इसे कहते हैं अपने हाथ से खोदे हुए गढ़े में गिरना
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अमरीका दुनिया की महाशक्ति कहे जाने का सपना हमेशा से देखता रहा है लेकिन आज हालत यह है कि वह अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहा है और उसकी विदेश नीति धूमिल पड़ती जा रही है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Nov ०४, २०१७ १४:२० Asia/Kolkata
  • इसे कहते हैं अपने हाथ से खोदे हुए गढ़े में गिरना

अमरीका दुनिया की महाशक्ति कहे जाने का सपना हमेशा से देखता रहा है लेकिन आज हालत यह है कि वह अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहा है और उसकी विदेश नीति धूमिल पड़ती जा रही है।

अमरीकी अधिकारियों की धमकियां, ग़ैर कूटनयिक भाषा और आग उगलने की सनक के चलते यह देश भीतर और बाहरी स्तर पर संकटों के भंवर में फंसता जा रहा है।

ट्रम्प प्रशासन ग़लतियां पर ग़लतियां कर रहा है और इसका फ़ायदा रूस और ईरान को मिल रहा है हालांकि ट्रम्प सरकार की कोशिश यह है कि इन देशों को कोई फ़ायदा न पहुंचने पाए बल्कि जहां तक संभव हो नुक़सान पहुंचे। मगर ट्रम्प की योजनाओं और दिली इच्छा के विपरीत ईरान और रूस के संबंध में बहुत तेज़ी से विस्तार हो रहा है और दोनों देश स्ट्रैटेजिक मामलों में सहयोग कर रहे हैं। हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन ने तेहरान का जो दौरा किया और जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति रूहानी से वार्ता के बाद इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई से मुलाक़ात की इस मुलाक़ात में आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने एक प्रस्ताव दिया जिसकी गूंज वाइट हाउस के भीतर लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी। यह प्रस्ताव था मास्को और तेहरान को अलग थलग करने वाले अमरीका को ही अलग थलग कर देना।

आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने प्रस्ताव दिया कि आर्थिक लेनदेन में अमरीकी डालर का प्रयोग बंद कर दिया जाए और अमरीका को अलग थलग करने के लिए मिलकर काम किया जाए। उन्होंने कहा कि हम अमरीकी प्रतिबंधों को नाकाम बनाने और अमरीका को एकांतवास में डाल देने में सक्षम हैं।

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने सीरिया में ईरान और रूस के सफल सहयोग की ओर संकेत किया और कहा कि इस सहयोग के अच्छे परिणामों से साबित हो गया कि तेहरान और मास्को कठिन मैदानों में संयुक्त हित साध सकते हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन ने ईरान के साथ रूस के सहयोग को अत्यंत सार्थक बताया।

इस समय प्रयोग की वस्तुओं के मामले में भी रूस और ईरान के बीच महत्वपूर्ण सहयोग हो रहा है। ईरान का सेंट्रल बैंक चीन और जापान की कंपनियों से भी बहुत महत्वपूर्ण रूप से सहयोग कर रहा है। यह भी अमरीका के लिए गहरी चिंता की बात है। क्योंकि ईरान की नीति डालर के बजाए नेशनल करेन्सी में सौदे करने की है। यदि ईरान, रूस, चीन और तुर्की आपस में नेशनल करेन्सी में लेनदेन शुरू कर देते हैं तो इसके कछ महत्वपूर्ण नतीजे होंगे। एक तो जर्मनी, फ़्रांस और इटली जैसे देश इन देशों के साथ निश्चिंत होकर आर्थिक लेनदेन कर सकेंगे क्योंकि उन्हें अमरीका के प्रतिबंधों का डर नहीं रह जाए। दूसरे यह कि नए प्रकार के एलायंस का रास्ता साफ़ होगा।

इस बीच एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ है कि रूस पश्चिमी एशिया के देशों को एस400 मिसाइल ढाल व्यवस्था बेच रहा है। रूस ने तुर्की को एस-400 व्यवस्था देने की हामी भर ली है। इस पर अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों ने आपत्ति भी जताई लेकिन यह समझौता इसके बाद भी हो गया। रूस ने सऊदी अरब को भी एस400 व्यवस्था देने की घोषणा पहले ही कर दी है। मिस्र ने भी इस सिस्टम में अपनी रूच जता दी है।

रूस ने ईरान को पहले ही एस300 मिसाइल व्यवस्था बेची है तथा ईरान से अपने संबंधों  विस्तार पर बार बार ज़ोर दे रहा है।

मध्यपूर्व में ईरान और रूस के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर अमरीका की चिंता बढ़ना तय है। अमरीकी युद्ध मंत्रालय की प्रवक्ता मिशल बल्डान्ज़ा ने स्पष्ट रूप से कहा भी कि रूस के साथ सऊदी अरब के एस400 मिसाइल ढाल व्यवस्था के सौदे पर वाशिंग्टन को गहरी चिंता है क्योंकि हमने बार बार कहा है कि हमारे घटक देशों के हथियार अमरीकी हथियार से समन्वित होने चाहिएं।

अमरीका ने मध्यपूर्व के सारे समीकरण 1980 के दशक में उस समय बदल दिए थे जब उसने कुछ देशों को एफ15 और एफ 16 विमान बेचे थे। इनमें विशेष रूप से मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब शामिल थे। अब रूस की बारी आ गई है कि और वह एस400 मिसाइल व्यवस्था बेचकर एक बार फिर समीकरणों को बदलने का इरादा कर लिया है। रूस की संभवतः यह कोशिश है कि मध्यपूर्व के क्षेत्र में शक्ति का संतुलन बना रहे।

सीरिया  संकट में रूस ने ईरान के साथ मिलकर जो प्रयास किए उनके नतीजे में दाइश का सफ़ाया होने ही वाला है  जबकि अमरीका के लिए सारे रास्ते बंद होते जा रहे हैं।

अमरीका ने ईरान और रूस के विरुद्ध प्रतिबंधों की जो नीति अपनाई है वह ख़ुद वाशिंग्टन के गले का फंदा बन गई है।

नोटः इनपुट अलवक़्त और रायुल यौम से