शेर की दुनिया- 9
Jul २९, २०२० ०७:३८ Asia/Kolkata
कुछ लोगों का मानना है कि शाहनामा, सामानी व ग़ज़नवी काल के सांस्कृतिक हालात और फ़िरदौसी के दोस्तों के सहयोग व समर्थन का परिणाम है ।
लेकिन सच्चाई यह है कि अगर हकीम अबुल क़ासिम फ़िरदौसी की बुद्धिमत्ता और प्रवीणता न होती तो शाहनामा ईरान के पारंपरिक इतिहास के बारे में एक काव्य रचना और बिना आत्मा वाली किताब बन कर रह जाता और शायद यह किताब आज तक जीवित न रहती और अबू मंसूरी के शाहनामे की तरह पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती या फिर उसके कुछ ही अंश बाक़ी रहते। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार की किताब, न तो अपनी राष्ट्रीय पहचान को बाक़ी रखने की ईरानियों की भावनाओं में कोई भूमिका निभा सकती थी और ही राष्ट्रीय भाषा की सुरक्षा में उसका कोई भाग होता।
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