गुरुवार - 28 मई
28 मई सन 1940 ईसवी को द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ में बेल्जियम पर, जिसने अपनी निष्पक्षता की घोषण की थी, नाज़ी जर्मनी का अधिकार हो गया।
बेल्जियम के सैनिकों ने जिन्हें ब्रिटेन का समर्थन प्राप्त था, नाज़ी जर्मनी सेना के आक्रमण का 18 दिनों तक मुक़ाबला करने के बाद बेल्जियम के तत्कालीन नरेश लियोपोल्ड त्रितीय के आदेश पर प्रतिरोध बंद कर दिया। नरेश के इस क़दम से जनता में अप्रसन्नता फैल गयी और अंतत: 1951 ईसवी में उन्हें औपचारिक रुप से अपना पद छोड़ना पड़ा। दूसरी ओर इसी दिन फ़्रांस में भी संयुक्त सेना ने जर्मनी की सेना से एक विनाशकारी युद्ध लड़ने के बाद उत्तरी फ़्रांस की डनकर्क बंदरगाह से पीछे हटना आरंभ किया। इस कार्रवाही में ब्रिटेन फ़्रांस और बेल्जियम के 3 लाख 50 हज़ार सैनिकों की जान बचाने के लिए संयुक्त सेना की 1774 नौकाओं ने भाग लिया किंतु जर्मनी की सेना की भीषण बम्बारी से 50 हज़ार सैनिक मारे गये और 400 युद्धनौकाएं नष्ट हो गयीं। फ़्रांस में संयुक्त सेना की पराजय के बाद यह देश पूर्ण रुप से जर्मनी के अधिकार में चला गया।
- 28 मई सन् 1674 को जर्मनी की संसद ने फ्रांस के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा की।
- 28 मई सन् 1959 में आज ही के दिन दो अमरीकी बंदरों ने अंतरिक्ष की सफल यात्रा की।
- 28 मई सन् 1967 में ब्रितानी नाविक सर फ्रांसिस चिटचेस्टर आज ही के दिन अकेले नाव में दुनिया का चक्कर लगा कर घर पहुंचे।
- 28 मई सन् 1996 में रूस चेचेन्या को अधिकतम स्वायत्तता देने पर सहमत हुआ।
- 28 मई सन् 1998 में पकिस्तान ने पहला परमाणु परिक्षण किया।
- 28 मई सन् 2002 को नेपाल में फिर आपातकाल लगा।
- 28 मई सन् 2008 में नेपाल में 240 सालों से चली आ रही राजशाही का आज ही के दिन अंत हुआ।
28 मई सन 1847 ईसवी कोई अमरीका में टेलीफ़ोन के आविष्कारक एलेग्ज़नडर ग्राहम बेल का जन्म हुआ। उन्हें बचपन से ही तकनीकी कामों से बहुत लगाव था। दस वर्ष के अध्ययन और शोधकार्य के बाद बिल ऐली मशीन बनाने में सफल हो गये जो ध्वनि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा सकती हो। इसी मशीन का विकसित रुप आज का टेलीफ़ोन है। इसी प्रकार बेल ने फोनोग्राफ और टेप रिकॉर्डर का भी आविष्कार किया।
28 मई सन 1892 ईसवी को फ़्रांस के दार्शनिक और साहित्पकार जोज़फ अरनिस्ट रेनन का निधन हुआ। वे सन 1823 में जन्में थे और आरंभिक शिक्षा प्राप्ति के बाद दर्शनशास्र का ज्ञान अर्जिन करने में लीन हो गये। उन्होंने धीरे धीरे इस क्षेत्र में बहुत प्रगति की। साथ ही वे साहित्यभी पढ़ते रहे और इस विषय में डॉक्ट्रेट डिग्री प्राप्त की। वे शिक्षा पर बहुत बल देते थे, साथ ही धर्म से भी उन्हें बड़ा लगाव था। उनकी पुस्तकों के नामों का अनुवाद ज्ञान का भविष्य, सामी भाषा का इतिहास, बनी इस्राईल का इतिहास आदि है।
28 मई सन 1940 ईसवी को द्वितीय विश्व युद्ध के आरंभ में बेल्जियम पर, जिसने अपनी निष्पक्षता की घोषण की थी, नाज़ी जर्मनी का अधिकार हो गया। बेल्जियम के सैनिकों ने जिन्हें ब्रिटेन का समर्थन प्राप्त था, नाज़ी जर्मनी सेना के आक्रमण का 18 दिनों तक मुक़ाबला करने के बाद बेल्जियम के तत्कालीन नरेश लियोपोल्ड त्रितीय के आदेश पर प्रतिरोध बंद कर दिया। नरेश के इस क़दम से जनता में अप्रसन्नता फैल गयी और अंतत: 1951 ईसवी में उन्हें औपचारिक रुप से अपना पर छोड़ना पड़ा। दूसरी ओर इसी दिन फ़्रांस में भी संयुक्त सेना ने जर्मनी की सेना से एक विनाशकारी युद्ध लड़ने के बाद उत्तरी फ़्रांस की डनकर्क बंदरगाह से पीछे हटना आरंभ किया। इस कार्रवाही में ब्रिटेन फ़्रांस और बेल्जियम के 3 लाख 50 हज़ार सैनिकों की जान बचाने के लिए संयुक्त सेना की 1774 नौकाओं ने भाग लिया किंतु जर्मनी की सेना की भीषण बम्बारी से 50 हज़ार सैनिक मारे गये और 400 युद्धनौकाएं नष्ट हो गयीं। फ़्रांस में संयुक्त सेना की पराजय के बाद यह देश पूर्ण रुप से जर्मनी के अधिकार में चला गया।

28 मई सन 1998 ईसवी को पाकिस्तान ने पहली बार पांच परमाणु परीक्षण किये। पाकिस्तान ने अपने पारम्परिक प्रतिद्वंद्वी और पड़ोसी देश भारत के परमाणु परीक्षण के दो सप्ताह बाद यह क़दम उठाया था। इस प्रकार दोनों देशों के बीच वर्षों से जारी प्रतिस्पर्थ परमाणु हथियारों के स्तर तक पहुँच गयी। पाकिस्तान की इस कार्यवाही से पश्चिमी देश क्रेधित हुए और अमरीका एवं योरोप ने पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।

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8 ख़ुरदाद वर्ष 1368 हिजरी शम्सी को ईरान के प्रसिद्ध धर्मगुरू मीर सैयद अली फ़ानी इस्फ़हानी का जन्म हुआ। उन्होंने नौ वर्ष की आयु से ही धार्मिक ज्ञान प्राप्त करना आरंभ कर दिया । उन्होंने आरंभिक धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बाद आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद नजफ़ाबादी और आयतुल्लाह मीर सैयद अली नजफ़ाबादी जैसे प्रख्यात धर्म गुरूओं से ज्ञान प्राप्त किया और इस्फ़हान में ही वे इस्लामी आदेशों के बारे में फ़त्वा देने लगे अर्थात मुजतहिद बन गये। इसके बाद वे इराक़ के पवित्र नगर नजफ़ चले गये, जहां उन्होंने तीस वर्षों तक धर्मशास्त्र, उसूल, क़ुरआन की व्याख्या, वादशास्त्र और शिष्टाचार व नैतिकता के विषयों की शिक्षा दी। तीस वर्ष के बाद वे ईरान के पवित्र नगर क़ुम वापस पलट आए और धर्मशास्त्र और उसूल के विषयों पर सर्वोच्च क्लासों को पढ़ाने लगे। उन्होंने अस्सी से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें अरबईन हदीस और सूरए हम्द की व्याख्या विशेषकर उल्लेखनीय है। उनका 74 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
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5 शव्वाल सन 60 हिजरी क़मरी को इमाम हुसैन अ के चेरे भाई मुस्लिम इब्ने अक़ील मदीना नगर से इमाम हुसैन का प्रतिनिधित्व करते हुए इराक़ के कूफ़ा नगर पहुँचे। कूफ़ा वासियों ने इमाम हुसैन को निरंतर पत्र भेज कर इसकी मांग की थी। कूफ़ा पहुँचकर उन्होने इमाम हुसैन अ का पत्र इस नगर के लोगों के समक्ष पढ़ा जिससे 18 हज़ार लोग आपके आज्ञापालन के लिए वचनबद्ध हो गये। किंतु कुछ ही समय बाद कूफ़ा के अत्याचारी शासक इब्ने ज़्याद की धमकियों और प्रलोभन के चलते इस नगर के अधिकतर लोगों ने अपना वचन तोड़ दिया और कुछ तो इमाम हुसैन अ से युद्ध के लिए कर्बला भी गये। कूफ़े में अकेले पड़ गये हज़रत मुस्लिम को इब्ने ज़्याद के सैनिकों ने शहीद कर दिया।