ईरान ने ईंट का जवाब पत्थर से दिया
ईरान ने यूरोपीय संघ के नये प्रतिबंधों के जवाब में कुछ व्यक्तियों और यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की कुछ संस्थाओं का नाम प्रकाशित किया है।
तेहरान ने जिन संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाया है उनमें 13 संस्थायें और 15 यूरोपीय और 8 ब्रितानी हैं। जिन यूरोपीय और ब्रितानी व्यक्तियों पर तेहरान ने प्रतिबंध लगाया है उनके लिए वीज़ा जारी नहीं किया जायेगा, उनके इस्लामी गणतंत्र ईरान की सीमा में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, उनके साथ बैंकिंग लेनदेन बंद और इस्लामी गणतंत्र ईरान की सीमा में उनकी सम्पत्ति को फ्रीज़ कर दिया गया है।
मंगलवार को विदेशमंत्रालय की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि आतंकवाद और आतंकवादी गुटों का समर्थन करने, आतंकवादी कार्यवाहियों के लिए उकसाने, ईरानी लोगों के खिलाफ हिंसात्मक कार्यवाहियां और ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने और इसी प्रकार ईरान के बारे में ग़लत और झूठी जानकारियों का प्रचार और ईरानी लोगों के खिलाफ अत्याचारपूर्ण प्रतिबंधों को कड़ा करने में शामिल होने के कारण यूरोपीय संघ और ब्रितानी संस्थाओं व व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाया जाता है। ईरान ने यह जवाबी कदम उस समय उठाया जब सोमवार को यूरोपीय संघ ने दो ईरानी संस्थाओं और 32 ईरानी व्यक्तियों पर मानवाधिकार के हनन के संबंध में प्रतिबंध की घोषणा की थी।
सवाल यह पैदा होता है कि अमेरिका और यूरोपीय व पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ इतना प्रतिबंध क्यों लगाते हैं? क्या इन प्रतिबंधों से उनके लक्ष्य हासिल हो जाते हैं? इसका जवाब स्पष्ट है। अमेरिका और यूरोपीय व पश्चिमी देश ईरान की इस्लामी व्यवस्था को अपनी वर्चस्वादी नीतियों व लक्ष्यों के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट समझते हैं। पश्चिमी व यूरोपीय देश यह चाहते हैं कि ईरान उनकी वर्चस्ववादी मांगों के सामने घुटने टेक दे परंतु गत 43 वर्षों से अधिक का इतिहास इस बात का साक्षी है कि ईरान ने कभी भी उनकी वर्चस्ववादी मांगों के सामने न घुटने टेके हैं और न टेकेगा।
पश्चिमी और साम्राज्यवादी देश इस बात से चिंतित हैं कि उनके कड़े प्रतिबंधों के बावजूद ईरान विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है और ईरान का यह अमल दूसरे देशों और बहुत से लोगों के लिए उदाहरण बनता जा रहा है और ईरान के अमल से पूरी दुनिया में यह संदेश जा रहा है कि विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियों पर निर्भर हुए बिना प्रगति की जा सकती है। गत 43 साल पहले की तुलना में इस्लामी गणतंत्र ईरान आज बहुत मज़बूत हो चुका है जबकि उसे हमेशा विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों का सामना रहा है और आज जो उसने विभिन्न क्षेत्रों में ध्यान योग्य प्रगति की है वह सब प्रतिबंधों के काल की हैं।
ईरान की इस्लामी व्यवस्था के दुश्मनों को अच्छी तरह पता है कि सैन्य हमला करके भी वे तेहरान को नहीं झुका सकते और इसके भयावह परिणामों से भी वे बहुत अच्छी तरह अवगत हैं और अगर सैन्य हमला करके ईरान को झुकाना संभव होता तो अब तक वे यह कार्य कर चुके होते पर उन्हें इसके अंजाम की बहुत अच्छी जानकारी है इसलिए वे इस प्रकार का दुस्साहस नहीं कर सके हैं। इसलिए ईरान को झुकाने और उसकी प्रगति को रोकने के लिए विवश होकर उन्होंने प्रतिबंध का रास्ता अपनाया है और उनकी यह नीति भी विफल रहेगी जिस तरह से गत 43 वर्षों से नाकाम होती रही है। MM
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