क्षेत्रीय देश ईरान में स्थिरता क्यों चाहते हैं?
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पार्सटुडे - ईरान में हाल की अशांति और तथाकथित प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सैन्य हमले की ट्रंप की धमकी ने क्षेत्र के देशों में चिंता पैदा कर दी है।
(last modified 2026-01-19T12:58:35+00:00 )
Jan १८, २०२६ १७:२४ Asia/Kolkata
  • ईरानी जनता की एकता और प्रतिरोध प्रदर्शन का एक दृश्य
    ईरानी जनता की एकता और प्रतिरोध प्रदर्शन का एक दृश्य

पार्सटुडे - ईरान में हाल की अशांति और तथाकथित प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सैन्य हमले की ट्रंप की धमकी ने क्षेत्र के देशों में चिंता पैदा कर दी है।

पार्सटुडे की रिपोर्ट के अनुसार, डेली सबाह पत्रिका की वेबसाइट पर 15 जनवरी को मुस्तफा जानर के लेख "ईरान में 'शासन पतन' कौन चाहता है?" में ईरान में हाल की अशांति और तथाकथित प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सैन्य आक्रमण की ट्रंप की धमकी के मुद्दे की जांच की गई है, जिसने क्षेत्र के देशों को चिंतित कर दिया है।

 

क्षेत्र की भू-राजनीतिक गतिविधियाँ

 

लेखक के दृष्टिकोण से, ईरान में अशांति ऐसे समय में हुई है जब क्षेत्र गहन भू-राजनीतिक परिवर्तनों से गुजर रहा है। इस अवधि से पहले की सबसे बड़ी घटना इस्लामिक जागरण की लहर थी, जिसने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका की राजनीतिक संरचना को बदल दिया और ईरान के प्रभाव को सीरिया, लेबनान, इराक और यमन जैसे देशों में फैलने का मार्ग प्रशस्त किया। इस स्थिति के कारण कुछ अरब देश ईरान को अस्थिरता का कारक मानने लगे और डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल के दौरान तेहरान के खिलाफ दबाव चरम पर पहुंच गया। लेकिन कोविड-19 महामारी और अमेरिका द्वारा अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को समर्थन में कमी के बाद, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र जैसे देशों को भी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यूक्रेन युद्ध ने भी वैश्विक अस्थिरता बढ़ाई और क्षेत्रीय स्थिरता की आवश्यकता को बढ़ा दिया। इस पृष्ठभूमि में, ईरान और सऊदी अरब ने 2023 में संबंधों को सामान्य करने का निर्णय लिया और तुर्की ने भी अरब देशों के साथ अपने संबंधों में सुधार किया।

 

7 अक्टूबर के परिणाम और इज़राइल की भूमिका

 

7 अक्टूबर, 2023 के हमलों के बाद, इज़राइल को क्षेत्र में अस्थिरता का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। इज़राइल के लेबनान, सीरिया और ईरान पर हमलों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। ज़ायोनी शासन के सैन्य विमानों द्वारा विभिन्न देशों के आकाश का उल्लंघन और यहां तक कि कतर जैसे देशों को निशाना बनाया जाना, तनाव के विस्तार को दर्शाता है। ज़ायोनी शासन की अन्य घटनाओं में भी भूमिका रही है; सूडान संकट और हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका की घटनाओं से लेकर सोमालीलैंड में अलगाववाद को समर्थन तक। यह शासन क्षेत्र में स्थिर राजनीतिक संरचनाओं का विरोधी है और सरकारों के कमजोर होने से लाभान्वित होता है।

 

इसके विपरीत, तुर्की, सऊदी अरब, कतर और मिस्र जैसे देश क्षेत्रीय सरकारों को मजबूत करने और उनकी संस्थागत क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इन देशों ने सीरिया में निवेश किया है और सूडान और सोमालीलैंड की घटनाओं के प्रति भी समान रुख अपनाया है। ईरान ने भी इन मामलों में तुर्की और सऊदी अरब के साथ समन्वय किया है।

 

यमन की घटनाएँ और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा

 

सऊदी अरब के हालिया हवाई हमलों ने यमन में इज़राइल की योजनाओं को गंभीर झटका दिया। दक्षिण यमन ट्रांजिशनल काउंसिल के हमले, जिसने सऊदी अरब और यमन के अन्सार अल्लाह के बीच वार्ता को विफल करने की कोशिश की, रियाद की सुरक्षा के लिए खतरा माना गया। सऊदी अरब की त्वरित प्रतिक्रिया ने दर्शाया कि यह देश हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका और लाल सागर में इज़राइल की योजनाओं का विरोध करना चाहता है। तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हालिया रक्षा समझौते को भी इसी संदर्भ में समझा जा सकता है।

 

ईरान में अशांति का भू-राजनीतिक अर्थ

 

पश्चिमी मीडिया रेजा पहलवी को अशांति के संभावित नेता के रूप में पेश करता है, लेकिन ईरान के भीतर उनके लिए वास्तविक समर्थन की मात्रा संदेहास्पद है। ज़ायोनी शासन के साथ उनके निकट संबंध, ईरान पर शासन के हमलों का समर्थन और इज़राइल के झंडे लेकर उनके समर्थकों की उपस्थिति, अशांति और तेल अवीव की क्षेत्रीय गणनाओं के बीच संबंध को दर्शाती है। कुछ मीडिया पहलवी की वापसी की तुलना में ईरान के विघटन को ज़ायोनी शासन के लिए अधिक वांछनीय विकल्प भी मानते हैं। ऐसी स्थिति में, क्षेत्र के देशों ने कैसी प्रतिक्रिया दी है? तुर्की के विदेश मंत्री ने ईरान की अशांति के पीछे इज़राइल की भूमिका की ओर इशारा किया है और ईरानी सूत्रों ने पीकेके जैसे समूहों के खिलाफ तुर्की के साथ खुफिया सहयोग की जानकारी दी है। ओमान के विदेश मंत्री तेहरान गए हैं और सऊदी अरब ने भी ईरान के साथ कूटनीतिक संपर्क जारी रखा है।

 

क्षेत्रीय देश ईरान के पतन की इच्छा क्यों नहीं रखते?

 

अरब देशों, विशेष रूप से खाड़ी देशों की सरकारों की चुप्पी, अशांति के अपनी सीमाओं के भीतर फैलने की चिंता और साथ ही (अमेरिका के हमले और अमेरिकी अड्डों पर ईरान की जवाबी कार्रवाई की स्थिति में) ईरान के निशाने पर आने के डर के कारण है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि (वाशिंगटन और तेल अवीव द्वारा परिकल्पित) ईरान का पतन ऐसे संकट पैदा कर सकता है जिन्हें प्रबंधित करने की क्षमता किसी भी देश में नहीं है। इसीलिए, क्षेत्र के लगभग सभी खिलाड़ी – ज़ायोनी शासन को छोड़कर – ईरान में स्थिरता बनाए रखना चाहते हैं। (AK)