विश्लेषण: ब्रिक्स अमेरिकी एकपक्षीयता को कैसे रोकता है?
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नई दिल्ली में 18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
पार्स टुडे – नई दिल्ली में 18वाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसी परिस्थितियों में हो रहा है जब यह समूह केवल उभरती शक्तियों का एक आर्थिक गठबंधन नहीं है, बल्कि ब्रिक्स वैश्विक व्यवस्था के भविष्य के स्वरूप को लेकर प्रतिस्पर्धा के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक बन गया है।
12 और 13 सितंबर को ब्रिक्स के गठन के बीसवें वर्ष में यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब इस समूह के 11 सदस्यों के पास दुनिया की लगभग 49.5% आबादी, 40% वैश्विक अर्थव्यवस्था और 26% विश्व व्यापार है। इस्लामी गणराज्य ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की इस शिखर सम्मेलन के बारे में टिप्पणियाँ ठीक इसी मुद्दे पर केंद्रित हैं। ब्रिक्स एक आर्थिक मंच से एकपक्षीयता का मुकाबला करने के एक प्रभावी साधन में बदल सकता है। ईरान के राष्ट्रपति ने ब्रिक्स विकास बैंक के गठन और डॉलर पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता का ज़िक्र करते हुए, वास्तव में मुद्दे को व्यापारिक संबंधों से परे परिभाषित किया है। तेहरान के दृष्टिकोण से, मुख्य मुद्दा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक खेल के नियमों को बदलना और स्वतंत्र देशों पर दबाव डालने के लिए वित्तीय और मौद्रिक साधनों के राजनीतिक उपयोग की संभावना को कम करना है।
इस बदलाव के व्यावहारिक संकेत भी शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर स्पष्ट हो गए हैं। ब्रिक्स के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की संरचना में सुधार और उभरते तथा विकासशील देशों का मतदान हिस्सा बढ़ाने की मांग की है। उन्होंने एकपक्षीय टैरिफ और ऐसे व्यापारिक तथा वित्तीय उपायों के प्रति भी चेतावनी दी है जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अधिक दबाव डालते हैं, और सीमा पार भुगतान तंत्र के विकास तथा राष्ट्रीय मुद्राओं के अधिक उपयोग पर ज़ोर दिया है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाता है कि ब्रिक्स का विरोध अब केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि विश्व की वित्तीय संरचना में सुधार की मांग में बदल गया है।
पेज़ेश्कियान इसी दृष्टिकोण से ब्रिक्स को "सर्वसत्तावाद और एकपक्षीयता" का मुकाबला करने की क्षमता के रूप में देखते हैं। ईरान के लिए इस दृष्टिकोण का महत्व दोगुना है। ईरान ने पिछले वर्षों में किसी भी अन्य सदस्य की तुलना में वैश्विक वित्तीय प्रणाली के राजनीतिकरण, एकपक्षीय प्रतिबंधों और दबाव के साधन के रूप में डॉलर के उपयोग के प्रभावों का अधिक सामना किया है। इसलिए डॉलर पर निर्भरता कम करना ईरान के लिए केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ाने की रणनीति का एक हिस्सा है।
हालाँकि, दिल्ली शिखर सम्मेलन का महत्व ब्रिक्स की इन नारों को वास्तविक तंत्रों में बदलने की क्षमता से मापा जाएगा। स्वतंत्र भुगतान नेटवर्क बनाना, राष्ट्रीय मुद्राओं में निपटान, ब्रिक्स विकास बैंक को मजबूत करना और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं का हिस्सा बढ़ाना एक क्रमिक प्रक्रिया है। यहाँ तक कि विशेषज्ञ अध्ययन भी बताते हैं कि ब्रिक्स अल्पावधि में डॉलर को पूरी तरह बदलने की कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि इस पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना चाहता है।
इस बीच, पेज़ेश्कियान की उपस्थिति का विशेष भू-राजनीतिक महत्व है। अमेरिका और इज़राइली शासन का ईरान के खिलाफ युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य का संकट ने ब्रिक्स को एक वास्तविक परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है। ईरान और अमेरिका का टकराव ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार को सीधे प्रभावित कर रहा है और इस संकट पर ब्रिक्स सदस्यों के बीच मतभेद भी स्पष्ट हो गए हैं। इसलिए मुद्दा केवल एक राजनीतिक बयान जारी करना नहीं है; सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स उस संकट के सामने एक प्रभावी और स्वतंत्र खिलाड़ी हो सकता है जिसने वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है, या यह अभी भी एक संवाद मंच के स्तर पर बना रहेगा।
दिल्ली शिखर सम्मेलन में पेज़ेश्कियान की टिप्पणियाँ वास्तव में ब्रिक्स के सामने एक रणनीतिक मांग रखती हैं। यदि यह समूह वास्तव में दुनिया के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है, तो इसे अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और राजनीति के नियमों पर निर्णय लेने में अपना हिस्सा मांगना चाहिए। ब्रिक्स अब अपनी क्षमता साबित करने के चरण से आगे बढ़ चुका है और परीक्षण के चरण में प्रवेश कर चुका है। दिल्ली वह बिंदु हो सकता है जहाँ एकपक्षीयता का विरोध संस्थागत सुधार, वित्तीय स्वतंत्रता और व्यावहारिक सहयोग में बदल जाए, वही रास्ता जिसे ईरान डॉलर के प्रभुत्व को कम करने और बहुपक्षवाद को मजबूत करने के तरीके के रूप में देखता है। (AK)