Jul २६, २०२५ १७:५३ Asia/Kolkata
  • कु़रआन ईश्वरीय चमत्कार-1011

सूरए मुजादिला की आयतें 12 से 17

आइए सबसे पहले हम सूरए मुजादिला की आयत संख्या 12 और 13 की तिलावत सुनते हैं:

 

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِذَا نَاجَيْتُمُ الرَّسُولَ فَقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَةً ذَلِكَ خَيْرٌ لَكُمْ وَأَطْهَرُ فَإِنْ لَمْ تَجِدُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (12) أَأَشْفَقْتُمْ أَنْ تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَاتٍ فَإِذْ لَمْ تَفْعَلُوا وَتَابَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ فَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآَتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ (13)

इन आयतों का अनुवाद इस प्रकार है

 

ऐ ईमान वालो! जब तुम पैग़म्बर से निजी बातचीत करना चाहो, तो अपनी बातचीत से पहले सदक़ा दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर और पवित्र है। और अगर तुम्हें (कुछ देने के लिए) न मिले, तो (बातचीत कर सकते हो), क्योंकि अल्लाह बख़्शने वाला, दयालु है।[58:12]  क्या तुम इस बात से डर गए कि अपनी निजी बातचीत से पहले सदक़ा देना पड़ेगा? अब जब तुमने ऐसा नहीं किया और अल्लाह ने तुम्हें माफ़ कर दिया, तो नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो। अल्लाह उससे भली-भाँति अवगत है जो तुम करते हो।[58:13] 

 

पिछले कार्यक्रम में हमने निजी बातचीत और कानाफूसी के नापसंद होने पर चर्चा की थी। ये आयतें बताती हैं कि कुछ लोग दूसरों की मौजूदगी में पैग़म्बर से निजी बातचीत करते थे। यह कार्य पैग़म्बर और अन्य उपस्थित लोगों को नाराज़ करता था। इसलिए, अल्लाह ने आदेश दिया कि जिस किसी को कोई आवश्यक काम है और उसे पैग़म्बर से निजी तौर पर बात करनी है, उसे पहले एक सदक़ा ग़रीबों को देना चाहिए।

 

यह आदेश एक प्रकार के कंट्रोल की भूमिका निभाता था, ताकि जिन लोगों का कोई महत्वपूर्ण काम नहीं है, वे पैग़म्बर का समय न लें और उन्हें परेशान न करें। साथ ही, यह ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद का भी एक तरीक़ा था। 

आगे की आयतें दर्शाती हैं कि यह उपाय प्रभावी रहा। इसके बाद, लोगों ने परेशान करना बंद कर दिया और अनावश्यक माँगें नहीं कीं। हालाँकि, रिवायतों के अनुसार, केवल हज़रत अली अलैहिस्सलाम ही थे, जिन्होंने इस आदेश का पालन किया। वे महत्वपूर्ण चर्चाओं से पहले पैग़म्बर से मिलने से पहले सदक़ा देते थे और फिर निजी तौर पर बात करते थे।

 

इन आयतों से हमने सीखा:

 

- इस्लाम ने ग़रीबी उन्मूलन और समाज के वंचित वर्गों की देखभाल के लिए कई तरीक़े बताए हैं और विभिन्न बहानों से सदक़ा देने की सिफ़ारिश की है। 

- सदक़े के दो पहलू हैं: एक, ज़रूरतमंदों की मदद करना; दूसरा, धनवानों के दिलों को कंजूसी और दुनिया की मोह से पाक करना। 

- इस्लाम के आदेश लोगों की आर्थिक और शारीरिक क्षमता के अनुसार हैं और कभी भी उन्हें कठिनाई में नहीं डालते। 

 

आइए अब हम सूरए मुजादिला की आयत संख्या 14 और 15 की तिलावत सुनते हैं

 

أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ تَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مَا هُمْ مِنْكُمْ وَلَا مِنْهُمْ وَيَحْلِفُونَ عَلَى الْكَذِبِ وَهُمْ يَعْلَمُونَ (14) أَعَدَّ اللَّهُ لَهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (15)

इन आयतों का अनुवाद इस प्रकार है

 

क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्होंने उस क़ौम से दोस्ती की जिस पर अल्लाह का ग़ुस्सा है? वे न तो तुममें से हैं और न ही उनमें से, और वे जानबूझकर झूठी क़समें खाते हैं (कि वे तुम्हारे साथ हैं)।[58:14]  अल्लाह ने उनके लिए सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है, क्योंकि वे बहुत ही बुरे काम कर रहे थे।[58:15]   

 

ये आयतें मुनाफ़ेक़ीन की एक विशेषता की ओर इशारा करती हैं, और वह है दुश्मनों के साथ उनके गुप्त संबंध। इससे पता चलता है कि मुसलमानों को उन लोगों से सावधान रहना चाहिए जो दुश्मनों के साथ दोस्ती का षड्यंत्र रचते हैं और क़समें खाकर दावा करते हैं कि यह दोस्ती और आना-जाना मुसलमानों की पंक्तियों से अलग होने का संकेत नहीं है, बल्कि दुश्मनों के ख़तरे से बचने के लिए है। 

स्वाभाविक है कि इस आदत की वजह से न तो मुसलमानों को मुनाफेक़ीन पर भरोसा रहता है और न ही दुश्मन उन्हें अपना समझते हैं कि वे अपने गुप्त रहस्य और योजनाएँ मुनाफ़ेक़ीन के सामने खोलें। 

 

इन आयतों से हमने सीखा

 

- मुनाफ़ेक़ीन हमेशा पवित्र चीज़ों का दुरुपयोग करते हैं। इसलिए, उनकी पहचान और धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग को समझना आवश्यक है। 

- ग़ैर-मुसलमानों के साथ राजनीतिक और आर्थिक संबंध उनके प्रभुत्व को स्वीकार करने का कारण नहीं बनना चाहिए। 

 

आइए अब हम सूरए मुजादिला की आयत संख्या 16 और 17 की तिलावत सुनते हैं

 

اتَّخَذُوا أَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ فَلَهُمْ عَذَابٌ مُهِينٌ (16) لَنْ تُغْنِيَ عَنْهُمْ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُمْ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا أُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (17)

 

इन आयतों का अनुवाद इस प्रकार है

 

उन्होंने अपनी क़समों को ढाल बना लिया और लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोका। इसलिए, उनके लिए अपमानजनक अज़ाब है।[58:16]  न तो उनका धन और न ही उनके बच्चे, अल्लाह के यहाँ उनके किसी काम आएँगे। वे जहन्नमी हैं और हमेशा उसमें रहेंगे।[58:17]   

 

पिछली आयतों के ही सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए यह आयत मुनाफ़ेक़ीन द्वारा पवित्र चीज़ों के दुरुपयोग पर ज़ोर देती है और कहती है कि वे धार्मिक दिखावा करके ख़ुद को मोमिनों के लिए स्वीकार्य साबित करने की कोशिश करते हैं और बातचीत के दौरान इस तरह से धर्म और अल्लाह की बात करते हैं कि मोमिन उन्हें धार्मिक और ईमानदार समझने लगते हैं। 

वास्तव में, मुनाफ़ेक़ीन, लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकने के लिए एक तरफ़ अल्लाह, धर्म और पवित्र चीज़ों की क़समों का दुरुपयोग करते हैं, तो दूसरी तरफ़ दुनियावी फ़ायदे और अपने गंदे मक़सदों के लिए अपने धन, मानव शक्ति और संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि क़यामत में इनमें से कुछ भी उनके काम नहीं आएगा। 

 

इन आयतों से हम सीखते हैं:

 

- धर्म के ख़िलाफ़ धर्म का इस्तेमाल करना मुनाफ़ेक़ीन की रणनीति है। वे धार्मिक दिखावे के साथ लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकने की कोशिश करते हैं। 

- मुनाफिक़ ख़ुद को चालाक समझता है, लेकिन दुनिया और आख़ेरत में अपमान उसके दोग़लेपन का नतीजा है। 

- धन और ताक़त दुनिया में काम आ सकते हैं, लेकिन आख़ेरत में बिल्कुल काम नहीं आएँगे।