विश्व क़ुद्स दिवस पर सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का मार्गदर्शक भाषण
https://parstoday.ir/hi/news/iran-i98454-विश्व_क़ुद्स_दिवस_पर_सुप्रीम_लीडर_आयतुल्लाह_ख़ामेनई_का_मार्गदर्शक_भाषण
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह ख़ामेनई ने विश्व क़ुद्स दिवस के अवसर पर अपने भाषण में फ़िलिस्तीन संकट की वर्तमान स्थिति, इसके अतीत और भविष्य के लिए कारगर रोडमैप पर प्रकाश डाला। आयतुल्लाह ख़ामेनई ने फ़ार्सी भाषा में तक़रीर की और उसके बाद अरब जगत और अरब युवाओं को अरबी भाषा में संबोधित किया। भाषण का अनुवाद पेश किया जा रहा है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
May ०७, २०२१ ११:३३ Asia/Kolkata
  • विश्व क़ुद्स दिवस पर सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई का मार्गदर्शक भाषण

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह ख़ामेनई ने विश्व क़ुद्स दिवस के अवसर पर अपने भाषण में फ़िलिस्तीन संकट की वर्तमान स्थिति, इसके अतीत और भविष्य के लिए कारगर रोडमैप पर प्रकाश डाला। आयतुल्लाह ख़ामेनई ने फ़ार्सी भाषा में तक़रीर की और उसके बाद अरब जगत और अरब युवाओं को अरबी भाषा में संबोधित किया। भाषण का अनुवाद पेश किया जा रहा है।

 

बिस्मिल्लाह-अल-रहमान-अल-रहीम

सारी प्रशंसाएं आलमीन के पालनहार के लिए। दुरूद व सलाम हो हमारे सरदार हज़रत मुहम्मद पर जो आख़िरी पैग़म्बर और समूची सृष्टि में सबसे महान हैं और उनके पाकीज़ा परिजनों, चयनित साथियों और क़यामत तक उनके मार्ग पर चलने वालों पर।

फ़िलिस्तीन इस्लामी जगत का सबसे जीवंत और महत्वपूर्ण मुद्दा

फ़िलिस्तीन का मुद्दा यथावत इस्लामी जगत का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। ज़ालिम और बर्बर पूंजीवादी व्यवस्था की नीतियों ने एक समूचे राष्ट्र को उसके घरबार, उसके वतन और उसकी पुश्तैनी ज़मीनों से वंचित कर दिया और वहां एक आतंकवादी सरकार की स्थापना कर दी और ग़ैरों को लाकर बसा दिया।

ज़ायोनी शासन की स्थापना का तर्क

ज़ायोनी सरकार के गठन के खोखले तर्क से ज़्यादा कमज़ोर और बेबुनियाद तर्क और क्या हो सकता है? यूरोप वालों ने अपने दावे के अनुसार दूसरे विश्व युद्ध के बरसों में यहूदियों पर ज़ुल्म किया। तो फिर इसके बदले पश्चिमी एशिया में एक राष्ट्र को विस्थापित करके और उस देश में वहशियाना क़त्ले आम के ज़रिए यहूदियों का इंतेक़ाम लिया जाए...!

यह वह तर्क है कि पश्चिमी सरकारें ज़ायोनी सरकार के निरंकुश और जुनूनी समर्थन के लिए जिसका सहारा लेती हैं। इस तरह उन्होंने मानवाधिकारों और लोकतंत्र के अपने सारे झूठे दावों को ख़ुद ही नकार दिया है। यह त्रासदीपूर्ण और हास्यास्पद मुद्दा 70 साल से लंबित है और हर कुछ अंतराल के बाद इसमें कुछ नए अध्याय जोड़ दिए जाते हैं।

ज़ायोनी सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष सब का सामूहिक फ़र्ज़

ज़ायोनियों ने पहले ही दिन से क़ब्ज़े में ली गई फ़िलिस्तीनी भूमि को आतंकवाद के केन्द्र में बदल दिया। इस्राईल कोई देश नहीं बल्कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्र और अन्य राष्ट्रों के ख़िलाफ़ आतंकवाद का अड्डा है। इस बर्बर सरकार के ख़िलाफ़ संघर्ष दरअस्ल अत्याचार के ख़िलाफ़ संघर्ष और आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग है और यह सब का सामूहिक फ़र्ज़ है।

इस्लामी जगत की दुर्दशा और बिखराव से फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े का रास्ता साफ़ हुआ

एक ग़ौरतलब बिंदु यह है कि बेशक ज़ायोनी सरकार की स्थापना 1948 में हुई लेकिन इस्लामी जगत के इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील इलाक़े पर क़ब्ज़े की तैयारी इससे बर्सों पहले शुरू कर दी गई थी। यह इस्लामी देशों में सेक्युलरिज़्म और कट्टरपंथी और अंधे राष्ट्रवाद का प्रभुत्व स्थापित करने और पश्चिम की पूजा करने वाली तानाशही सरकारों को थोपने के लिए पश्चिमी दुनिया के सक्रिय हस्तक्षेप का दौर था। ईरान, तुर्की और पश्चिमी एशिया के अरब देशों और उत्तरी अफ़्रीक़ा की इन वर्षों की घटनाओं का अध्ययन इस कड़वी सच्चाई को ज़ाहिर करता है कि इस्लामी जगत की दुर्दशा और बिखराव से फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े की त्रासदी की भूमि समतल हुई और साम्राज्यवादी दुनिया ने इस्लामी जगत पर यह वार कर दिया।

फ़िलिस्तीन पर क़ब्ज़े के मामले में ज़ायोनी पूंजीपतियों से पूर्वी और पश्चिमी दोनों ब्लाकों का भरपूर सहयोग

इससे पाठ लेना चाहिए कि उस दौर में ज़ायोनी पूंजीपतियों के साथ पूंजीवादी और कम्युनिस्ट दोनों कैंप मिल गए थे। ब्रिटेन ने साज़िश तैयार की। ज़ायोनी पूंजीपतियों ने अपनी दौलत और हथियारों से इसे लागू करने की ज़िम्मेदारी संभाली। सोवियत संघ पहला देश था जिसने इस ग़ैर क़ानूनी सरकार को मान्यता दी और बड़ी संख्या में यहूदियों को वहां भेजा।

अतिग्रहणकारी सरकार एक तरफ़ इस्लामी दुनिया की दुर्दशा का नतीजा थी तो दूसरी ओर इन यूरोप वालों की साज़िश, आक्रमण और हमले की देन थी।

वर्तमान युग में शक्ति का संतुलन इस्लामी दुनिया के पक्ष में

आज दुनिया की हालत उस दौर जैसी नहीं है। हमें इस हक़ीक़त को हमेशा मद्देनज़र रखना चाहिए। आज ताक़त का संतुलन इस्लामी दुनिया के पक्ष में बदल चुका है। यूरोप और अमरीका के अनेक प्रकार के राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तनों ने पश्चिम वालों की संगठनात्मक, प्रशासनिक और नैतिक कमियों और कमज़ोरियों को दुनिया के सामने बेनक़ाब कर दिया है। अमरीका में चुनाव से जुड़ी घटनाएं, कड़ी परीक्षा के इस दौर में बड़े बड़े दावे करने वाले घमंडी शासकों की भारी फ़ज़ीहत, इसी तरह यूरोप और अमरीका में कोरोना वायरस के प्रसार के सामने उनकी पूरे साल की नाकामी और इस महामारी से संबंधित शर्मनाक घटनाएं और प्रमुख यूरोपीय देशों में राजनैतिक और सामाजिक बिखराव यह सब पश्चिमी कैंप के पतन और विघटन की निशानियां हैं।

दूसरी तरफ़ संवेदनशील इस्लामी इलाक़ों में प्रतिरोधक फ़ोर्सेज़ का उदय, उनकी रक्षात्मक और आक्रामक क्षमताओं में विस्तार, मुस्लिम राष्ट्रों में चेतना, आशा और हौसले में वृद्धि, इस्लामी और क़ुरआनी नारों की ओर झुकाव, यह सब वह मुबारक लक्षण हैं जो बेहतर भविष्य की शुभसूचना दे रहे हैं।

फ़िलिस्तीन और क़ुद्स की बुनियाद पर इस्लामी देशों के एकजुट हो जाने की ज़रूरत

इस मुबारक भविष्य में मुसलमान देशों का समन्वय और आपसी सहयोग एक महत्वपूर्ण और बुनियादी लक्ष्य होना चाहिए और यह लक्ष्य पहुंच से बाहर भी नहीं है। इस समन्वय और सहयोग का केन्द्र फ़िलिस्तीन का मुद्दा यानी पूरे फ़िलिस्तीन देश और क़ुद्स शरीफ़ को होना चाहिए। यह वही हक़ीक़त है जिसने स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के प्रकाशमान हृदय में यह बात डाल दी कि रमज़ान के आख़िरी जुमे जुमअतुलविदा को विश्व क़ुद्स दिवस घोषित कर दिया जाए।

क़ुद्स शरीफ़ के ध्रुव पर मुसलमानों की एकता और सहयोग ज़ायोनी दुशमन और उसके समर्थक अमरीका और यूरोप के लिए डरावना सपना है। सेंचुरी डील की नाकामी और उसके बाद अतिग्रहणकारी सरकार के साथ कुछ कमज़ोर अरब सरकारों के संबंधों की बहाली, इसी डरावने सपने से भागने की नाकाम कोशिश है।

मैं यक़ीन के साथ कहता हूं कि यह कोशिशें कारगर नहीं होंगी। शत्रु ज़ायोनी सरकार के पतन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है जो रुकने वाली नहीं है।

भविष्य के निर्णायक कारकः क़ब्ज़े में लिए गए इलाक़ों में प्रतिरोध जारी रहना और मुसलमानों की ओर से फ़िलिस्तीनी संघर्षकर्ताओं का अंतर्राष्ट्रीय समर्थन

दो महत्वपूर्ण कारक भविष्य की दिशा तय करने वाले हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारक फ़िलिस्तीन की धरती के भीतर प्रतिरोध जारी रहना और जेहाद व शहादत के मोर्चे का सशक्तीकरण है। दूसरा कारक पूरी दुनिया के मुस्लिम देशों और सरकारों की ओर से फ़िलिस्तीनी संघर्षकर्ताओं का अंतर्राष्ट्रीय समर्थन है।

अधिकारी, बुद्धिजीवी, धर्मगुरु, दल, संगठन, मर्यादित युवा और अन्य वर्ग सभी अपने अपने तौर पर इस समग्र आंदोलन में शामिल और सक्रिय हों। यह वह चीज़ है जो दुशमन की चालों को नाकाम बनाती है और इस ईश्वरीय वादे के लिए कि ‘वह धोखा देना चाहते हैं लेकिन जो नास्तिक हो गए हैं वह ख़ुद धोखे का शिकार हो गए हैं।’(1)  आख़िरी ज़माने में एक मिसाल तय करती है। ‘और ख़ुदा अपने काम पर पहुंच रखता है लेकिन अकसर लोग नहीं जानते।’ (2)

इसके बाद सुप्रीम लीडर की अरबी भाषा की स्पीच शुरू हुई।

अब मैं कुछ बातें अरब युवाओं से उनकी भाषा में करना चाहूंगा

बिस्मिल्लाह-अल-रहमान-अल-रहीम

सलाम हो अरब जगत के सभी स्वतंत्रता प्रेमियों पर, विशेषकर युवाओं पर। सलाम हो फ़िलिस्तीन और बैतुलमुक़द्दस की अडिग जनता पर और मस्जिदुल अक़्सा के रक्षकों पर।

प्रतिरोध मोर्च के शहीदों पर सलाम हो और जेहाद करने वाले उन सभी लोगों पर सलाम हो जिन्होंने इस राह में अपने प्राणों की आहूति दी। विशेष रूप से शहीद शैख अहमद यासीन, शहीद सैयद अब्बास मूसवी, शहीद फ़त्ही शेक़ाक़ी, शहीद एमाद मुग़निया, शहीद अब्दुलअज़ीज़ रन्तीसी, शहीद अबू महदी अलमुहंदिस और अन्ततः प्रतिरोध मोर्चे के प्रख्यात शहीद, शहीद क़ासिम सुलैमानी पर... कि जिनमें से हरेक ने बेहद फलदायक जीवन के बाद, शहीद होकर प्रतिरोध के मैदान पर महत्वपूर्ण छाप छोड़ी।

फ़िलिस्तीनियों के संघर्ष और प्रतिरोध मोर्चे के शहीदों के पवित्र ख़ून की वजह से यह पवित्र ध्वज लहरा रहा है और फ़िलिस्तीनी जेहाद व संघर्ष की आंतरिक शक्ति कई गुना बढ़ गयी है। कभी फ़िलिस्तीनी युवा पत्थर मार कर अपनी रक्षा करते थे लेकिन आज सटीक निशाना लगाने वाले मिसाइल फ़ायर करके दुश्मन का जवाब देते हैं।

फ़िलिस्तीन और बैतुलमुक़द्दस को क़ुरआने मजीद में “पवित्र भूमि” कहा गया है। दसियों साल से यह पवित्र भूमि विश्व के अत्यधिक अपवित्र और दुष्ट लोगों के अवैध क़ब्ज़े में है। यह वह दुष्ट राक्षस हैं जो भले इंसानों का खून बहाते हैं और फिर बड़ी निर्लज्जता से उसे स्वीकार भी करते हैं। यह वह नस्लभेदी हैं जो 70 बर्सों से अधिक समय से भूमि के अस्ली स्वामियों को हत्या, लूट मार, क़ैद और यातना जैसी सज़ाएं दे रहे हैं लेकिन ईश्वर की कृपा से अभी तक वह उनके संकल्प को नहीं तोड़ पाए हैं।

फ़िलिस्तीन ज़िन्दा है और जेहाद को जारी रखे है और ईश्वर की सहायता से अन्ततः दुश्मन पर विजय पाने में सफल भी होगा। क़ुद्स शरीफ़ और पूरा फ़िलिस्तीन, वहां की जनता का है और उन्हें वापस मिल कर रहेगा इन्शाअल्लाह। यह ईश्वर के लिए कोई कठिन काम नहीं है।

फ़िलिस्तीन के प्रति सभी इस्लामी सरकारों और राष्ट्रों का कर्तव्य है लेकिन संघर्ष का ध्रुव स्वयं फ़िलिस्तीनी हैं कि जिनकी संख्या आज फ़िलिस्तीन के अंदर और बाहर लगभग एक करोड़ चालीस लाख है। उनकी एकता और संयुक्त संकल्प बहुत बड़ा काम करेगा।

आज एकता, फ़िलिस्तीनियों का सब से बड़ा हथियार है

फ़िलिस्तीनी एकता के दुश्मन ज़ायोनी शासन, अमरीका और कुछ अन्य राजनीतिक शक्तियां हैं लेकिन अगर स्वयं फ़िलिस्तीनी समाज के भीतर से एकता को तोड़ा न जाए तो बाहरी दुश्मन कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे।

इस एकता की धुरी आतंरिक संघर्ष और दुश्मनों पर अविश्वास होना चाहिए। फ़िलिस्तीनियों के अस्ली दुश्मन अर्थात अमरीका, ब्रिटेन और दुष्ट ज़ायोनियों को फ़िलिस्तीनी नीतियों का सहारा नहीं बनाया जाना चाहिए।

फ़िलिस्तीनी, चाहे ग़ज़्ज़ा में हों, बैतुलमुक़द्दस में हों, पश्चिमी तट में हों, या सन 1948 में क़ब्ज़े में लिए गए इलाक़ों में हों बल्कि चाहे वह शरणार्थी शिविरों में हों, सब के सब एक ही इकाई के अंश हैं और उन सब को एकजुटता की रणनीति अपनाना चाहिए। हर भाग को अन्य भाग की सुरक्षा करना चाहिए और दबाव के समय अपने पास उपलब्ध साधनों का इस्तेमाल करना चाहिए।

विजय की आशा, आज किसी भी समय से अधिक है। शक्ति का संतुलन फ़िलिस्तीनियों की ओर झुक गया है। उनके दुश्मन ज़ायोनी हर साल पहले से अधिक कमज़ोर हुए हैं। उनकी वह सेना जो स्वयं को “अजेय सेना” कहती थी, आज लेबनन में 33 दिवसीय अनुभव और ग़ज्ज़ा में 22 तथा 8 दिवसीय अनुभवों के बाद, वह सेना बन गयी है जिसे कभी जीत का मुंह देखना नसीब नहीं होगा। उसकी राजनीतिक स्थिति यह है कि दो साल में चार बार चुनाव होते हैं, सुरक्षा की स्थिति यह है कि निरंतर इस क्षेत्र में नाकामी मिल रही है और वापस अपने अपने देश भागने वाले यहूदियों के पलायन की वजह से बड़े बड़े दावे करने वाले इस शासन की मिट्टी पलीद हो गयी है।

अमरीका की मदद से कुछ अरब देशों के साथ संबंध बनाने के लिए निरंतर हाथ पैर मारना इस शासन की कमज़ोरी का एक चिन्ह है। लेकिन निश्चित रूप से इससे भी उसे कोई मदद नहीं मिलने वाली है। इस से दसियों साल पहले भी उसने मिस्र से संबंध बनाया था, उस दिन के बाद से अब तक की अवधि के दौरान ज़ायोनी शासन अधिक कमज़ोर और निर्बल हुआ है तो इस हालत में कुछ कमज़ोर व तुच्छ देशों के साथ संबंध क्या उसकी मदद कर सकते हैं? और निश्चित रूप से इन देशों को भी ज़ायोनी शासन के साथ संबंध बनाने से कुछ लाभ नहीं मिलने वाला है। ज़ायोनी दुश्मन, उनकी संपत्ति या उनकी भूमि पर क़ब्ज़ा कर लेंगे और इन देशों में भ्रष्टाचार और अशांति फैला देंगे।

अलबत्ता इन वास्तविकताओं की वजह से इस आंदोलन के प्रति अन्य लोगों को अपना भारी कर्तव्य नहीं भूलना चाहिए। इस्लामी और ईसाई धर्मगुरुओं को चाहिए कि वह यह घोषणा करें कि ज़ायोनी शासन के साथ संबंध रखना हराम और धार्मिक रूप से वर्जित है। बुद्धिजीवियों और स्वतंत्रता प्रेमियों को चाहिए कि वह फ़िलिस्तीनियों की पीठ में घोंपे गये इस छुरे के भयानक प्रभावों से सब को अवगत कराएं।

ज़ायोनी शासन के पतन की प्रक्रिया के सामने दूसरी तरफ़ प्रतिरोध मोर्चे की शक्ति बढ़ रही है जो उज्जवल भविष्य की शुभसूचना है। सामरिक व रक्षा शक्ति में, प्रभावशाली हथियार बनाने में आत्मनिर्भरता, संघर्षकर्ताओं के आत्मविश्वास में और युवाओं में आत्मबोध में वृद्धि हो रही है। पूरे फ़िलिस्तीन देश में प्रतिरोध का दायरा फैल रहा है और उसकी सीमाओं को भी लांघ रहा है। मस्जिदुल अक़्सा की सुरक्षा के लिए फ़िलिस्तीनी युवाओं का हालिया आंदोलन जारी है और दुनिया के बहुत से क्षेत्रों में लोग फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के संघर्ष और उनकी मज़लूमियत दोनों से एक साथ अवगत हो रहे हैं।

फ़िलिस्तीनियों के संघर्ष का तर्क, जिसका इस्लामी गणतंत्र ईरान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में पंजीकरण कराया है, विकसित और आकर्षक तर्क है। फ़िलिस्तीनी संघर्षकर्ता, फ़िलिस्तीन के सभी मूल निवासियों की भागीदारी से एक जनमत संग्रह का प्रस्ताव पेश कर सकते हैं। यह जनमत संग्रह देश की राजनीतिक व्यवस्था का निर्धारण करेगा और इस जनमत संग्रह में फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों सहित हर धर्म व जाति से संबंध रखने फ़िलिस्तीन के मूल नागरिक भाग लेंगे। इसके परिणाम में बनने वाली व्यवस्था, शरणार्थी फ़िलिस्तीनियों को स्वदेश वापस लाएगी और फ़िलिस्तीन में डेरा डालने वाले विदेशियों के बारे में फैसला करेगी।

यह मांग उस प्रचलित प्रजातंत्र के उसूल के आधार पर है जिसे पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है और कोई भी उसके विकसित होने पर आपत्ति नहीं कर सकता।

फ़िलिस्तीनी संघर्षकर्ताओं को, अवैध क़ब्ज़ा करने वाले ज़ायोनी शासन से अपना क़ानूनी और नैतिक संघर्ष उस समय तक जारी रखना चाहिए जब तक कि वह इस मांग को स्वीकार करने पर मजबूर न हो जाए।

ईश्वर का नाम लेकर आगे बढ़िए और जान लीजिए कि “अल्लाह उसकी अवश्य सहायता करता है जो उस (ईश्वर) की सहायता करता है।“

वस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बरकातोह

(1) सूरा तूर आयत 42

(2) सूरा युसुफ़ आयत 21