ईरान की आज़ादी का ध्वज, तबरेज़ियों ने उठा रखा है
पूर्व पहलवी तानाशाही शासन के ख़िलाफ़ तबरेज़ की जनता के ऐतिहासिक आंदोलन की वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर ईरान के आज़रबाइजान शर्क़ी प्रांत के लोगों ने इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई से मुलाक़ात की है।
बुधवार की सुबह हुई इस मुलाक़ात में वरिष्ठ नेता ने कहा कि 22 बहमन को ईरानी राष्ट्र ने स्पष्ट संदेश दे दिया कि वह इस्लामी लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थक है।
उन्होंने कहा कि समर्थन की आवाज़ सबसे ऊंची थी, हालांकि विरोधी आवाज़ें भी थीं, और दुनिया के दुश्मन मीडिया साम्राज्य ने कि जिस पर ज़ायोनियों और अमरीकियों का क़ब्ज़ा है, उन आवाज़ों को अधिक ऊंचा करने का प्रयास किया, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। राष्ट्र की आवाज़ दूसरों की आवाज़ पर हावी हो गई।
वरिष्ठ नेता का कहना था कि 29 बहमन सन् 1356 हिजरी शम्सी की तारीख़, ईरान के इतिहास की एक महत्वपूर्ण तारीख़ है, यह ऐसी तारीख़ थी, जिसने राष्ट्र के भविष्य का निर्धारण किया। उससे पहले क़ुम की जनता ने जो आंदोलन शुरू किया था, तबरेज़ के लोगों ने उसे एक क्रांति में बदल दिया। इस घटना ने एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप धारण कर लिया था।
तानाशाही शासन इतना बेबस हो गया था कि उसने सड़कों पर टैंक उतार दिए थे और लोगों का नरसंहार किया था। लेकिन तबरेज़ के नागरिक पीछे नहीं हटे। उन्होंने क़ुर्बानी दी और ख़ून दिया और आंदोलन को राष्ट्रव्यापी कर दिया। उसके बाद एक साल से भी कम समय में शाही शासन का पतन हो गया। इसे कहते हैं ऐतिहासिक घटना।
इस साल 22 बहमन को भी ईरानी राष्ट्र ने कुछ ऐसा ही प्रतिरोध दिखाया है। अगर हम इस दृष्टि से इसका जायज़ा लेगें, तो देखेंगे कि लोग सड़कों पर निकल कर आए। सड़कों पर लोगों के आने के विभिन्न कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लोग प्रतिरोध के उद्देश्य से बाहर निकले।
ईरान में पिछले दिनों हुए दंगों का का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह था कि लोग 22 बहमत को भूल जायें। क्रांति की सफलता की वर्षगांठ पर लाखों की संख्या में लोग घरों से नहीं नकलें। लेकिन लोगों ने प्रतिरोध किया और वे निकले। इस प्रतिरोध में बरकत है। msm