Sep १५, २०२५ १४:४८ Asia/Kolkata
  • क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-1012

सूरए मुजादेला आयतें 18 से 22

आइए सबसे पहले हम सूरए मुजादिला की आयत संख्या 18 और 19 की तिलावत सुनते हैं

يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيَحْلِفُونَ لَهُ كَمَا يَحْلِفُونَ لَكُمْ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ عَلَى شَيْءٍ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْكَاذِبُونَ (18) اسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ الشَّيْطَانُ فَأَنْسَاهُمْ ذِكْرَ اللَّهِ أُولَئِكَ حِزْبُ الشَّيْطَانِ أَلَا إِنَّ حِزْبَ الشَّيْطَانِ هُمُ الْخَاسِرُونَ (19)

इन आयतों का अनुवाद इस प्रकार है

जिस दिन अल्लाह उन सभी को पुनर्जीवित करेगा, तो वे उसी तरह उसकी क़सम खाएंगे जैसे तुम्हारे सामने क़सम खाते हैं, और वे समझते हैं कि वे किसी चीज़ पर (क़ायम) हैं। सुन लो! वास्तव में वही झूठे हैं।[58:18]  शैतान ने उन पर क़ब्ज़ा कर लिया है, इसलिए उसने उन्हें अल्लाह की याद से भटका दिया है। वे शैतान का गिरोह हैं। सावधान रहो! शैतान का गिरोह ही घाटे में हैं।[58:19]   

पिछले कार्यक्रम में मुनाफेक़ीन की एक विशेषता की ओर इशारा किया गया था, और वह यह कि वे धार्मिक पवित्र चीज़ों, जैसे अल्लाह के नाम पर क़सम खाने का दुरुपयोग करते हैं। क़ुरआन इन आयतों में कहता है कि झूठी क़समें और झूठ बोलना न केवल दुनिया में बल्कि आख़ेरत में भी उनका तरीक़ा है। 

मुनाफिक़ सोचते हैं कि क़यामत के दिन वे झूठी क़समों के ज़रिए ख़ुद को अल्लाह के न्याय से बचा लेंगे, इसलिए वे क़समें खाकर अपने गुनाहों को छुपाने की कोशिश करते हैं। वास्तव में, उन्हें लगता है कि उनमें इतनी ताक़त है कि वे अल्लाह को भी धोखा दे सकते हैं, और यह उनकी सबसे बड़ी मूर्खता और अज्ञानता है। 

क़ुरआन आगे कहता है कि मुनाफेक़ीन की मुख्य समस्या यह है कि शैतान ने उन पर कब्ज़ा कर लिया है और उन्होंने शैतान के वर्चस्व को स्वीकार कर लिया है। 

जहाँ शैतान का प्रभुत्व होता है, वहाँ अल्लाह और उसकी याद का कोई स्थान नहीं रह जाता। नतीजतन, मुनाफेक़ीन शैतान की पार्टी के सदस्य बन जाते हैं और अल्लाह के बजाय उसके अनुसरण को अपना मूल्य समझते हैं। 

इन आयतों से हमने सीखा:

जो कोई भी शैतान का अनुसरण करता है, वह नुक़सान और घाटे में पड़ जाता है। यह नुक़सान दुनिया और आख़ेरत दोनों में है, लेकिन आख़ेरत में उसकी हार स्पष्ट होगी। 

अगर झूठ बोलना इंसान की आदत बन जाए, तो वह क़यामत के दिन भी अल्लाह के सामने झूठ बोलेगा और सोचेगा कि यह उसकी चालाकी है। 

असली नुक़सान शैतान का अनुसरण करने में है, जो इंसानियत को बर्बाद कर देता है, न कि धन के नुक़सान में। 

आइए अब सूरए मुजादिला की आयत संख्या 20 और 21 की तिलावत सुनते हैं:

إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَئِكَ فِي الْأَذَلِّينَ (20) كَتَبَ اللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا وَرُسُلِي إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ (21)

इन आयतों का अनुवाद है:

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल से दुश्मनी रखते हैं, वे सबसे पस्त लोगों में से हैं।  [58:20]  अल्लाह ने लिख दिया है: मैं और मेरे रसूल ज़रूर हावी हो जाएंगे। निस्संदेह, अल्लाह ताक़तवर और अजेय है। [58:21]   

 पिछली आयत में मुनाफ़ेक़ीन के अहंकार और ताक़त के भ्रम का ज़िक्र किया गया था। ये आयतें कहती हैं कि अल्लाह के नज़दीक ये लोग सबसे पस्त हैं और वे कभी भी अल्लाह की मर्ज़ी पर हावी नहीं हो सकते। 

इलाही मत की बातिल विचारधाराओं पर जीत के दो पहलू हैं: एक बाहरी पहलू, जो मोमिनीन के सहयोग से हासिल होता है, और दूसरा विचार और तर्क का पहलू। हमेशा इस दृष्टि से हक़ बातिल पर हावी रहा है और यह जीत लगातार बढ़ती जा रही है। 

इन आयतों और क़ुरआन की अन्य आयतों के अनुसार, अल्लाह का एक वादा यह है कि अंततः हक़ बातिल पर और पैग़म्बरों का मकतब मानव-निर्मित विचारधाराओं पर हावी होगा, जिससे बातिल का पतन और अपमान होगा। 

इन आयतों से हमने सीखा:

धार्मिक मामलों में दोग़लेपन और मुनाफ़ेक़त का अंत कुफ़्र और अल्लाह व रसूल के आदेशों के विरोध में पड़ जाना है। 

 हक़ के सामने खड़े होने से बातिल वालों की हार और बेइज़्ज़ती होती है। 

 हक़ की अंतिम जीत का अल्लाह का वादा अभी पूरा नहीं हुआ है। पैग़म्बर की एक हदीस के अनुसार, यह वादा इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़माने में पूरा होगा। 

आइए अब हम सूरए मुजादिला की आयत संख्या 22 की तिलावत सुनते हैं

لَا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آَبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ أُولَئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الْإِيمَانَ وَأَيَّدَهُمْ بِرُوحٍ مِنْهُ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ أُولَئِكَ حِزْبُ اللَّهِ أَلَا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (22)

इस आयत का अनुवाद है

तुम किसी ऐसे समुदाय को नहीं पाओगे जो अल्लाह और आख़ेरत के दिन पर ईमान रखता हो और साथ ही उससे दोस्ती रखता हो जिसने अल्लाह और उसके रसूल से दुश्मनी की हो, चाहे वे उनके बाप, बेटे, भाई या क़बीले वाले ही क्यों न हों। ये वो लोग हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान लिख दिया है और उन्हें अपनी तरफ़ से रूह से सहारा दिया है। वह उन्हें ऐसी जन्नतों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं, जहाँ वे हमेशा रहेंगे। अल्लाह उनसे राज़ी है और वे उससे राज़ी हैं। ये अल्लाह की पार्टी हैं। सुन लो! अल्लाह की पार्टी ही कामयाब होने वाली है।[58:22]    

 यह आयत, जो सूरा-ए-मुजादिला की आख़िरी आयत है, एक मूल सिद्धांत की ओर इशारा करती है और कहती है: अल्लाह और उसके औलिया की मुहब्बत और दीन के दुश्मनों की मुहब्बत एक दिल में नहीं समा सकती। अगर कोई ज़बान से कहे कि वह अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखता है, लेकिन दिल में उन रिश्तेदारों, दोस्तों और क़रीबियों से मुहब्बत रखता है जो दीन के ख़िलाफ़ खड़े हैं, तो वह असली मोमिन नहीं है। 

 स्वाभाविक है कि अगर कोई अल्लाह के लिए अपने कुछ क़रीबियों से, जो अल्लाह के दुश्मन हैं, दूरी बना लेता है और विचारधारा  के जुड़ाव को पारिवारिक भावनाओं से ऊपर रखता है, तो वह अल्लाह की रज़ामंदी और मदद का हक़दार बन जाता है। 

 मुनाफ़ेक़ीन, जो ज़बान से ईमान का दावा करते थे लेकिन दिल में अल्लाह के दुश्मनों से मुहब्बत रखते थे, इस सूरे की आयत 19 में शैतान की पार्टी बताए गए हैं। यह आयत उन मोमिनीन को, जो अल्लाह के दुश्मनों से दूरी बनाते हैं, अल्लाह की पार्टी बताती है और उनकी जीत का वादा करती है। 

इस आयत से हमने सीखा:

 ईमान वालों से दोस्ती और दीन के दुश्मनों से दूरी, असली ईमान की शर्त है, जैसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने मुशरिक चाचा से दूरी बना ली थी। 

 एक दिल में दो मुहब्बतें नहीं समा सकतीं। अल्लाह ने इंसान के लिए दो दिल नहीं बनाए कि वह विरोधी मुहब्बतों को समेट सके। इसलिए, अल्लाह की मुहब्बत और दीन के दुश्मनों की मुहब्बत एक साथ नहीं चल सकती। 

 इस्लाम में ईमानी और विचारधारा के रिश्ते, पारिवारिक, क़बायली, यहाँ तक कि राष्ट्रीय रिश्तों से भी ऊपर हैं।