Apr २३, २०१६ १०:१२ Asia/Kolkata
  • नासिर ख़ुसरो-5

हमने कहा था कि नासिर ख़ुसरो क़ुबादियानी युवा अवस्था से ही दरबार की सेवा में व्यस्त रहे, लेकिन 43 वर्ष की आयु में एक सपने के परिणाम स्वरूप, उनके भीतर परिवर्तन हुआ और वे काबे की ज़ियारत करने के लिए पवित्र शहर मक्का चले गए।

 वतन से वर्षों तक दूर रहने के बाद, वे स्वदेश लौट आए और शिक्षा-दीक्षा में व्यस्त हो गए और धीरे धीरे दरबारी सेवाओं से दूर होते गए।

 

 

नासिर ख़ुसरो ने अपने मूल्यवान सफ़रनामे की शुरूआत में उस सपने का उल्लेख किया है कि जिसने उनमें क्रांति उत्पन्न कर दी। वे लिखते हैं, एक रात को मैंने सपना देखा कि कोई मुझ से कह रहा है, इस शराब को कितना पीना चाहते है कि जो लोगों की बुद्धि को हर लेती है। होश में रहना बेहतर है। मैंने जवाब में कहा, विद्वानों ने इसके अलावा कोई ऐसी चीज़ का अविष्कार नहीं किया है, जो दुनिया के ग़मों को कम कर दे। उसने जवाब दिया, ख़ुद को भुलाने और बेहोशी में कौन सा आराम है। उस व्यक्ति को विद्वान नहीं कहना चाहिए कि जो लोगों को बेहोशी की सिफ़ारिश करे, बल्कि किसी ऐसी चीज़ की इच्छा करना चाहिए जो बुद्धि और होश में वृद्धि कर दे। मैंने कहा, मैं इसे कहां खोज सकता हूं? कहा, जो खोजता है वह पाता है। उसके बाद काबे की ओर संकेत किया और फिर कुछ नहीं कहा।

जब वे नींद से जागे तो सपने में हुई बातचीत उन्हें अच्छी तरह याद थी और उन पर उसका गहरा प्रभाव था। उन्होंने स्वयं से कहा, बिस्तर की नींद से तो मैं जाग गया, अब मुझे चालीस साल की नींद से भी जागना होगा। उन्होंने अपने चरित्र और आचरण में पूर्ण परिवर्तन का निर्णय कर लिया। सपने के अनुसार, उन्होंने मक्का जाने का फ़ैसला किया। उन्होंने सन् 437 हिजरी में मर्व से अपने भाई अबू सईद और एक भारतीय सेवक के साथ मक्के का सफ़र शुरू किया। वे उत्तरी ईरान से सीरिया, लघु एशिया और उसके बाद, फ़िलिस्तीन, मक्का, मदीना और मिस्र गए और अल्लाह के घर की ज़ियारत के बाद, दक्षिणी ईरान होते हुए अपने वतन बल्ख़ वापस लौट गए। सात वर्षीय और हज़ारों मील की यात्रा ने उनमें वैचारिक परिवर्तन किया जो हमारे लिए एक सफ़रनामा है।

 

 

मिस्र में तीन वर्षों के प्रवासन के दौरान नासिर ख़ुसरो मुसलमानों के इस्माईलिया सम्प्रदाय से परिचित हुए और उन्होंने इस्माईलिया मत स्वीकार कर लिया। इस्माईलिया मत का मानना है कि शियों के इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) के बाद उनके पुत्र मोहम्मद बिन इस्माईल इमाम बने जो आज तक जीवित हैं और नज़रों से ओझल हैं। इस्माईलिया मत के अनुयाई बुद्धि और तर्क को काफ़ी महत्व देते थे, इसीलिए नासिर ख़ुसरो इस मत की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने अपने प्रयासों से ऐसा स्थान ग्रहण किया कि वे मिस्र में फ़ातेमी ख़लीफ़ा अल-मुस्तंसिर बिल्लाह अबू तमीम माद बिन अली की सेवा में पहुंचे और ख़लीफ़ा की ओर से ख़ुरासान में उसके प्रतिनिधि बन गए।

जिस समय नासिर ख़ुसरो मिस्र और हिजाज़ से ख़ुरासान की ओर लौटे उस समय उनकी आयु पचास वर्ष हो चुकी थी। जिस समय वे ईरान वापस लौटे उस समय ईरान में सल्जूक़ी शासन श्रंखला की शुरूआत थी, वे बल्ख़ गए और वहां इस्माईलिया मत का प्रचार प्रसार करना शुरू कर दिया। उन्होंने आसपास के इलाक़ों में प्रचारक भेजे और ख़ुद भी सुन्नी विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। धीरे धीरे उनके विरोधियों की संख्या बढ़ती गई और जीवन उनके लिए कठिन हो गया, यहां तक कि उनकी हत्या का फ़तवा भी दे दिया गया।

नासिर ख़ुसरो और तत्कालीन विद्वानों के बीच जो टकराव शुरू हुआ वह उनके जीवन के अंत तक बाक़ी रहा, जिसका प्रभाव उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। अपने काल के लोगों और सल्जूक़ी शासकों और ख़ुरासान के सुन्नी विद्वानों से जो उन्हें शिकायत थी, उसका उल्लेख उन्होंने अपनी कविताओं में किया। उनकी अधिकांश कविताएं अपने विरोधियों से टकराव का प्रतिबिंब हैं।

 

 

विरोध और दुश्मनी बढ़ने के कारण नासिर ख़ुसरो ने ख़ुरासान और माज़ेनदरान के कुछ शहरों का रुख़ किया और वहां प्रचार जारी रखा। ऐसा प्रतीत होता है कि माज़ेनदरान में उनके कुछ अनुयाई बने, लेकिन वहां भी उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली और वे जहां भी गए लाठी डंडों और पत्थरों से उनका स्वागत होता था। आख़िर में वे बदख़्शान के यमगान गए ताकि पर्वतीय इलाक़े में एकांतवास में रहकर किताबें लिख सकें। उनकी अधिकांश रचनाएं इसी पर्वतीय इलाक़े में 15 वर्षों के दौरान लिखी गई हैं। उस दौरान नासिर ख़ुसरो ने इस्माईली मत के अनुयाई अली बिन असद बिन हारिस के समर्थन से जामियातुल हिकमतैन किताब लिखी।

 

नासिर ख़ुसरो अपने जीवन के अंत तक यमगान में रहे और मरने के बाद वहीं दफ़्न हुए। कहा जाता है कि उनकी मौत के काफ़ी समय बाद, उनकी क़ब्र इस्माईलियों के निकट मज़ार बन गई। दौलतशाह समरक़ंदी ने उसका उल्लेख करते हुए कहा है कि हकीम नासिर ख़ुसरो की क़ब्र शरीफ़ यमगान घाटी में स्थित है और यह जगह बगख़शान इलाक़े में स्थित है, उसके बाद भी पर्यटकों ने ख़ुसरो की क़ब्र के यमगान घाटी में देखा है कि जो अब भी मौजूद है और उससे संबंधित स्थानीय लोग कुछ घटनाओं का उल्लेख करते हैं। यमगान में नासिर ख़ुसरो के लम्बे समय तक रहने के कारण बदख़शान और उसके आसपास के इलाक़ों यहां तक कि ख़ूक़ंद और बुख़ारा तक इस्माईलिया मत का प्रचार प्रसार हुआ और अभी भी इस इलाक़े में इस मत के अनुयाई मौजूद हैं।

 

 

नासिर ख़ुसरो की कुछ मूल्यवान किताबें मौजूद हैं। उनकी कुछ किताबों में सफ़रनामा, ख़्वान ख़्वान, गुशायश व रिहायश, जामे अल-हिकमतैन, ज़ादुल मुसाफ़ेरीन और वजहे दीन हैं। सफ़रनामा किताब, उनकी 7 वर्षीय यात्रा पर आधारित है कि जिसमें सरल भाषा में भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा उन देशों की परम्पराओं और रस्मों का उल्लेख है, जहां की उन्होंने यात्रा की थी। उनकी अन्य किताबें धर्मशास्त्र और इस्माईलिया मत से संबंधित हैं। इन किताबों में ज़ादुल मुसाफ़ेरीन किताब सबसे महत्वपूर्ण है और इस्माईलिया मत में इसे बहुत महत्व दिया जाता है। यह किताब, 453 हिजरी क़मरी में लिखी गई। यह किताब 27 क़ौल अर्थात कथनों में लिखी गई। लेखक ने इन कथनों में ज्ञान के प्रकार और उससे संबंधित विषयों, आत्मा, समय, स्थान, संसार की सृष्टि आत्मा का शरीर से संबंध, प्रलय, पुनर्जन्म के विश्वास का ग़लत होना और प्रलय के दिन दंड व पुण्य का उल्लेख किया है। वजहे दीन नासिर ख़ुसरो की एक अन्य महत्वपूर्ण किताब है, जिसमें संक्षेप रूप से इस्माईलिया मत के धार्मिक विश्वासों को बयान किया गया है। नासिर ख़ुसरो की समस्त किताबें सरल भाषा में लिखी गई हैं और दर्शनशास्त्र के विषय में इनका अपना स्थान है। इसलिए कि धर्म से संबंधित उनकी किताबें दार्शनिक रूप में और तर्क के आधार पर लिखी गई हैं। उन्हें समझने के लिए दर्शनशास्त्र की प्राथमिक जानकारी का होना ज़रूरी है।

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