ईरान , जो बाइडन का सामना कैसे करेगा? एक दिलचस्प रिपोर्ट
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हालांकि अमरीका में अभी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुई  है और अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा का कहना है कि अमरीकी समाज में  गहरा विभाजन पाया जाता है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Nov १०, २०२० १५:३३ Asia/Kolkata
  • ईरान , जो बाइडन का सामना कैसे करेगा? एक दिलचस्प रिपोर्ट

हालांकि अमरीका में अभी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुई  है और अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा का कहना है कि अमरीकी समाज में  गहरा विभाजन पाया जाता है।

इसी तरह रिचर्ड हास भी चुनावी विवाद का उल्लेख करते  हुए एक राष्ट्र दो सरकार से  भी आगे  बढ़ कर अमरीका को  एक देश दो राष्ट्र कह रहे हैं लेकिन ईरान में भी कुछ गलियारे विचित्र प्रकार की प्रतिक्रिया प्रकट कर रहे हैं। इन गलियारों को लग रहा है कि ईरान की अर्थ व्यवस्था को संभालने वाले का अमरीका में उदय हो गया है जबकि कुछ लोगों का कहना है कि बाइडन के आने से हालात और खराब होंगे लेकिन सब कुछ गलत सोच का नतीजा है। अगर एसा है तो फिर इस सवाल का क्या जवाब है कि बाइडन अवसर हैं या खतरा? इसका जवाब यह है कि बाइडन ईरान के लिए एक अवसर भी हो सकता है लेकिन सब कुछ ईरान की रणनीति पर निर्भर करता है।  इस सिलसिले में कुछ बातें याद रखी जानी चाहिए।

     पहली बात यह है कि जो बाइडन अमरीकी सत्ता के गलियारे में कोई अजनबी नहीं हैं बल्कि वह तीन दशकों से अधिक समय से अमरीका की सत्ता में मौजूद है इसी तरह सन 2008 से लेकर 2016 के बीच अमरीका के उप राष्ट्रपति भी रहे हैं। ईरान के बारे में वह कड़ा रुख रखते हैं जिसे उन्हों ने औपचारिक रूप से भी प्रकट किया है और समाचारपत्रों में अपने आलेखों में भी उनका उल्लेख किया है।  इस लिए यह तो निश्चित है कि ईरान पर दबाव डालने की नीति के मामले में बाइडन भी ट्रम्प और ओबामा जैसा ही नज़रिया रखते हैं लेकिन रणनीति और शैली के मामले में वह ट्रम्प से अलग हैं। बाइडन का मानना है कि ईरान पर अधिकतम दबाव की ट्रम्प की नीति प्रभावी नहीं थी इस लिए वह स्मार्ट अधिकतम दबाव की शैली अपनाना चाहते हैं और वास्तव में ट्रम्प की इच्छा और उद्देश्य को, ओबामा की शैली में पूरा करने का प्रयास करेंगे ज़ाहिर सी बात है ईरान में भी संबंधित विभाग चुप नहीं बैठे हैं और वह भी बाइडन से मुकाबले की तैयारी कर रहे हैं।

 

     दूसरी बात यह है कि बाइडन की स्मार्ट अधिकतम दबाव की नीति में ईरान पर नये प्रतिबंध लगाने और युद्ध के खतरे की कोई गुंजाइश नहीं है  जहां तक प्रतिबंधों की बात है तो हालिया सप्ताहों में स्वंय अमरीकी अधिकारियों ने कहा है कि ईरान के खिलाफ लगाने के लिए अब कोई प्रतिबंध बचा ही नहीं है। जहां तक युद्ध और सैन्य कार्यवाही की बात है तो यह नीति भी सन 2000 से ही हटायी जा चुकी है और स्वंय अमरीकी अब कहते हैं कि युद्ध और सैन्य कार्यवाही की बात मनोवैज्ञानिक  दबाव के लिए की जाती है। परमाणु समझौते के बाद भी ईरान ने अमरीकी सरकार के पास विकल्पों को सीमित कर दिया जो निश्चित रूप से एक बड़ा काम है। अब बाइडन के पास प्रोपगेंडा और मनोवैज्ञानिक युद्ध के अलावा कोई और विकल्प बचा हुआ नहीं लगता। 

     अमरीकी  प्रतिबंधों  से ईरान की अर्थ व्यवस्था पर प्रभाव पड़ा है लेकिन ईरान की आर्थिक दशा को अधिक खराब करने की प्रतिबंधों  में क्षमता ही नहीं। बाइडन को इस सब चीज़ों पर ध्यान देना होगा।

     तीसरी बात यह है कि ईरान के रणनीतिकारों को यह ध्यान रखना होगा कि अब से 6 – 7 साल पहले जो कुछ हुआ वह फिर से न हो और ईरान में अमरीका से वार्ता की रूचि नहीं पैदा होना चाहिए वर्ना फिर ईरान छे सात साल पीछे चला जाएगा।

 

     चौथी बात यह है कि जैसे ही अमरीकी मीडिया ने बाइडन की जीत का एलान किया ईरान में डालर का रेट गिर गया जबकि कोई एसी घटना नहीं घटी थी जिसे आर्थिक रूप से प्रभावी समझा जाए जिससे यही साबित होता है कि अर्थ व्यवस्था बुरी तरह से राजनीति  से जुड़ी हुई है।  

     पांचवी बात यह है कि केवल वार्ता बुरी चीज़ नहीं है। इस्लामी गणतंत्र ईरान वार्ता का विरोधी नहीं है और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ  नेता ने भी बारम्बार कहा है कि जहां राष्ट्रीय हितों का मामला हो तो वह सब से अधिक वार्ता के समर्थक हैं लेकिन इन खूबसूरत शब्दों की गहरायी में जाए बिना बच्चों की तरह खुश होना भी मूर्खता है। जिस चीज़ की अमरीका का बात कर रहा है उसे वार्ता का नाम नहीं दिया जा सकता। अमरीकियों का कहना है  कि ईरान को परमाणु, क्षेत्र, मिसाइल और नीतियों के बारे में अमरीकी शर्तों को मानना चाहिए। मतलब यह है कि ईरान, बहुत बहुत से मामलों में फैसला, अमरीकियों के हाथ मे दे दे अपनी अर्थ  व्यवस्था के बारे में बिना किसी गारंटी के, जैसा कि लीबिया ने किया था।

     वार्ता तक पोज़ीशन तक पहुंचने के लिए भीतरी रूप से शक्तिशाली होना ज़रूरी है वह भी इतना शक्तिशाली कि वार्ता का दूसरा पक्ष, आप पर कोई नीति थोप न सके बल्कि आप के अधिकारों  की सुरक्षा पर मजबूर हो जाए। वार्ता की इस पोज़ीशन तक पहुंचने के लिए रणनीति की ज़रूरत होगी।

     छठीं बात यह है कि ईरान को पूरब पर नज़र की अपनी नीति  से कभी दूर नहीं होना चाहिए। अमरीका से विशिष्टता लेना हो तब भी यह नीति अपनाए रखना चाहिए क्योंकि इस नीति की वजह  से अमरीका, ईरान के बहुत से अधिकारों की सुरक्षा पर मजबूर हो जाएगा लेकिन इस रणनीति के लिए साहस की बहुत अधिक ज़रूरत है वर्ना नुक़सान भी हो सकता है। Q.A.

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