सैयद इस्माईल जुरजानी
“सैयद इस्माईल जुरजानी” ईरान के उन विख्यात चिकित्सकों में से एक हैं जिनकी ख्याति के बावजूद उनके जीवन के बारे में बहुत कम जानकारियां उपलब्ध हैं।
वे पाचवी हिजरी क़मरी के विख्यात ईरानी चिकित्सक थे।
सन 434 हिजरी क़मरी को ईरान के उत्तरी में स्थित गुरगान के निकट उनका जन्म हुआ था। बताया जाता है कि “सैयद इस्माईल जुरजानी” का संबन्ध इस्फ़हान के सादात से था। उन्होंने अपनी आरंभिक पढ़ाई गुरगान से आरंभ की थी। इस बात का भी अनुमान लगाया जाता है कि सैयद इस्माईल ने चिकित्सा के क्षेत्र में पढ़ाई भी गुरगान से ही आरंभ की थी। उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में गुरगान को विशेष महत्व प्राप्त था। अबूअली सीना जैसे महान विद्वान ने अपने जीवन का कुछ भाग गुरगान में व्यतीत किया। उन्होंने वहां पर पढ़ाने का भी काम किया। बूअली सीना ने अपनी विश्वविख्यात पुस्तक क़ानून का कुछ भाग गुरगान में ही लिखा था जो चिकित्सा विज्ञान के बारे में है जबकि कुछ का कहना है कि पूरी किताब गुरगान में ही लिखी गई। इसी प्रकार एक अन्य विख्यात चिकित्सक “अबुल फरज अली बिन हुसैन इब्ने हिंदू ने जिन्होंने “मिफ़्ताहुत्तिब” नामक पुस्तक लिखी है अपने जीवन का अधिकांश समय गुरगान में व्यतीत किया। वे वहां पर चिकित्सा शास्त्र पढ़ाया करते थे। 455 हिजरी क़मरी में उनका निधन गुरगान में ही हुआ था। कहते हैं कि “सैयद इस्माईल जुरजानी” ने गुरगान में इब्ने सीना के शिष्यों और अबुल फ़रज से या उनके शिष्यों से चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी।
“सैयद इस्माईल जुरजानी” ने अपने बारे में जो लिखा है उससे यह पता चलता है कि शिक्षा प्राप्ति के लिए उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं की थीं। चिकित्साशास्त्र के अध्ययन के लिए उन्होंने नेशापूर, ख़ुज़िस्तान और इराक़ के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कीं।
इन क्षेत्रों में सैयद इस्माईल की यात्राएं सिद्ध करती हैं कि उन्होंने जिन क्षेत्रों की यात्राएं कीं वहां पर पाचवीं हिजरी शमसी के दौरान चिकित्साशास्त्र के केन्द्र थे। उस काल में ईरान के पूर्वोत्तर में स्थित नेशापूर, ज्ञान का केन्द्र था। इस नगर में उस समय बड़े-बड़े अस्पताल थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि उस काल के चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करने से यह बात समझ में आती है कि नेशापूर जाने से सैयद इस्माईल का उद्देश्य वहां के महान विद्वानों से ज्ञान अर्जित करना था।
नेशापूर के अतिरिक्त रेयशहर, शीराज़ और इस्फ़हान में भी उस समय बड़े-बड़े अस्पताल थे जिनमें तत्कालीन विख्यात चिकित्सक मौजूद थे। इसके अतिरिक्त ख़ुज़िस्तान में भी बड़े अस्पताल पाए जाते थे।
सय्यद इस्माईल जुरजानी ने जिन नगरों में अपनी उपस्थिति की बात स्वीकार की है उनमें से एक, पवित्र नगर क़ुम भी है। जुरजानी के काल में क़ुम नगर को शीया बाहुल्य नगर के रूप में देखा जाता था। इस नगर में धार्मिक मामलों के वरिष्ठ शिक्षकों के अतिरिक्त चिकित्साशासत्र के भी कुछ विख्यात गुरू मौजूद थे। सैयद इस्माईल जुरजानी ने लिखा है कि उन्होंने क़ुम नगर में चौथी हिजरी के विख्यात खगोलशास्त्री Kushyar Gilani के बेटों से भेंटवार्ता की जिन्हें स्वयं चिकित्साशास्त्र से लगाव था। यह बात स्पष्ट नहीं है कि जुरजानी ने क़ुम की यात्रा क्यों की थी। इस बारे में केवल यही कहा जा सकता है कि उनकी यह यात्रा, 504 हिजरी क़मरी से पूर्व हुई थी। अपने यात्रा वृत्तांत में सैयद इस्माईल जुरजानी ने अपने युवाकाल में बल्ख़ और मर्व नगरों की यात्रा का भी उल्लेख किया है।
इस्माईल जुरजानी ने हालांकि अपने जीवन में शिक्षा की प्राप्ति के लिए विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कीं और वहां पर मौजूद दक्ष विद्वानों से ज्ञान अर्जित किया किंतु खेद की बात यह है कि उन गुरूओं के नामों से भी आम लोग अवगत नहीं हैं। उनके उस्तादों में से एक का नाम सादिक़ नैशापुरी है जिन्हें बुक़राते सानी अर्थात दूसरे बुक़रात या हीपोक्रेटिस के नाम से जाना जाता है। इब्ने सीना के उदय के साथ ही ईरान में चिकित्सा विज्ञान एक नए चरण में प्रविष्ट हुआ। बाद में इब्ने सीना के शिष्यों ने उनके ज्ञान को आगे बढ़ाया। इब्ने अबी सादिक़ भी इब्ने सीना के एक वरिष्ठ शिष्य थे। खेद की बात यह है कि इब्ने अबी सादिक़ के शिष्यों में मश्हूर केवल इस्माईल जुरजानी थी हैं।
अपनी पुस्तक “ज़ख़ीरे ख़ारज़्मशाही” में सैयद इस्माईल जुरजानी ने कई बार अपने जिस गुरू का उल्लेख किया है वे उस्ताद अहमद फ़र्रूख़ हैं। उनके विख्यात गुरूओं में से एक अबुल क़ासिम क़ुशैरी नीशापुरी हैं जिन्होंने उन्हें चिकित्साशास्त्र के अतिरिक्त कई अन्य विषयों की शिक्षा दी थी। वे ज़ैनुल इस्लाम के नाम से विख्यात थे। जुरजानी ने उनसे नैशापूर से आधुनिक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने चिकित्सा शास्त्र, दवाइयां बनाने और जानवरों के उपचार जैसे ज्ञानों को उनसे सीखा था। इसके बाद उन्होंने इन्ही विषयों पर पुस्तकें लिखीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने नैतिकशास्त्र, तर्कशास्त्र, साहित्य और अन्य विषय सीखे। “सैयद इस्माईल जुरजानी” को चिकित्साशास्त्र के अतिरिक्त इस्लामी विषयों का भी ज्ञान था।
“ज़ख़ीरे ख़ारज़्मशाही” के अध्ययन से पता चलता है कि में सैयद इस्माईल जुरजानी, ख़ुरासान के मर्व और बल्ख़ नगरों सहित कई नगरों में बीमारों का उपचार किया करते थे। उस समय ख़ुरासान इस्लामी संस्कृति और सभ्यता का केन्द्र हुआ करता था। उस समय ख़ुरासान के चार महत्वपूर्ण नगर इस प्रकार थे नेशापूर, मर्व, बलख़ और हेरात। युवा अवस्था में जुरजानी नैशापूर में मौजूद थे किंतु उनकी पुस्तक के अध्ययन से पता चलता है कि मर्व और बलख़ में उन्होंने क़ुम और रे शहर की यात्रा के बाद का समय व्यतीत किया जब वे अधेड़ थे।
उस काल में उन्होंने लोगों के उपचार के साथ ही साथ पढ़ाने का कार्य भी जारी रखा। शोधकर्ताओं का कहना है कि अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने मर्व में गुज़ारा था। एक अन्य महत्वपूर्ण विषय यह है कि जुरजानी संभवतः ईरान के राजा क़ुत्बुद्दीन मुहम्मद ख़ारेज़्मशाही से परिचित थे और शायद इसीलिए अपनी पुस्तक के शीर्षक में उन्होंने इसी नाम का प्रयोग किया है। इस पुस्तक को उन्होंने 504 हिजरी क़मरी में लिखा था और इस समय वे मर्व नगर में जीवन व्यतीत किया करते थे।