बुधवार- 6 मई
1856, आस्ट्रिया के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक ज़ेग्मोंड फ्रेयोड का चेकेस्लवाकिया में जन्म हुआ
1861, पंडित जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू का जन्म हुआ।
1889, फ़्रांस की राजधानी पेरिस में स्थित विश्वप्रसिद्ध एफ़िल टॉवर आधिकारिक रूप से जनता के लिए खोला गया।
1910, ब्रिटिश शासक एडवर्ड सप्तम के निधन के बाद उनका बेटा जार्ज पंचम गद्दी पर बैठा।
1944, पुणे के आग़ा ख़ान पैलेस से गांधीजी रिहा हुए।
1976, इटली में आए विनाशकारी भूकंप से 989 लोगों की मौत हुई।
1985, द्वितीय विश्वयुद्ध में बैली पुलों के आविष्कारकर्ता सर डोनाल्ड बैली का इंग्लैंड में निधन।
1997, फ़्रांस की क्रिस्टिन जेनिन ध्रुव पर पैदल पहुंचने वाली विश्व की प्रथम महिला बनी।
2004, चीन ने सिक्किम को भारत का अंग स्वीकार कर लिया।
2005, संयुक्त राष्ट्र ने लश्कर-ए-तैयबा को आतंकवादी संगठन की सूची में डाला।
2007, फ़्रांस के राष्ट्रपति चुनाव में निकोलस सार्कोज़ी जीते।
6 मई सन 1856 ईसवी को आस्ट्रिया के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक ज़ेग्मोंड फ्रेयोड का चेकेस्लवाकिया में जन्म हुआ। चार वर्ष की आयु में वह अपने यहूदी माता पिता के साथ आस्ट्रिया चले गये। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने मेडिकल कालेज में दाखिला लिया और 29 वर्ष की आयु में स्नायु तंत्र विशेषज्ञ के रूप में काम शुरु किया और देखते ही देखते उन्हें मनोविज्ञान में दक्षता प्राप्त हो गयी। उनका मानना था कि शारीरिक परीक्षण से मनोरोग का पूर्ण रूप से पता लगाना संभव नहीं है। उन्होंने नयी शैली का अविष्कार किया जिसके अंतर्गत रोगी से कहा जाता था कि जो भी विचार उसके मन में आता है उसे ज़बान से दोहराये। उनकी यह शैली बाद में काफी विख्यात हुई। वर्ष 1896 में उन्होंने मानसिक समस्याओं का कारण यौन संबंधों में नाकामी बताया तो उनका विरोध आरंभ हो गया क्योंकि वह यौन संबंधों में असीमित आज़ादी के पक्षधर थे। इसके अलावा , अपने रोगियों के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप के कारण भी उनकी आलोचना होती थी। 23 सितम्बर वर्ष 1939 में 83 वर्ष की आयु में ह्रदय गति रुक जाने से उनका देहान्त हो गया। उन्होंने कई प्रसिद्ध पुस्तकें लिखी हैं।
6 मई वर्ष 1859 को जर्मनी के प्रसिद्ध भुगोल शास्त्री एलेक्ज़ेन्डर हमबोल्ड का 90 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनका जन्म वर्ष 1769 में बर्लिन में हुआ था। उन्होंने अनुसंधान व अध्ययन के लिए बहुत सी यात्राएं कीं। उनके शोध का मुख्य विषय, पृथ्वी और उसकी उत्पत्ति के बारे में था। उन्होंने अपनी पूरी आयु इसी अध्ययन में लगा दी और सत्तर वर्ष की आयु में अपने अध्ययन के निचोड़ के रूप में एक किताब लिखी जो ज्ञान विज्ञान के इतिहास में अत्याधिक रोचक समझी जाती है और इसे भुगोल व भूविज्ञान का सब से पहला व व्यापक ज्ञानकोश भी कहा जाता है। उन्हें नवीन भुगोल का जनक और जियोफिज़िक्स का संस्थापक कहा जाता है।

6 मई सन 1882 को जर्मनी के सूक्ष्मजैविकी विशेषज्ञ रॉबर्ट कोच द्वारा, क्षय रोग के जीवाणु की खोज की घोषणा की गयी। उन्होंने इससे दो सप्ताह पूर्व, इस घातक रोगाणु की खोज कर ली थी जो इतिहास में एक अरब से अधिक लोगों की मौत का कारण बना है। प्रोफेसर कोच ने इसी प्रकार मिस्र व भारत की यात्रा करके कालरा के रोगाणु का भी पता लगाया और इसी प्रकार वर्ष 1906 में मलेरिया की दवा बनायी जो कुनैन की भांति होती है। रॉबर्ट कोच का 11 दिसम्बर वर्ष 1843 ईसवी में जन्म हुआ और 27 मई सन 1910 को उनका निधन हो गया। उन्हें वर्ष 1905 में नोबल इनाम दिया गया। रॉबर्ट कोच को पेनिसिलीन के खोजकर्ता लुई पास्टर के बाद विश्व का सब से बड़ा सूक्ष्मजैविकी का विशेषज्ञ कहा जाता है। उन्होंने ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में और मानव समाज की सेवा में जो खोज की है उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

6 मई सन 1949 ईसवी को बेल्जियम के भौतिकशास्त्री एवं लेखक मोरिस मायटरलिंक का 87 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उन्होंने क़ानून की शिक्षा प्राप्त की और कुछ समय तक वकालत करते रहे किंतु चूंकि उन्हें क़ानून से अधिक लगाव नहीं था इस लिए वे पेरिस चले गए और वहीं लेखन में व्यस्त हो गए।
उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनका ड्रामा जलपक्षी कई भाषाओं में रूपान्तरित किया गया और इसे बड़ी ख्याति मिली। उनके अन्य ड्रामों में मधुमक्खी, बुद्धी व भाग्य, चींटियां, सीधे लोगों का ख़ज़ाना आदि का नाम लिया जा सकता है। मोरिस मायटरलीक को वर्ष 1911 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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12 रमज़ान वर्ष 597 हिजरी क़मरी को छठी शताब्दी के इतिहासकार ¸ धर्मशास्त्री एवं पैग़म्बर इस्लाम के कथनों को एकत्रित करने वाले इब्नुलजौज़ी का बग़दाद में निधन हुआ। उनका जन्म 510 हिजरी क़मरी में हुआ और उन्होंने ज्ञान प्राप्ति हेतु अपनी आयु की कुछ अवधि को यात्रा करने में बिताया। फ़िक़्ह एवं हदीस के ज्ञानों में दक्षता रखने के अतिरिक्त उपदेश तथा भाषण देने में भी इब्नुल जौज़ी बहुत दक्ष गुरू माने जाते थे और बहुत से धर्मगुरू उन पर विश्वास रखते थे। उन्हों ने अपनी आयु का अधिकतर समय पुस्तकें लिखने में बिताया। उन की रचनाओं की संख्या 200 से अधिक बतायी गई है। इब्नुलजौज़ी की सब से प्रसिद्ध रचनाओं में अलमुन्तज़िम और मवाएज़ुलमुलुक की ओर संकेत किया जा सकता है।