नासिर ख़ुसरो-4
इस्लाम का इस्माईलिया मत स्वीकार करने के कारण, धीरे धीरे उनके विरोधियों की संख्या बढ़ती गई और जीवन उनके लिए कठिन हो गया। दुश्मनी और विरोध से दूर शांति प्राप्ति के लिए वे बदख़शान में यमगान घाटी चले गए।
उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाएं इस इलाक़े में 15 वर्षों के निवास के दौरान कीं। उनकी बाक़ी रहने वाली महत्वपूर्ण किताबों में से एक सफ़रनामा है।
नासिर ख़ुसरो का सफ़रनामा पांचवी हिजरी शताब्दी की महत्वपूर्ण किताबों में से है, इसलिए कि लेखक स्वयं उस काल में मौजूद था और बहुत सी घटनाओं का साक्षी था। इसके बावजूद यह बात ध्यान योग्य है कि उस काल में नासिर ख़ुसरो जैसे विद्वान के लिए परिस्थितियां इतनी भी अनुकूल नहीं थीं कि वह आसानी से सल्जूक़ी तुर्कों के शासनकाल की सामाजिक एवं वैचारिक स्थिति जैसे घटनाक्रमों का अपनी किताब में उल्लेख कर सकें। सफ़रनामे में कहीं कहीं हम ऐसे संकेत देखते हैं कि जहां नासिर ख़ुसरो तेज़ी से गुज़र गए हैं। वह जब मर्व शहर पहुंचते हैं और वहां से तेज़ी से गुज़र जाते हैं तो इससे वहां की सामाजिक स्थिति का पता चलता है। ऐसी स्थिति के उल्लेख में ख़ुसरो को कोई रूची नहीं थी लेकिन इसके विपरीत जब देलमिस्तान पहुंचते हैं तो वहां के अमीर अली की प्रशंसा करते हैं, जिससे पता चलता है कि वे अलवियों के शासन को पसंद करते थे। इस प्रकार के संकेत क़ाहिरा और मिस्र की प्रशंसा में भी देखे जा सकते हैं, जिन्हें इस दक्ष विद्वान ने बहुत ही समझदारी से बयान किया है।
भौगोलिक आयाम से सफ़रनामे के बारे में कहा जा सकता है कि नासिर ख़ुसरो ने अपनी इस किताब में शहरों और विभिन्न स्थानों का अद्वितीय रूप से उल्लेख किया है। उन्होंने हज़ार वर्ष पूर्व स्थापित होने वाले शहरों का इस प्रकार से उल्लेख किया है कि आज उनका पूर्ण डिज़ाइन तैयार किया जा सकता है। विशेष रूप से क़ाहिरा, लहसा, ज़मज़म, सफ़ा, मर्वा, मक्का, मदीना और बैतुल मुक़द्दस का इस प्रकार से उल्लेख किया गया है। नासिर ख़ुसरो जिस शहर और इलाक़े में भी पहुंचते हैं, पहले वहां की भौगोलिक परिस्थितियां बयान करते हैं, उदाहरण स्वरूप, जलवायु, पहाड़, जंगल, नदियां और वहां के सोते व झरने। उसके बाद उन्होंने एक शहर की दूसरे शहर और गांव की दूसरे गांव से दूरी का उल्लेख किया है। उसके बाद ऐतिहासिक इमारतों के बारे में बाते की है। इसी प्रकार उन्होंने कुछ मस्जिदों, मज़ारों, बाज़ारों जैसे स्थानों का उल्लेख किया है। इसी प्रकार उन्होंने हर इलाक़े की ज़मीनों और फ़सलों की विशेषताओं को बयान किया है और भूकंप जैसी कुछ प्राकृतिक घटनाओं की ओर संकेत किया है।
नासिर ख़ुसरो का सफ़रनामा 7 वर्षीय यात्रा की घटनाओं पर आधारित है। यह यात्रा 6 जमादिस्सानी 437 हिजरी क़मरी को मर्व से शुरू हुई और जमादिस्सानी के महीने में 444 हिजरी क़मरी को बल्ख़ में समाप्त हुई। सात वर्षीय यह यह यात्रा नासिर ख़ुसरो के लिए वैचारिक परिवर्तन का कारण और हमारे लिए एक यादगार है। उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शैली में घटनाक्रमों को बयान किया है और उनमें किसी तरह की हेराफेरी नहीं की। वापसी के बाद उसे अच्छी तरह व्यवस्थित किया और उसे किताब का रूप दिया। इस किताब को पढ़कर पांचवी हिजरी शताब्दी के इस्लामी जगत के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है और उस काल के लोगों की संस्कृति और इस्लामी शहरों से परिचित हुआ जा सकता है। जिन इलाक़ों से नासिर ख़ुसरो गुज़रे थे उनमें से कुछ पर सल्जूक़ियों का शासन था और कुछ अन्य स्थानीय शासकों के तहत थे। मिस्र, शाम और हिजाज़ पर फ़ातेमी ख़लीफ़ाओं का शासन था। उन्होंने जहां जैसी स्थिति देखी उसे वैसे ही बयान कर दिया। अगर कहीं शांति देखी तो उसकी प्रशंसा की। इसी के साथ ईरान में अशांति और मक्के और मदीने के बीच अरबों के उपद्रव पर दुख प्रकट किया।
नासिर ख़ुसरो ने जो कुछ देखा और सुना उसे अच्छी तरह बयान कर दिया। उनका बयान किसी चित्रकारी की भांति है जिसने तस्वीरों में शब्दों का रंग भर दिया है। उनके सफ़रनामे के हर भाग में भौगोलिक विशेषताएं बयान की गई हैं। यह किसी ऐसी तस्वीर की भांति है जिसे किसी दक्ष फ़ोटोग्राफ़र ने खींचा हो। उदाहरण स्वरूप, इस्फ़हान शहर का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं, एक ऐसा शहर है जिसकी बुनियाद मैदान पर रखी गई है, वहां की जलवायु बहुत अच्छी है और जहां भी दस गज़ गहरा कुआं खोदा जाता है वहां से ठंडा और मीठा पानी निकलता है। शहर के चारो ओर दीवार, द्वार और दुर्ग बने हुए हैं। शहर में साफ़ पानी की नालियां बहती हैं और सुन्दर एवं ऊंची इमारते हैं। शहर के बीच में बड़ी और सुन्दर आदीने मस्जिद है। शहर की दीवार साढ़े तीन फ़रसंग अर्थात लगभग 19 किलोमीटर है और शहर पूरी तरह से आबाद है और वहां मैंने कोई खंडहर नहीं देखा, इस शहर में अनेक बाज़ार हैं, मैंने वहां सर्राफ़ा बाज़ार देखा जिसमें 200 सुनार थे, हर बाज़ार का मुख्य द्वार है, इसी प्रकार हर मोहल्ले और गली का मुख्य द्वार है और साफ़ सुथरा मुसाफ़िरख़ाना। शहर में एक ऐसी गली थी जिसे कूतराज़ कहा जाता है, उस गली में पचास मुसाफ़िरख़ाने थे और हर एक में अनेक कमरे। जिस क़ाफ़िले में हम थे उसके पास लगभग 412 मन सामान था, जब हम शहर में पहुंचे तो किसी ने नहीं देखा वह कैसे उतर गया, कहीं कोई परेशानी पेश नहीं आई।
नासिर ख़ुसरो के लेखों से कृषि की स्थिति, फ़सल की क़िस्मों, सिंचाई की शैली, उद्योगों, विद्वानों और इमारतों, शहर का प्रबंधन, रीति रिवाजों, ऐतिहासिक घटनाओं और उस काल के इस्लामी देशों के बारे में अच्छी जानकारी प्राप्त हो जाती है।
नासिर ख़ुसरो के सफ़रनामे का अध्ययन करके शोधकर्ता पांचवी हिजरी क़मरी शताब्दी के इस्लामी देशों में नागरिक सुविधाओं के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण स्वरूप, बसरा के लोगों के व्यापारिक लेनदेन के बारे में जिसे आज बैंकिंग सिस्टम कहा जाता है, नासिर ख़ुसरो लिखते हैं, वहां के बाज़ार की स्थित ऐसी थी कि अगर किसी के पास कोई चीज़ थी वह उसे सर्राफ़ को देता था, सर्राफ़ उसे एक चेक देता था, उससे जो भी ख़रीदना होता ख़रीदता था और उसका भुगतान सर्राफ़ को किया जाता था, मानो आपने उस शहर में सर्राफ़ के चेक के अलावा कुछ नहीं दिया।
नासिर ख़ुसरो ने विभिन्न शहरों में अपनी यात्रा के दौरान, ड्रेनपाइप, जल भंडार और रहट का भी उल्लेख किया है, मिस्र में रहट के बारे में वे कहते हैं, जब दूर से मिस्र के शहर को देखते हैं, तो लगता है पहाड़ है, ऐसे घर हैं जो 14 मंज़िला हैं और सात मंज़िला। मैंने सुना है कि किसी ने सातवीं मंज़िल की छत पर बाग़ीचा लगाया था और वहां बछड़ा ले जाकर पाला था। वहां रहट थी जिसे बैल चलाते थे और उससे कुएं से पानी खींचा जाता था। उस छत पर संतरे, केले और अन्य फलों के पेड़ थे और विभिन्न प्रकार के फूल।
नासिर ख़ुसरो के सफ़रनामे की दो हस्तलिखित प्रतियां मौजूद हैं। पहली बार मध्यपूर्व मामलों के फ़्रांसीसी विशेषज्ञ शफ़र ने 1298 हिजरी क़मरी में उसका फ़्रैंच भाषा में अनुवाद किया और उसके बाद वह भारत के बम्बई शहर में प्रकाशित हुई। तीसरी बार तेहरान में ज़ैनुल आबेदीन अल-शरीफ़ अल-सफ़वी के प्रयास से 1312 हिजरी में इसका प्रकाशन हुआ और उसी वर्ष पुनः इसे छापा गया। इस किताब का पांचवा प्रकाशन कावियानी बर्लीन प्रिंटिंग प्रेस में ग़नी ज़ादेह के प्रयास हुआ लेकिन इसका सबसे प्रसिद्ध प्रकाशन 1335 हिजरी शम्सी में डा. मोहम्मद दबीर सयाक़ी ने किया।
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