दुश्मन क्यों कर रहे हैं चुनाव के बहिष्कार की मांग?
ईरान में संसद और वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली समिति के चुनाव मे अब केवल दो सप्ताहों का समय शेष है।
ईरान मे पहली मार्च 2024 को संसद और वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली समिति या मजलिसे ख़ुबरगान के चुनाव होंगे। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने इसके लिए वास्तविक प्रतिस्पर्धा, निष्पक्षता, संपूर्ण सुरक्षा और जोशीली भागीदारी जैसे मुद्दों को पेश किया है।
दूसरी ओर दुशमनों ने प्रतिस्पर्धा और निष्पक्षता पर प्रश्न लगाते हुए जनता से इनके बहिष्कार की मांग की है। हालांकि उनकी बातों में ही विरोधाभास पाया जाता है। एक ओर तो दुश्मन देश के चुनाव को दिखावटी चुनाव दर्शाने के प्रयास कर रहे हैं तो इस हिसाब से उनका कोई महत्व ही नहीं है। जिस चीज़ का कोई महत्व ही नहीं है उसमें भागीदारी से रोकने के लिए क्यों दुश्मन अपने सारे संसाधनों के साथ मैदान में है। इसके वास्तव में कुछ कारण हैं।
उदाहरण के लिए दुश्मन को भलिभांति ज्ञात है कि ईरान में चुनाव दिखावटी नहीं होते हैं बल्कि वे सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की भूमिका बनते हैं। जहां पर दुश्मन देश के भीतर अशांति और उपद्रव फैलाता है वहीं पर चुनाव उनके मुक़ाबले में आते हैं। देश के चुनाव वास्तव में राष्ट्रीय एकता की भूमिका प्रशस्त करते हैं जिसको वरिष्ठ नेता भी अपने संबोधन में बता चुके हैं। राष्ट्रीय एकता, संप्रभुता को मज़बूत बनाती है। देश के दुश्मन किसी ही हाल में राष्ट्रीय एकता और देश की मज़बूत संप्रभुता के पक्ष में नहीं रहे हैं। देश के भीतर मतभेद फैलाने और अशांति उत्पन्न करने से ही दुश्मन के हितों की पूर्ति हो सकती है।
यही कारण है कि जैसे ही ईरान में चुनाव के आयोजन की बात शुरू होती है वे तुरंत ही उसके बहिष्कार की बातें करने लगते हैं। इस बात को वे आगामी चुनाव में कुछ ज़्याद ही पेश करना चाहते हैं। इसका कारण यह है कि पिछले साल की अशांति से दुश्मन अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए। एसे में वे लोगों से चुनाव के बहिष्कार का आह्वान करके चुनाव पर ही सवालिया निशान लगाना चाहते हैं।
इस्लामी गणतंत्र ईरान के शत्रु जिनकी मनोकामना थी कि देश की इस्लामी व्यवस्था अपने गठन के 40 साल पूरे न करने पाए, इस समय जनता को व्यवस्था से दूर करने में लगे हुए हैं। मीडिया के माध्यम से वे यह दर्शाने के प्रयास कर रहे हैं किं मानो ईरान की जनता इस देश की व्यवस्था के साथ नहीं है। अपने इस झूठे दावे को सिद्ध करने के लिए वे न जाने कितने प्रकार के हथकण्डे अपना रहे हैं जो विगत की ही भांति निश्चित रूप में विफल हो जाएंगे।