निज़ामी गन्जवी-4
निज़ामी को सबसे अच्छा और वास्तव में फ़ारसी साहित्य की समृद्ध कहानियों को बयान करना वाला शायर व लेखक कहा जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि फ़ारसी साहित्य में समृद्ध शेर उन शेरों को कहा जाता है जो भावनाओं और मन की बातों को बयान करने वाले होते हैं। डाक्टर सईद हमीदियान सहित बहुत से विशेषज्ञों और निज़ामी के संबंध में शोध करने वालों का कहना है कि जिस तरह फ़िरदौसी शैर्य गाथाओं को बयान करने में निपुण व दक्ष और अद्वितीय हैं उसी प्रकार निज़ामी भी साहित्यक दृष्टि से फ़ारसी भाषा के समृद्ध शेर कहने वालों में अग्रणी हैं।
निज़ामी ने बहुत से शेर कहे हैं जिनमें से पांच मसनवी पर आधारित क़सीदों व ग़ज़लों का पद्य संकलन अब तक बाक़ी है। मख़ज़नुल असरार, लैला व मजनू, ख़ुसरू व शीरीन, हफ़्त पैकर और सिकंदर नामा, उनके पद्य संकलन हैं जो पंज गंज अर्थात पांच ख़ज़ानों के नाम से प्रसिद्ध हैं इनमें से ज़्यादातर ने विश्व सप्हित्य जगत में स्थान हासिल किया। बहुत से ईरानी और विदेशी शोधकर्ताओं द्वारा इन स्चनाओं का ओर उन की समीक्षा व व्याख्याएं की गयी हैं।
बहुत से शायरों और बुद्धिजीवियों के अतिरिक्त जिन्होंने उनके काल में या उनके काल के बाद निज़ामी की मसनवियों का अनुसरण किया या उनकी पुस्तकों की समीक्षा की, हालिया एक दो शताब्दी में भी निज़ामी तथा निज़ामी की पुस्तकों और उनके शेरों पर शोध और टीका टिप्पणी यूरोप और दुनिया के बहुत से देशों में की गयी या कुछ लोगों ने उनकी बहुत से शेरों या पुस्तकों का दुनिया की अन्य भाषाओं में अनुवाद किया। ब्रिटेन के विलियम जोन्ज़, फ़ेन हामर पोरगश्ताल, हेलमोट रीटर और जर्मनी से वेल्हेलम बाख़र, इटली के इटालो पेतीज़ी, रूस से यूगनी अदवारदोवीच, अब्दुल मुनईम हसनैन तथा बहुत से अनुवाद व शोधकर्ता थे जिन्होंने ईरान की धरती से बाहर निज़ामी की पुस्तकों की समीक्षाएं की और उनके शेरों पर टीका टिप्पणी की।
विषय वस्तु में भिन्नता के बावजूद निज़ामी की मसनवी एक दूसरे से जुड़ी हुई समन्वित चीज़ों का नाम है। इसमें समस्त अलग अलग विषयों को बहुत ही अच्छे अंदाज़ में एक दूसरे से मिलाया गया है। अर्थात सारे विषयों को एक माला में पिरोया गया है। हर मसनवी अल्लाह और उसके दूत हज़रत मुहम्मद (स) की प्रशंसा तथा यह बयान करते हुए कि किस लिए यह पुस्तक लिखी गयी है, शुरु होती है और उसके बाद वह अपने मुख्य विषय को बयान करती है जो पूर्ण रूप से एक दूसरे से भिन्न होते हैं।
निज़ामी के पंज गंज अर्थात पांच ख़ज़ानों के पहले पद्य संकलन का नाम मख़ज़नुल असरार है। निज़ामी ने इस पुस्तक को आयु के उस चरण में लिखा कि अभी युवावस्था का काल समाप्त नहीं हुआ था और स्वभाविक रूप से उनके लिए बुद्धि का स्थान प्रेम से आगे है। वास्तव में वह इस काल में बुद्धि के महत्व को ही नहीं समझ सके थे। वह बुद्धी को उसे ईश्वरीय पहचान तक पहुंचने का बेहतरीन साधन समझते थे जबकि बाद में उनकी आस्था बदल गयी और उनका यह मानना था कि वास्तविकता तक पहुंचने का एक मात्र मार्ग ईश्वरीय प्रेम है।
साहित्यिक आलोचकों का मानना है कि इस बात के दृष्टिगत कि निज़ामी ने मख़ज़नुल असरार लिखते समय जो विशेष ध्यान सनाई की पुस्तकों पर दिया उसके कारण यह पुस्तक विशेष महत्व की स्वामी हो गयी। निज़ामी की मख़ज़नुल असरार, बयान और वाकपटुता की दृष्टि से अधिकतर स्थान पर सेनाई की हदीक़ा नामक पुस्तक से अधिक शक्तिशाली है। विषय वस्तु की दृष्टि से भी यह कहा ज सकता है कि निज़ामी का रुझहान नैतिकता की ओर है और उनके दृष्टिकोण सार्थक हैं और वह अत्याचार व अत्याचारियों के विरोधी हैं जबकि बौद्धिक व परिज्ञान के मामले में रुझान के कारण, सेनाई अत्याचार सहन करने का निमंत्रण देते हैं।
मख़ज़नुल असरार वह पुस्तक है जिसमें केवल नैतिक विषयों पर आधारित उपदेश से भरपूर लोगों की कहानियां बयान की गयीं हैं। मसनवी शिक्षा और परिज्ञान से ओतप्रोत है और निज़ामी ने अपनी इस पुस्तक में बहुत ही जटिल और अस्पष्ट बातें कही हैं। मख़ज़नुल असरार निज़ामी का सबसे छोट पद्य संकलन है जिसमें 2400 शेर हैं। इस पद्य संकलन में आरंभिक भूमिका के बाद, पुस्तक को बीस भागों में विभाजित किया गया है और हर भाग का अलग अलग नाम है जिसमें निज़ामी ने नैतिकता और परिज्ञान के अर्थ को मनुष्य की आत्मा को संबोधित करते हुए बयान किया है और हर चर्चा के अंत में अधिक से अधिक समझने के लिए संक्षिप्त चर्चा की गयी है।
जो कहानियां बयान की गयीं हैं वह सबके सब या उनमें से अधिकतर नैतिकता व शिष्टाचार को बयान करती हैं। इन समस्त भ्रांतियों के बावजूद यह कहानियां, अन्य भागों की तुलना में अधिक साधारण और सरल हैं और इनमें अधिकतर में उपमा या उपमा वाली कहानियों का प्रयोग किया गया है। निज़ामी ने वास्त में इस चर्चा से अपनी बात को आम लोगों की समझ से निकट कर दिया है।
उदाहरण स्वरूप निज़ामी अपनी पुस्तक मख़ज़नुल असरार के नवें अध्याय में अपने पाठकों से ऊंच्च साहस का ध्यान रखने तथा सांसारिक रीति रिवाजों को छोड़ने की आवश्यकता की अनुशंसा करते हैं और अपने संबोधकों को बताते हैं कि अपने परिणाम के अवगत रहें और परलोक के लिए तैयार रहें। निज़ामी की दृष्टि में दुनिया रहने का स्थान नहीं है और दुनिया नामक व्यापक विस्तृत मरुस्थल मनुष्य के सामने है और हर एक को जाने अनजाने में उससे गुज़रना है और इससे गुज़रने के लिए सवारी की तलाश करनी चाहिए और उस सवारी से इस लंबे रास्ते को पार किया जा सकता है। निज़ामी के अनुसार, इस दुनिया से गुज़रने में सहायता प्रदान करने वाली सवारी केवल और केवल धर्म है।
उसके बाद निज़ामी अपनी बात अधिक समझाने के लिए एक धर्मावलंबी की कहानी बयान करते हैं जो मस्जिद से खंडहर की ओर से जाता है और उसके बाद प्रायश्चित करता है और पापों से पवित्र हो जाता है और फिर धर्म का पालन करता है और उपासना करने लगता है।
निज़ामी की दृष्टि में मनुष्य प्रशंसनीय अस्तित्व है जिसके भीतर अनेक प्रकार की अनंतहीन क्षमताएं पायी जाती हैं। निज़ामी की दृष्टि में यदि मनुष्य का व्यवहार फ़रिश्तों जैसा होगा और ईश्वर जैसी समझ बूझ रखने लगे, तो वह सृष्टि के लिए गर्व और दुनिया के लिए गौरव का कारण बनेगा। वह मनुष्य के होश, चतुराई और उसकी कला पर पूर्ण विश्वास रखते हैं और उनका मानना है कि इन्हीं कारणों से अन्य सृष्टि से मनुष्य अलग है। यही कारण है कि वह मख़ज़नुल असरार नामक पुस्तक की भूमिका में ज्ञान की विशेषताओं को बयान करते हैं और मनुष्य के स्थान के बारे में बातें करते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि निज़ामी मनुष्य को यह याद दिलाने के प्रयास में हैं कि दुनिया की सबसे बेहतरीन व अच्छी सृष्टि तुम ही हो।
उनका यह मानना है कि मनुष्य की आत्मा, शरीर या उसकी जान व बदन, ज़मीन, मिट्टी, आसमानी और उच्च जैसे तत्वों से मिलकर बना है। उन्होंने यह प्रयास किया कि अपनी शायरी के माध्यम से मनुष्य के चेहरे पर पड़े दोहरे पर्दे को हटा दें। निज़ामी मनुष्य के विदित रूप को कुछ नहीं समझते किन्तु मिट्टी और पान की कुछ बूंदें, इसी लिए वह पसंद करता है, मनुष्य अस्तित्व के उच्च आयाम का भी चित्रण करे।
पूर्ण रूप से निज़ामी के विचारों में मनुष्य को केन्द्रियता प्राप्त है और दुनिया की सारी चीज़ें सीधे रूप से उसके संपर्क में रहती हैं, वास्तव में उन्होंने समस्त संभावनाओं से लाभ उठाया ताकि मनुष्य के ध्यान को उसके आत्मिक आयाम की ओर केन्द्रित करें और उसकी वास्तविक परिपूर्णता तक उसे पहुंचाएं। निज़ामी की दृष्टि में मनुष्य का मन मस्तिष्क दर्पण की भांति होता है जिस पर दुनिया के लोभ, आंतरिक इच्छाओं और पापों के कारण ज़ंग लग जाता है और ईश्वर के मार्ग से हट जाता है और यही कारण है कि वह अपनी प्रवृत्ति के विपरीत कार्यवाही करता है। मख़ज़नुल असरार में निज़ामी ने मनुष्य के अस्तित्व से इस ज़ंग को हटाने का प्रयास किया।
समकालीन विख्यात शोधकर्ता व साहित्यकार डाक्टर अब्दुल हुसैन ज़र्रीन कूब पुस्तक मख़ज़नुल असरार और इसमें वर्णित विषयों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि निज़ामी ने अपनी किताब मख़ज़नुल असरार में अपनी तेज़, कटु और लोगों को बुरी लगने वाली बातों को हर भाग के अंत में छोटी छोटी तथा अर्थपूर्ण कहानियों के साथ बयान किया है, यह कहानियां और आलेख, दिल पर उतरी हुई चीज़ें हैं जो शायर ने एकांत में तथा संसारिक मायामोह से दूर अपनी युवावस्था के वर्षों के प्रयास के दौरान प्राप्त किया है।
निज़ामी ने मख़ज़नुल असरार लिखने में सेनाई की पुस्तक विशेषकर उनकी हदीक़ा नामक पुस्तक से बहुत सहायता प्राप्त की। उस समय सेनाई की पुस्तकें बहुत विख्यात थीं और हर व्यक्ति की ज़बानों पर उनकी पुस्तकों के नाम हुआ करते थे, इसी बात के दृष्टिगत ख़ाक़ानी, निज़ामी और ज़हीरुद्दीन फ़ाराबी जैसे शायर, अपनाने पर मजबूर हुए सेनाई की शायरी की शैली अपनाने पर मजबूर हुए और उनकी शिक्षा व शोध की शैली को अपनी शायरी और पुस्तकों में प्रतिबिंबित किया।