पाकिस्तान हमास के निरस्त्रीकरण का विरोध क्यों करता है?
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पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद इस्हाक़ डार
पार्स टुडे – पाकिस्तान ने हमास के निरस्त्रीकरण के प्रति अपने विरोध की घोषणा की है।
पार्स टुडे के अनुसार 29 नवम्बर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री सीनेटर मोहम्मद इस्हाक़ डार ने एक बार फिर इस बात पर ज़ोर दिया कि उनका देश ग़ाज़ा में इस्लामिक प्रतिरोध आंदोलन हमास को निरस्त्र करने के उद्देश्य से किसी भी अंतरराष्ट्रीय बल में शामिल होने के किसी भी प्रकार के प्रयास का विरोध करता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ग़ाज़ा में अंतरराष्ट्रीय शांति बल में भाग लेने के लिए तैयार है।
इस्हाक़ डार ने बल देकर कहा कि पाकिस्तान हमास के निरस्त्रीकरण की किसी भी कार्रवाई में हिस्सा नहीं लेगा। विदेश मंत्री ने कहा कि उनका देश न तो शांति थोपने की कोशिश कर रहा है न ही निरस्त्रीकरण उसका काम है बल्कि हमारा उद्देश्य शांति की स्थापना है।
उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ग़ाज़ा शांति समझौते पर हुई पिछली बातचीत में अंतरराष्ट्रीय शांति बल में भागीदारी के लिए अपनी सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की थी लेकिन इस्लामाबाद का हमास को निरस्त्र करने का कोई निर्णय नहीं है।
इससे पहले अक्टूबर 2025 के अंत में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने उन बयानों का कड़ा खंडन किया था जिनमें कहा गया था कि उनका देश ग़ज़ा में हमास को निरस्त्र करने के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय बल में शामिल हो सकता है। उन्होंने कहा था कि इस्लामाबाद कभी भी ऐसे उद्देश्य का पीछा नहीं करेगा।
हमास के निरस्त्रीकरण के किसी भी प्रयास का पाकिस्तान द्वारा विरोध केवल एक साधारण राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि फ़िलिस्तीन मुद्दे और कब्ज़े के विरुद्ध प्रतिरोध की भूमिका को लेकर इस्लामाबाद की गहरी सोच को दर्शाता है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि उनका देश ग़ाज़ा में स्थिरता और शांति स्थापित करने हेतु अंतरराष्ट्रीय बलों में भाग लेने को तैयार है लेकिन वह कभी भी ऐसी कार्रवाइयों में शामिल नहीं होगा जिनसे हमास को निरस्त्र करने या प्रतिरोध की संरचना को कमजोर करने का रास्ता बने। यह रुख कई राजनीतिक, ऐतिहासिक और वैचारिक कारकों में निहित है जिनका विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान ने ऐसा दृष्टिकोण क्यों अपनाया है।
सबसे पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि पाकिस्तान स्वयं को मुस्लिम जगत का हिस्सा मानता है और हमेशा से उम्मत-ए-इस्लामी के मुद्दों में सहयोगी भूमिका निभाने की कोशिश करता रहा है। फ़िलिस्तीन का मुद्दा कई मुस्लिम देशों के लिए एक प्रतिष्ठित और प्रतीकात्मक प्रश्न है। हमास जो इसराइल के विरुद्ध प्रतिरोध की सबसे प्रमुख संगठन है, मुस्लिम दुनिया के व्यापक जनमत में अन्याय और कब्ज़े के विरुद्ध डटे रहने का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस समूह को निरस्त्र करने का कोई भी प्रयास बहुत से मुसलमानों की नज़र में इसराइल और पश्चिम की नीतियों से हमदर्दी के समान होगा। पाकिस्तान भली-भांति जानता है कि ऐसा कोई कदम उसे मुस्लिम राष्ट्रों के बीच कमजोर कर सकता है और यहां तक कि देश के भीतर भी विरोध उत्पन्न कर सकता है।
दूसरा कारण पाकिस्तान की शांति की अवधारणा है। इस देश के अधिकारी बार-बार कह चुके हैं कि उनका लक्ष्य शांति थोपना नहीं, बल्कि स्थायी शांति स्थापित करने की परिस्थितियाँ उत्पन्न करना है। इस्लामाबाद के नज़रिये में हमास का निरस्त्रीकरण न तो शांति की गारंटी देता है और न ही क्षेत्र में स्थिरता ला सकता है। क्योंकि जब तक इसराइली कब्ज़ा जारी है, प्रतिरोध को निरस्त्र करना फ़िलिस्तीनी जनता को असुरक्षित और असहाय कर देने के समान है।
पाकिस्तान का मानना है कि वास्तविक शांति तब स्थापित होगी जब न्याय होगा और फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों को स्वीकार किया जाएगा, न कि तब जब केवल एक पक्ष को पीछे हटने और समर्पण करने के लिए मजबूर किया जाए।
तीसरा कारण पाकिस्तान के राजनीतिक और कूटनीतिक पहलू हैं। इस देश के विश्व शक्तियों के साथ जटिल संबंध हैं और वह हमेशा पश्चिम के साथ संबंध बनाए रखने और इस्लामी सिद्धांतों पर कायम रहने के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश करता है। हमास के निरस्त्रीकरण का विरोध कर इस्लामाबाद मुस्लिम देशों में अपना सम्मान भी बनाए रख सकता है और यह भी दिखा सकता है कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है और सिर्फ बाहरी दबावों की अनुयायी नहीं है। वास्तव में पाकिस्तान इस रुख के ज़रिए दुनिया को यह स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि हम शांति के लिए सहयोग को तैयार हैं, लेकिन ऐसे प्रोजेक्ट्स का हिस्सा नहीं बनेंगे जो किसी राष्ट्र के वैध प्रतिरोध को समाप्त करने की दिशा में हों।
आखिर में इस निर्णय के आंतरिक पहलू को भी नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता। पाकिस्तानी समाज फ़िलिस्तीन के मुद्दे के प्रति गहरी सहानुभूति रखता है और प्रतिरोध के समर्थन को देश की जनधारा का हिस्सा माना जाता है। हमास के खिलाफ कोई भी कदम पाकिस्तान के भीतर कड़े जन-आंदोलन और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ पैदा कर सकता है। इसलिए हमास के निरस्त्रीकरण का विरोध केवल विदेश नीति का मामला नहीं, बल्कि घरेलू एकता बनाए रखने की आवश्यकता भी है।
इस प्रकार हमास के निरस्त्रीकरण के प्रति पाकिस्तान के विरोध को एक व्यापक ढांचे में देखना चाहिए एक ऐसा ढांचा जिसमें इस्लामी पहचान, न्याय और शांति की अवधारणा, कूटनीतिक समीकरण और आंतरिक दबाव शामिल हैं। इस्लामाबाद अपने इस रुख से यह दिखाना चाहता है कि वह शांति के लिए प्रयास करने को तैयार है लेकिन इसकी कीमत प्रतिरोध को कमजोर करके फ़िलिस्तीनी जनता को असुरक्षित बनाना नहीं होगी। यह नीति वास्तव में पाकिस्तान के उस प्रयास का प्रतिबिंब है जिसके माध्यम से वह मुस्लिम दुनिया और अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में संतुलित भूमिका निभाने की कोशिश करता है। mm