Jun ०३, २०१६ ०६:०० Asia/Kolkata

3 जून सन 1502 ईसवी को पुर्तगाल के नाविक वास्को डीगामा के हाथों दक्षिणी भारत के कालीकट क्षेत्र में भयानक जन्संहार हुआ।

कालीकट, मद्रास के निकट की बंदरगाह का नाम था। यह बंदरगाह वह पहला स्थान था जहॉ पहली बार सन 1498 ईसवी में वास्कोडीगामा पहुंचा और उसे अपने अतिग्रहण में लिया। वो भी दूसरे अतिग्रहणकारियों की भॉति स्वयं को भारत का असली स्वामी मानता था। जब 8 सौ, अरब नाविक व्यापर के लिए कालीकट पहुंचे तो वास्कोडीगामा ने आदेश दिया कि पहले उनके नाक कान काटे जाएं फिर उनकी नौकाओं को आग लगाई जाए और फिर उन्हें मार दिया जाए।

  • 3 जून सन् 1915 में ब्रिटिश सरकार ने रविंद्रनाथ टैगोर को नाइटहुड की उपाधि से नवाज़ा।
  • 3 जून सन् 1918 को  महात्मा गांधी की अध्यक्षता इन्दौर में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी को माना गया।
  • 3 जून सन् 1943 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने राहत और पुनर्वास प्रशासन की स्थापना की।
  • 3 जून सन् 1947 में ब्रिटिश राज में भारत के अंतिम वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के बंटवारे का ऐलान किया था।
  • 3 जून सन् 1959 में सिंगापुर को सेल्फ़ गर्वनिंग स्टेट घोषित किया गया।
  • 3 जून सन् 1999 में यूगोस्लाविया द्वारा कोसोवो शांति योजना को मंज़ूरी।
  • 3 जून सन् 2008 में जापानी प्रयोगशाला के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का डिस्कवरी यान अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पहुँचा।

 3 जून सन 1667 ईसवी को पहली बार मनुष्य के शरीर में बाहर से खून चढ़ाया गया। फ्रांस के चिकित्सक जॉन बैपटेस्ट डेनिस ने पहली बार इस काम में सफलता प्राप्त की। रोगियों के शरीर में खून चढाने का प्रयोग सफल हो जाने से चिकित्सा और उपचार के क्षेत्र में भारी प्रगति हुई। क्योंकि उससे पहले तक बहुत से लोग ख़ून बह जाने के बाद ख़ून की कमी के कारण मर जाते थे। उस चिकित्सक ने अपने पहले प्रयोग में एक भेड़ का ख़ून मनुष्य के शरीर में चढ़ाया और बाद में फिर मानव शरीर में दूसरे मनुष्य का ख़ून चढ़ाने का सफल परीक्षण किया।

 

 3 जून सन 1940 ईसवी को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ़्रांस की बंदरगाह डनकर्क से संयुक्त सेना के जवानों को बचाने का काम पूरा हुआ और ब्रिटन, फ़्रांस और बेल्जियम के तीन लाख 35 हज़ार  सैनिकों को बचा लिया गया।

3 जून सन 1995 ईसवी को नैटो और योरोपीय संघ के रक्षा मंत्रियों ने बोसनिया में संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना के जवानों को सर्ब आक्रमण से बचाने के लिए रैपिड एक्शन फ़ोर्स के गठन पर सहमति की।

 

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14 ख़ुर्दाद सन 1363 हिजरी शम्सी को ईरान की इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी ने कठिन परिश्रम और महान उपलब्धियों से भरे 87 वर्षीय जीवन के बाद संसार से विदा ली। इस सूचना के मिलते ही पूरा इस्लामी जगत शोकाकुल हो गया।
इमाम ख़मैनी 1 मेहर सन 1281 हिजरी शम्सी में ईरान के ख़ुमैन नगर में जन्में थे उन्होंने अपनी धार्मिक और शिक्षा संबंधी गतिविधियों के साथ ही राजनैतिक गतिविधियों को भी जारी रखा। सन 1342 हिजरी शम्सी में ईरान में अत्याचारी शासक शाह के क्रियाकलापों और अमरीका के हस्तक्षेप के विरूद्ध इमाम ख़ुमैनी ने अपने संघर्ष को तेज़ किया। जिसके बाद इमाम ख़ुमैनी को देश निकला देकर पहले तुर्की और फिर इराक़ भेजा गया। इराक़ में 13 वर्षीय निर्वासित जीवन के दौरान इमाम ख़ुमैनी ने शाह के अत्याचारों और ईरान में अमरीका के अवैध हितों का पर्दाफ़ाश किया और अपनी विज्ञाप्तियों से इस्लामी क्रान्ति की सफलता की भूमिका प्रशस्त की। इमाम ख़ुमैनी को इराक़ से फ़्रांस जाना पड़ा किंतु उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा और फिर जब वे फ़्रांस से अपने देश ईरान लौटे तो दस दिनों के भीतर इस्लामी क्रान्ति सफल हो गयी। क्रान्ति की सफलता के बाद आंतरिक और बाहरी ख़तरों का सामना करते हुए इमाम ख़ुमैनी ने जनता का मार्गदर्शन किया। इमाम ख़ुमैनी ने बहुत से लोगों को प्रशिक्षित करने और महत्वपूर्ण भाषणों के साथ ही अत्यंत मूल्यवान पुस्तकें लिखी हैं इनमें कश्फ़ुल असरार तहरीरूल वसीला, मिसबाहुल हिदाया, हुकूमते इस्लामी व विलायते फ़क़ीह आदि का नाम लिया जा सकता है।

 

14 ख़ुर्दाद सन 1363 हिजरी शम्सी को ही ईरान में इस्लामी क्रान्ति की वरिष्ठ नेता की चयनकर्ता परिषद ने सैयद अली ख़ामेनई को इस्लामी क्रान्ति का वरिष्ठ नेता चुना। इमाम ख़ुमैनी के स्वर्गवास के कुछ घंटों बाद उक्त परिषद ने बैठक करके लम्बी चर्चा की और अंतत: आयतुल्लाहिलउज़मा  सैयद अली ख़ामेनई को इस्लामी क्रान्ति का वरिष्ठ नेता चुना । उसके बाद से, आयतुल्लाहिल उज़मा  ख़ामेनई इमाम ख़ुमैनी के मार्ग पर चल रहे हैं। और उनके अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।

 

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11 शौवाल सन 487 हिजरी क़मरी को स्पेन के इतिहासकार और शब्दकोष विशेषज्ञ अब्दुल अज़ीज़ इन्दोलुसी का निधन हुआ। उन्होंने अपने समय में प्रचलित लगभग सभी ज्ञानों की शिक्षा ली। वे एक महान बुद्धिजीवी थे। उनकी कई पुस्तकें अब भी सुरक्षित हैं।

 

11 शव्वाल तीन साल हिजरत से पहले, पैग़म्बरे इस्लाम , धर्म के प्रचार के लिए ताएफ़ नगर गये। यह वर्तमान सऊदी अरब के मक्का नगर के निकट एक शहर है। पैग़म्बरे इस्लाम अपने धर्म के प्रचार के लिए ऐसी हालत में ताएफ़ गये थे कि जब इससे कुछ ही दिनों पहले उनके मददगार , उनके चचा हज़रत अबूतालिब का देहान्त हो गया था जिसके कारण क़ुरैश के क़बीले के लोगों ने उन्हें अधिक परेशान करना आरंभ कर दिया था। अगर ताएफ़ के लोग इस्लाम स्वीकार कर लेते तो मक्का से मुसलमान पलायन करके ताएफ़ चले जाते किंतु ताएफ़ के क़बीले ने न केवल यह कि पैग़म्बरे इस्लाम की बात मानने से इन्कार कर दिया बल्कि वहां के कुछ लोगों ने बच्चों को आगे बढ़ा कर पैग़म्बरे इस्लाम का अपमान किया और उन्हें घायल भी कर दिया।