कौन हैं सावरकर जिन्हें मोदी भारत रत्न से सम्मानित करना चाहते हैं
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सत्ताधारी पार्टी बीजेपी महात्मा गांधी की हत्या की साज़िश के आरोप में जेल काटने वाले और ख़ुद को अंग्रेंज़ों का सबसे आज्ञाकारी नौकर बताने वाले चितपावन ब्राह्मण विनायक दामोदर सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की वकालत कर रहे हैं।
सावरकर कौन हैं और हिंदुत्व से उनका क्या रिश्ता है?
सारवरकर (1883-1966) अपने शुरूआती जीवन में एक स्वतंत्रता सेनानी थे और भारत पर अग्रेंज़ों के क़ब्ज़े का विरोध करते थे, लेकिन अंग्रेज़ों की क़ैद में रहने के दौरान उनके विचारों में बड़ा अंतर आया और वे अंग्रेज़ों का विरोध त्यागकर उनके वफ़ादार बन गए।
जेल से आज़ाद होने के लिए उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को 6 पत्र लिखे। जुलाई 1911 में अंडमान पहुंचने के बाद 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफ़ीनामा लिखा, इसके बाद 9 वर्षों के दौरान सारवरकर ने अंग्रेज़ों को 6 माफ़ीनामे लिखे।
दया के लिए अंग्रेज़ों के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित करने बाद सावरकर जेल से रिहा हो गए और उसके बाद उन्होंने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने से परहेज़ किया, बल्कि अंग्रेज़ अधिकारियों के साथ मिलकर स्वतंत्रता सेनानियों का मुक़ाबला करने लगे।
अंडमान से वापस लौटने के बाद सावरकर ने एक पुस्तक लिखीः हिंदुत्व, हू इज़ हिंदू?
इस पुस्तक में उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया। उन्होंने लिखा कि इस देश का इंसान मूलत: हिंदू है। इस देश का नागरिक वही हो सकता है जिसकी पितृ भूमि, मातृ भूमि और पुण्य भूमि यही हो। इस परिभाषा के मुताबिक़, मुसलमान और ईसाई कभी भी भारत के नागरिक नहीं सकते।

जिस समय सुभाष चंद्र बोस भारत में अंग्रेज़ों से मुक़ाबला करने के लिए अपनी भारतीय राष्ट्रीय सेना का विस्तार कर रहे थे, उस समय सावरकर ने अंग्रेज़ सरकार की लाखों भारतीयों को ब्रिटिश-भारतीय सशस्त्र सेना में भर्ती कराने में मदद की। उन्होंने अपनी हिंदुत्व विचारधारा को आगे बढ़ाकर स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक कमज़ोर करने में अंग्रेज़ी शासन की मदद की, इसलिए कि जहां एक ओर भारतीय एकजुट होकर ब्रिटिश साम्राज्य का सामना करने का प्रयास कर रहे थे, वहीं अंग्रेज़ों की फूट डालो और राज करो की नीति का मोहरा बनने वाले सावरकर ने समाज को साम्प्रदायिक लाइन पर बांटने में अहम भूमिका निभाई।
भारत की आज़ादी के बाद 1948 में महात्मा गांधी की हत्या की साज़िश रचने के आरोप में सावरकर को मुंबई से गिरफ़्तार किया गया, लेकिन सुबूतों के अभाव में फ़रवरी 1949 में बरी कर दिया गया।
उसके बाद सारवकर 1966 तक ज़िंदा रहे, लेकिन उन्हें उसके बाद देश में कभी स्वीकार्यता नहीं मिली।
हालांकि वे औपचारिक रूप से कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य नहीं रहे, लेकिन उनके अतिवादी विचारों के कारण संघ परिवार उन्हें अपना आदर्श मानता है।
ऐसे व्यक्ति के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेता व पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्पति के.आर नारायणन के पास सावरकर को भारत रत्न देने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया था।
लेकिन अब एक बार फिर मोदी सरकार और बीजेपी सावरकर को भारत रत्न से सम्मानित करने एलान कर रहे हैं, और इस बार उनके में कोई रुकावट बनने भी नहीं जा रहा है। msm