नासिर ख़ुसरो-6
अबूमोईन नासिर बिन ख़ुसरो बिन हारिस क़ोबादियानी बल्ख़ी का काल पांचवी हिजरी शताब्दी या ग्यारहवी ईसवी था।
नासिर ख़ुसरो का जन्म सन 394 हिजरी क़मरी को क़ोबादियान में हुआ था। क़ोबादियान, बलख़ के अन्तर्गत था जिसकी गणना तत्कालीन वृहत्तर ख़ुरासान में होती थी। फ़ातेमी शासक ने उन्हें हुज्जत की उपाधि दी थी।
अपने यात्रा वृतांत में नासिर ख़ुसरो ने स्वयं को क़ोबादियानी मरवज़ी के नाम से परिचित करवाया है। नासिर ख़ुसरो की रचनाओं का शोध करने वालों का कहना है कि उन्होंने अपना कुछ समय मरव में गुज़ारा इसलिए अपने नाम के आगे मरवज़ी लिखा है। नासिर ख़ुसरो कुछ समय तक मरव नगर में न्यायपालिका में कार्यरत थे। वहां पर उनका अपना घर भी था। नासिर ख़ुसरो ने अपनी कुछ कविताओं में बलख़ का भी उल्लेख किया है।
नासिर ख़ुसरो से संबन्धित प्रमाणों से ज्ञात होता है कि उनका जन्म शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके परिवार के अधिकांश लोग, न्यायपालिका में कार्यरत रहे। उनका प्रशिक्षण भी शिक्षित वातावरण में हुआ था। नासिर ख़ुसरो ने आरंभ से ही पढ़ाई आरंभ कर दी थी और उन्होंने तत्कालीन प्रचलित ज्ञानों को सीखा था। उन्हें पढ़ाई से आरंभ से ही लगाव था। वे बहुत ही मेधावी थे। नासिर ख़ुसरो ने दर्शनशास्त्र, खगोल शास्त्र, ज्योतिष, चिकित्सा विज्ञान, गणित, संगीत, चित्रकारिता और धर्मशास्त्र जैसे कई विषयों का अध्ययन किया था।
अपने काल के प्रचलित विषयों का ज्ञान अर्जित करने के बाद नासिर ख़ुसरो ने कुछ समय तक मिस्र में गणित की शिक्षा दी। उन्हें फ़ारसी के अतिरिक्त कई अन्य भाषाओं का ज्ञान था। नासिर ख़ुसरो ने हुंदइज़्म, बुधिज़्म, ज़रतुश्ती, इसाई और यहूदी धर्मों जैसे कई धर्मों का बहुत गहन अध्ययन किया था।
नासिर ख़ुसरो बहुत ही कम आयु में लेखन में दक्ष हो गए थे। अपनी योग्यताओं के कारण 30 वर्ष से भी कम आयु में उन्हें वृहत्तर ख़ुरासान दरबार में स्थान मिल गया था। उस समय वृहत्तर ख़ुरासान, साहित्यिक केन्द्र था। नासिर ख़ुसरो के काल में जो लोग साहित्य के क्षेत्र में कुछ करना चाहते या इस क्षेत्र में ख्याति अर्जित करना चाहते थे वे वृहत्तर ख़ुरासान का रुख़ किया करते थे।
नासिर ख़ुसरो 43 वर्ष की आयु तक राजदरबार में लिखने का काम किया करते थे। इस दौरान उनकी ख्याति चारों ओर फैल चुकी थी। अपने यात्रा वृतांतों में उन्होंने लिखा है कि मैंने महमूद ग़ज़नवी और मसऊद ग़ज़नवी के दरबारों में काम किया है। इन दरबारों में वे उच्च पदों पर पहुंचे। नासिर ख़ुसरो को अदीब, दबीरे फ़ाज़िल और ख़्वाजा ख़तीर जैसी उपाधियां भी दी गई थीं। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि नासिर ख़ुसरो बलख़ में बुहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। बल्ख़ उस समय गज़नवी शासन के शासकों की जाड़ों की राजधानी था। सन 432 हिजरी क़मरी में सलजूक़ियों द्वारा बल्ख़ पर नियंत्रण स्थापित किये जाने के बाद नासिर ख़ुसरो, मर्व चले गए थे जहां पर अबू सुलैमान जाफ़री का शासन था। वहां पहुचंकर भी उन्होंने न्याय पालिका से संबन्धित कार्यभार संभाला। अपने भीतर आने वाली क्रांति से पहले नासिर ख़ुसरो, अन्य कवियों की भांति राजाओं और शासकों की प्रशंसा में कविताएं कहते थे।
आरंभ में तो नासिर ख़सरो ने ख्याति अर्जित करने और शासकों की सेवा में अपना समय व्यतीत किया किंतु धीरे-धीरे उनके भीतर परिवर्तन आने लगे। अब वे वास्तविकता की खोज में लग गए। उनका मन सदैव ही वास्तविकता की खोज में लगा रहता था। नासिर ख़ुसरो, अंध विश्वास के कड़े विरोधी थे। तथाकथित विद्वानों की बातों से वे संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने मन की शांति और वास्तविकता को पहचानने के लिए तुर्किस्तान और भारत की यात्राएं कीं। वहां पर नासिर ख़ुसरो ने विभिन्न धर्मगुरूओं से शास्त्रार्थ किया।
उनके भीतर आने वाले परिवर्तनों के बारे में बहुत सी बातें कही गई हैं लेकिन यह बात सुनिश्चित है कि आत्मिक शांति के लिए नासिर ख़ुसरो, लगातार प्रयास करते रहते। 43 वर्ष की आयु में सन 437 हिजरी क़मरी के जमादिल अव्वल महीने में नासिर ख़ुसरो ने एक एसा सपना देखा जिसके बाद उनके भीतर बड़े गंभीर परिवर्तन हुए। कहते हैं कि उन्होंने सपने में देखा कि कोई पवित्र काबे की ओर संकेत करते हुए कह रहा है कि वास्तविकता वहां है। यह स्वपन देखने के बाद नासिर ख़ुसरो ने मक्के की यात्रा आरंभ की। इस यात्रा के बाद वे सात वर्षों तक मक्के में रहे जिसके दौरान उन्होंने वास्तविकता को समझा। मक्के में गुज़ारे इन सात वर्षों को नासिर ख़ुसरो के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस यात्रा के बाद नासिर ख़ुसरो के भीतर बहुत परिवर्तन आ चुके थे। इन सात वर्षों में से 4 साल उन्होंने मक्के में गुज़ारे और चार हज किये जबकि लगभग तीन सालों तक मिस्र में रहे। अब उनकी दृष्टि में संसार का कोई महत्व नहीं रह गया था। वे सांसारिक मायामोह से बहुत दूर हो चुके थे। अबतक उन्होंने राज दरबारों में जो वैभवशाली जीवन व्यतीत किया था उससे अब उन्हें घृणा हो चुकी थी। बाद में नासिर ख़ुसरो ने इस्माइलिया पंथ अपना लिया था और वे ईरान वापस आ गए। नासिर ख़ुसरो के यात्रा वृतांत में इन सात वर्षों के बारे में विस्तार से बताया गया है। स्वदेश वापसी के बाद नासिर ख़ुसरो, ईश्वर की उपासना में लग गए। अब वे राजदरबारों से बहुत दूर हो चुके थे और अपना समय ईश्वर की उपासना में ही गुज़ारा करते थे। वे अपना समय अधिकांश एकांत में व्यतीत किया करते थे।
नासिर ख़ुसरो की अपनी विशेष आस्था के कारण कुछ लोग उनके विरोधी हो गए थे। यही बात बल्ख़ से उनके निष्कासन का कारण बनी। एसे में जब उन्होंने अपने जीवन को संकट में पाया तो उन्होंने बदखशां में शरण ली। बदख़शां एक पहाड़ी क्षेत्र था जो नासिर ख़ुसरो के लिए एक सशक्त दुर्ग के रूप में था।
इस पहाड़ी क्षेत्र में एकांत में रहते हुए नासिर ख़ुसरो ने बहुत सी कविताएं कहीं हैं जिनमें उनके एकांतवास का उल्लेख मिलता है। एकांतवास में रहते हुए नासिर ख़ुसरो सन 481 हिजरी क़मरी में इस नशवर संसार से चले गए किंतु उनकी कविताएं और लेख आज भी बाक़ी हैं।
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