संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेष रिपोर्टर का दोहरा मानदंड
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ईरान में मानवाधिकारों के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेष दूत के दोहरे मानदंड की निंदा की जा रही है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Mar ०३, २०१९ १२:२२ Asia/Kolkata

ईरान में मानवाधिकारों के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेष दूत के दोहरे मानदंड की निंदा की जा रही है।

ईरान की न्यायपालिका के मानवाधिकार आयोग ने एक बयान जारी करके ईरान में मानवाधिकारों के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विशेष दूत के दोहरे मानदंड की निंदा की है।  इस बयान में राष्ट्रसंघ के विशेष दूत जावेद रहमान के दावों को दोहरे मानदंडों पर आधारित बताते हुए कहा गया है कि विभिन्न संचार माध्यमों के साथ राष्ट्रसंघ के विशेष दूत के इन्टरव्यू को राष्ट्रसंघ के नियमों के विपरीत बताया।  बयान में कहा गया है कि विशेष दूत के विभिन्न संचार माध्यमों विशेषकर बीबीसी को दिये गए साक्षात्कार, उन नियमों का उल्लंघन हैं जिन्हें विशेष दूत के लिए परिभाषित किया गया है।  बयान के अनुसार अगर राष्ट्रसंघ का मानवाधिकार आयोग, जावेद रहमान को उनकी ग़लती से रोक नहीं सकता तो फिर तेहरान, इस आयोग के साथ सहयोग पर पुनर्विचार करेगा।  मानवाधिकारों का विषय एसा विषय है जो सामान्यतः दुनिया के राष्ट्रों के बीच चर्चा में रहता है।  वर्तमान समय में मानवाधिकार के मुद्दे को राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हथकण्डे के रूप में प्रयोग किया जाता है।

मानवाधिकारों के संदर्भ में दोहरे मानदंड अपनाए जाने के बारे में एक टीकाकार "राबर्ट फैंटीना" कहते हैं कि जब हम मानवाधिकारों के बारे में चर्चा करते हैं तो यह समझना होगा कि इसका अर्थ क्या है? मानवाधिकार के घोषणापत्र पर अमरीका सहित विश्व के कई देशों ने हस्ताक्षर किये थे।  इसमें मानवाधिकारों के समस्त आयामों को दृष्टिगत रखा गया है और उनका अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन किया जाना चाहिए।  इतना होने के बावजूद अमरीका, मानवाधिकारों के नियमों के प्रति कटिबद्ध नहीं है।  सऊदी अरब तथा इस्राईल जैसे रक्त पिपासू शासनों का अमरीका द्वारा समर्थन, अमरीका के मानवाधिकारों के समर्थन के दावों की पोल खोलता है।  इस प्रकार के दोहरे मानदंडों के कारण विश्व स्तर पर उसकी विश्वसनीयता कम हो रही है।

 इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने अपने एक भाषण में अमरीका के हाथों मानवाधिकारों के खुले उल्लंघन का उल्लेख करते हुए कुछ उदाहरण पेश किये हैं जैसे बिल क्लिंटन के काल में डेविडियन पंथ के लोगों का जलाया जाना, ग्वानतानामो और अबूग़ुरैब में बंदियों को यातनाएं देना, अफ़ग़ानिस्तान तथा इराक़ में अमरीकियों के हाथों लोगों के साथ दुरव्यवहार, दाइश जैसे ख़ूंख़ार आतंकी गुट को अस्तित्व देना, फ़िलिस्तीनियों के हत्यारों का खुलकर समर्थन करना और इसी प्रकार की बहुत सी घटनाओं के दृष्टिगत यदि संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीका पर निर्भर नहीं है तो उसको इन घटनाओं की गंभीरता के साथ जांच करनी चाहिए।