आतंकवाद और उसके समर्थकों की विफल नीतियां!
पश्चिम और उसके कुछ अरब पिटठुओं ने ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से ही ईरानी राष्ट्र को नुक़सान पहुंचाने के लिए आतंकवाद का समर्थन किया है।
इस संदर्भ में आतंकवाद के समर्थकों ने " कोमला" से लेकर " दाइश" जैसे भयानक आतंकवादी संगठनों का भरपूर समर्थन किया है और उनकी हर तरह से मदद की है। कुछ समय पहले अहवाज़ में आतंकी हमले के ज़िम्मेदार " अलअहवाज़िया" आतंकवादी गुट का समर्थन और अब चाबहार में आतंकी हमला कुछ हालिया नमूने हैं। गुरुवार को चाबहार में होने वाले आतंकी आत्मघाती हमले से एक बार फिर यह सिद्ध हो गया कि ईरानी राष्ट्र के शत्रु, ईरान में अशांति फैलाने के लिए प्रयासरत हैं। वास्तव में दुश्मनों से, इस्लामी गणतंत्र ईरान की शक्ति सहन नहीं हो रही है क्योंकि वह पूरी शक्ति से उनके सामने डटा है और उसने आतंकियों और उनके समर्थकों के मुंह पर तमांचा भी मारा है। आईआरजीसी के प्रवक्ता जनरल रमज़ान शरीफ ने भी कहा कि आतंकवादी गुट, प्रायः सऊदी खुफिया एजेन्सियों सहित विदेशी एजेन्सियों से संबंधित होते हैं और उनकी कोशिश होती है कि ईरान के सीमावर्ती क्षेत्रों में अशांति पैदा की जाए। इन हालात में यह बिल्कुल स्पष्ट है कि गुरुवार को चाबहार की आतंकी घटना के पीछे आतंक व विनाश के त्रिमूर्ति अर्थात अमरीका, सऊदी अरब और इस्राईल का हाथ है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बिन सलमान खुल कर कह चुके हैं कि अशांति को ईरान के भीतर ले जाएंगे। ट्रम्प ने भी बार बार यह कहा है कि वह ईरान में जैसे भी संभव हो, व्यवस्था बदलने के इच्छुक हैं और यह कि हम ईरान के भीतर अशांति पैदा कर सकते हैं।
चाबहार की आतंकी घटना का सैनिक महत्व नहीं है किंतु इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि इस क्षेत्र में , ईरान की एक अत्याधिक महत्वपूर्ण बंदरगाह स्थित है। बहरहाल यह तो निश्चित है कि आंतकवादियों और इस हमले के ज़िम्मेदारों को जहां भी होंगे और जिस रूप मे भी होंगे, सज़ा तो मिलेगी । (Q.A.)