नोटबंदी की बरसी या वर्षगांठ?
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पिछले वर्ष आज ही के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक पांच सौ और एक हज़ार के नोट बंद किए जाने की घोषणा करके देश को हैरान कर दिया था।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Nov ०८, २०१७ १३:०० Asia/Kolkata
  • नोटबंदी की बरसी या वर्षगांठ?

पिछले वर्ष आज ही के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक पांच सौ और एक हज़ार के नोट बंद किए जाने की घोषणा करके देश को हैरान कर दिया था।

इस अप्रत्याशित घोषणा से उनकी रातों की नींद उड़ गयी थी जिन्होंने अपने घर में बड़ी बड़ी राशि जमा करके रखी थीं। मोदी ने नोटबंदी के जो बड़े बड़े फ़ायदे बयान किए थे और उसके साथ साथ देश की आर्थिक स्थिति सुधरने और कालेधन से मुक्ति मिलने का जो विश्वास दिलाया था, उसके कारण हम जैसे लोग भी भारत सरकार की इस कार्यवाही के समर्थक थे।

 

हालांकि ख़ाली हाथ होने के बावजूद हम जैसों की ज़िंदगी भी प्रभावित हो रही थी और वही एटीएम जो किसी ज़माने में ख़ाली पड़ा रहता था, वह कूचए जानां में तब्दील हो चुका था। तरकारी ख़रीदने के लिए भी बिग बास्केट और ग्रोफ़र्स का सहारा लेना पड़ रहा था ताकि पैसे नक़द देने के बजाए कार्ड से दिए जाएं किन्तु वह लोग जिनके पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड नहीं थे, उनकी हालत तो बहुत अधिक पतली थी, उनको तो सौ रुपये का नोट भी सोच सोसच कर ख़र्च करना पड़ रहा था। हालात ऐसे हो गये थे कि जिन्होंने कभी राशन की दुकान पर भी लाइन नहीं लगाई थी वह भी बैंकों के बाहर इस प्रकार खड़े थे कि जैसे मंदिरों के आगे लंगर लेने वाले श्रद्धालु पीठ से तोंद मिलाए खड़े रहते हैं।


भारत ने जिन नये नोटो की घोषणा की थी उनका दिखाई देना रुख़े महबूब की ज़ियारत जैसा हो गया था और लोग तो उसी लाइन में लगे लगे ही दुनिया से सिधार गये, जहां उनको अपने ही पैसे निकालने के लिए धक्के खाना पड़ रहे थे, फिर भी इस देश के धैर्यवान लोगों ने तनिक भी शिकायत नहीं की क्योंकि मोदी जी कह रहे थे कि तुम मुझे पचास दिन दो मैं तुम्हें काले धन से स्वतंत्रता दूंगा। पचास दिन क्या 365 दिन गुज़र गये और रिज़र्व बैंक के ख़ज़ाने में सारे रद्द हुए नोट भी आ गये लेकिन जनता के घरों में ख़ुशहाली नहीं आई। आम लोगों के बेरोज़गार होने की सूचनाएं तो आईं, कारख़ाने बंद होने की सूचनाएं तो मिलीं, मज़दूरों ने अंतिम गीत गाते हुए अपने देश की ओर कूच किया किन्तु न तो कालेधन का कुछ पता लगा न उन लोगों के पकड़े जाने के बारे में कोई सूचना आई जिन को पकड़कर जेल की सलाख़ों के पीछे डालने के लिए यह सारा जाल बिछाया गया था।

 

मोदी जी ने नोटबंदी का सीधा प्रभाव तो यह बताया था कि कालाधन जमा करने वाले तबाह व बर्बाद हो जाएंगे और साइड इफ़ेक्ट यह बताए थे कि जाली नोट बनाने वाले कारख़ाने ठप्प हो जाएंगे, आतंकवादियों की कमर टूट जाएगी, नक्सलवादी गली गली में भीख मांगने पर मजबूर हो जाएंगे, मां के एकाउंट में बेटा पैसा भरने पर मजबूर हो जाएगा और नौकर के नाम पर मालिक लोग जो रुपये बैंक में जमा करवाएंगे, उसका मालिक नौकर ही हो जाएगा। हमें नहीं मालूम कि कितने नौकरों के नाम से उनके मालिकों ने पैसे जमा किए, हमको उन मांओं के बारे में भी कुछ पता नहीं जिनके खातों में उनकी नाकारा संतानों ने मजबूरी में पैसे डाल दिए। हम को अब तक न ही इसका अनुमान लगा कि आतंकवादी बर्बाद हो गये या नहीं या जाली नोट बनाने वाले बेकार हो गये? देश से भ्रष्टाचार किस सीमा तक समाप्त हुआ, इसकी भी हमको कोई सूचना नहीं क्योंकि जिन कार्यालयों में रिश्वत चलती थी वहां अभी तक यह काम बिना रोक टोक के हो रहा है। मरे पर सौ दुर्रे यह कि अचानक जीएसटी की तलवार चल पड़ी और जनता के साथ साथ दुकानदारों का दम भी निकल गया।

 

उधर रिज़र्व बैंक ने भी घोषणा कर दी कि 99 प्रतिशत रद्द नोट वापस आ गये, इसलिए कालेधन का जनाज़ा निकलने की जो आशा थी वह बैंड बाजे  और बारात में परिवर्तित होकर संसद मार्ग पर निकल पड़ी, मगर सरकार का यह दावा ख़त्म नहीं हुआ कि नोट बंदी ने भारतवासियों का भाग्य ही बदल दिया है, बाज़ारों में बहार है, व्यापारियों के चेहरों पर निखार है और जनता प्रसन्न है। दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां हैं जो नोटबंदी को पूरी तरह से विफल बता रहे हैं, दावों और जवाबी दावों की इस आग के बीच में फंसी हुई जनता ग़ौर से देखकर यह समझने का प्रयास कर रही है कि यह विवाह के फेरों का अग्निकुंड है या बदतर आर्थिक व्यवस्था की चिता का सुलगता हुआ अलाव?

साभार शकील शम्सी