फिर इमाम हुसैन ने अपना महासंघर्ष शुरू किया
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इमाम हुसैन का महासंघर्ष आरंभ हो गया था। सत्य असत्य के मध्य सदैव से जारी लड़ाई का एक अन्य और संभवतः सब से अधिक महत्वपूर्ण चरण आरंभ हो रहा था।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Aug २९, २०१९ ११:२७ Asia/Kolkata
  • फिर इमाम हुसैन ने अपना महासंघर्ष शुरू किया

इमाम हुसैन का महासंघर्ष आरंभ हो गया था। सत्य असत्य के मध्य सदैव से जारी लड़ाई का एक अन्य और संभवतः सब से अधिक महत्वपूर्ण चरण आरंभ हो रहा था।

असत्य के प्रतीक यज़ीद ने सत्य के प्रतीक अर्थात इमाम हुसैन को ललकारा था। मदीना में परिस्थितियां बड़ी तेज़ी से बदल रही थीं। इराक़ के अन्य नगरों से इमाम हुसैन के नाम हज़ारों पत्र आ रहे थे जिनमें इमाम हुसैन का साथ देने और यज़ीद का विरोध करने पर बल दिया जा रहा था।

इमाम हुसैन ने सोच विचार के बाद मदीना नगर छोड़ देने का निर्णय लिया और अपने पूरे परिवार के साथ मदीना नगर से निकल पड़े। कहां जाना है? इस बात का ज्ञान इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को था विदित रूप से वे मक्का नगर जाकर हज करना चाह रहे थे। इमाम हुसैन ने इतिहास की यह महत्वपूर्ण यात्रा आंरभ की और अपने साथ चलने वालों का बड़ी दूरदर्शिता के साथ चयन किया। क्योंकि यह अत्याधिक महत्वपूर्ण संघर्ष था इस लिए इस संघर्ष में भाग लेने वालों का असाधारण होना आवश्यक था। कर्बला की घटना ने सिद्ध कर दिया कि इमाम हुसैन ने अपने साथियों के चयन में क्यों इतनी सूक्ष्मता से काम लिया?

इमाम हुसैन मक्का नगर पहुंचे तो यज़ीद द्वारा भेजे गये कुछ लोग हज के विशेष वस्त्रों में शस्त्र छुपा कर मक्का पहुंच गये। वे वहीं पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की हत्या करना चाहते थे ताकि यह दिखाया जा सके कि कुछ अज्ञात लोगों ने उनकी हत्या कर दी किंतु इस प्रकार से इमाम हुसैन का संदेश जिसने कर्बला के बाद यज़ीद के शासन की नींव हिला डाली, सीमित हो जाता इसी लिए इमाम हुसैन ने मक्का छोड़ने का निर्णय लिया।

पूरे इस्लामी शासन पर यज़ीद का अधिकार था, समाज के प्रभावी लोग उसके आदेशपालन की प्रतिज्ञा कर चुके थे किंतु इसके बावजूद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अपना आदेश पालन की प्रतिज्ञा लेने पर यज़ीद का आग्रह यह दर्शाता है कि उसे भी यह भलींभांति पता था कि सैनिक दृष्टि से वह चाहे जितना शक्तिशाली हो किंतु यदि इमाम हुसैन ने उसकी पुष्टि नहीं की तो उसकी राजनीतिक स्थिति डांवाडोल रहेगी और केवल तलवार के बल पर ही वह लोगों पर शासन कर सकता है। इसी लिए यज़ीद चाह रहा था कि इमाम हुसैन उसका आदेश मानने की प्रतिज्ञा करके   उसकी सत्ता और स्वंय उसे औपचारिकता प्रदान कर दें किंतु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यह कहकर कि मेरे जैसा, यज़ीद जैसे की आज्ञापालन की प्रतिज्ञा नहीं कर सकता यह संदेश दिया कि यदि असत्य की पुष्टि करने से सत्य का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाए तो फिर किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं करना चाहिए भले ही उसके लिए मनुष्य को अपनी जान ही गंवानी पड़े।

विभिन्न क्षेत्रों से इमाम हुसैन के पास आने वाले पत्रों की संख्या हज़ारों में पहुंच गयी थी किंतु कूफा वासियों ने विशेष रूप से आप को निमंत्रण दिया था, साथ ही यह भी वचन दिया था कि वे यज़ीद के मुक़ाबले में उनका साथ देंगे। इमाम हुसैन ने अपने एक भाई मुस्लिम बिन अक़ील को कूफा भेजने का निर्णय लिया ताकि वह वहां की परिस्थितियों की समीक्षा करें। मुस्लिम बिन अक़ील कूफा नगर रवाना हुए। एक ऐसी यात्रा आरंभ की जिसके बाद वह कभी लौट कर न आ सके।  मुस्लिम बिन अक़ील को आशूर के महासंग्राम के शहीद होने वाले पहले सिपाही के रूप में याद किया जाता है। कर्बला का आंरभ कूफे से हो चुका था। समाज की गंदगी को अपने और अपनों के खून से धुलने का कठिन काम, इमाम हुसैन ने शुरु कर दिया था। (Q.A.)