक़े में इस्माईलियों के बीच खोज ली गईं। 1301 हिजरी शम्सी में सैय्यद हसन तक़ी ज़ादे ज़ारूबीन द्वारा खोजी गई प्रतियों में से एक की छाया बर्लिन ले गए और प्रोफ़ेसर ब्राउन के सहयोग से उन्होंने उसे प्रकाशित किया।
जामेउ-हिकमतैन ईरान के बुद्धिजीवी एवं कवि नासिर ख़ुसरो की एक अन्य किताब है। इस किताब को डा. मोहम्मद मोईन और हेनरी कोर्बन के प्रयासों से 1333 हिजरी शम्सी मे तेहरान से फ़ार्सी एवं फ़्रेंच भाषाओं में प्रकाशित किया गया। इन दोनों विद्वानों ने इन किताबों पर अपनी प्रस्तावना भी लिखी।
वास्तव में यह किताब ख़्वाजा अबुल हैसम अमहद इब्ने हसन जुर्जानी के फ़ार्सी दार्शनिक क़सीदे की व्याख्या है। इस्माईली मत के अनुयाई कवि एवं दर्शनशास्त्री अबुल हैसम ने अपने 82 बैत वाले क़सीदे में कुछ प्रश्न उठाए हैं। बदख़शान के शासक ने कि जो ख़ुद इस्माईली मत का अनुयाई था, नासिर ख़ुसरो से उनके यमगान में निवास के दौरान मांग की कि वे इन सवालों का जवाब दें। इस प्रकार, नासिर ख़ुसरो की यह महत्वपूर्ण किताब वजूद में आई। जामे अल-हिकमतैन किताब यूनानी दर्शनशास्त्र और इस्माईलियों के धार्मिक सिद्धांतों का संग्रह है।
नासिर ख़ुसरो ने जुर्जानी के शेरों का धर्मशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर जवाब दिया है। जामे अल-हिकमतैन दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र और फ़ार्सी के शब्दों के दृष्टिगत ध्यान योग्य है।
ख़्वानुल-इख़्वान और गुशायिश व रिहयिश नासिर ख़ुसरों की दो अन्य किताबें हैं। पहली किताब की एक हस्तलिखित प्रति आयासोफ़िया पुस्तकालय में है तथा सन् 1940 में याहया अल-ख़श्शाब ने उसे क़ाहिरा से प्रकाशित किया। दूसरी किताब सईद नफ़ीसी के संपादन में सन् 1950 में मुम्बई से छपी। दोनों ही किताबें धार्मिक विषयों से संबंधित हैं। नासिर ख़ुसरो ने गुशायिश व रिहायिश किताब में एक धार्मिक भाई के तीस सवालों के जवाब दिए हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि नासिर ख़ुसरो की किताब गुशायिश व रिहायिश से स्पष्ट हो जाता है कि वे अपने काल में इस्माईलिया मत का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने इस किताब में बहुत ही सरल भाषा में तीस तार्किक जवाब दिए हैं और उन्हें धर्म में विश्वास रखने वालों की मुक्ति का कारण बताया है।
इन किताबों के अलावा, अल-मिफ़्ताह व अल-मिस्बाह, दलील अल-मुतहय्येरीन, अजायबुस्सनआ, लिसानुल आलम, इख़्तियारुल इमाम व इख़्तियारुल ईमान, अद्दलील, ग़रायबुल हिसाब व अजायबुल हिसाब का नाम लिया जा सकता है कि जो आज उपलब्ध नहीं हैं। नासिर ख़ुसरो की इन किताबों के अलावा, सिर्रुल असरार, अक्सीरे आज़म और क़ानूने आज़म को भी उन्हीं से संबंधित माना जाता है, हालांकि इसमें संदेह पाया जाता है।
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