गुरुवार- 18 जून
18 जून सन 1815 ईसवी को नेपोलियन बोनापार्ट और संयुक्त योरोपीय देशों के बीच वॉटरलू की अंतिम और ऐतिहासिक लड़ाई हुई।
1576, महाराणा प्रताप और मुग़ल सम्राट अकबर के बीच हल्दी घाटी का युद्ध शुरू हुआ।
1812, अमरीका और ब्रिटेन के बीच युद्ध शुरू हुआ।
1815, वाटरलू में ब्रिटेन से हारने के बाद नेपोलियन से फ्रांस की सत्ता छीन ली गई।
1946, डॉ. राम मनोहर लोहिया की अगुवाई में गोवा में पुर्तगाल के शासन के ख़िलाफ़ पहला सत्याग्रह आंदोलन शुरू हुआ था।
1972, ब्रिटिश यूरोपीयन एयरवेज़ का यात्री विमान हादसे का शिकार, 118 लोग मारे गए।
1979, अमरीका और सोवियत संघ के बीच हथियार नियंत्रण समझौता हुआ।
2003, गूगल ने इंटरनेट प्रोग्राम एडसेंस पेश किया.
2009, नासा ने चांद पर पानी की खोज के लिए टोही यान भेजा।
इस युद्ध में बेल्जियम के वाटरलू नामक गांव में प्रॉस की संयुक्त सेनाओं ने नेपोलियन बोनापार्ट की सेना के विरुद्ध मोर्चा संभाला। इस युद्ध के दौरान चूंकि भारी वर्षा हो गयी अत: नेपोलियन की सेना की तोपों का आगे बढ़ना कठिन हो गया। नेपोलियन ने अपनी लड़ाइयों में इन तोपों का सफल प्रयोग किया था। तोपों के आगे बढ़ने और पहुंचने में देरी के कारण नेपोलियन को इस युद्ध में पराजय हो गयी और उन्होंने ब्रिटेन तथा प्रॉस की सेना के समक्ष हथियार डाल दिये। वॉटरलू युद्ध के बाद नेपोलियन को ब्रिटेन के समुद्री जहाज़ से सेंट हेलेन द्वीप की ओर देश निकाला दे दिया गया। जहॉ कुछ वर्षो पश्चात नेपोलियन की मृत्यु हो गयी।
18 जून सन 1953 ईसवी को मिस्र में गणतांत्रिक व्यवस्था की घोषणा की गयी। इसी के साथ इसदेश के नरेश मलिक फ़ारुक़ को सपरिवार देश निकाला दे दिया गया। ज़ायोनी शासन से युद्ध में पराजय के कारण जनता का विश्वास मलिक फ़ारुक़ से उठ गया और देश में उहापोह मच गया। जिसके बाद मिस्र की सेना में एक गुप्त संगठन बन गया जो ब्रिटेन के वर्चस्व और मिस्र के नरेश का कटटर विरोधी था। इस संगठन ने सन 1952 में मोहम्मद नजीब और जमाल अब्दुन्नासिर के नेतृत्व में विद्रोह करके मलिक फ़ारुक़ को सत्ता छोड़ने पर विवश कर दिया। विद्रोहयों ने मलिक फ़ारुक़ के पुत्र मलिक फ़ोआद को अस्थायी रूप से मिस्र का नरेश घोषित कर दिया किंतु एक वर्ष बाद मलिक फ़ारुक़ के परिवार को देश निकाला दे दिया गया और मिस्र में प्रजातंत्र की स्थपना हुई। इसप्रकार जनरल मोहम्मद नजीब ने मिस्र के पहले राष्ट्रपति के रुप में शपथ ग्रहण की। एक वर्ष बाद जमाल अब्दुन्नासिर ने मोहम्मद नजीब को किनारे लगाकर सत्ता हथिया ली। उन्होंने इस्राईल से कड़ा संघर्ष करके अरब देशों में बड़ी लोकप्रियता प्राप्त की।

18 जून सन 1997 ईसवी को तुर्की के इस्लामवादी प्रधान मंत्री नज्मुददीन अर्बकान, इस देश के सैनिकों के दबाव में त्यागपत्र देने पर विवश हुए। इससे पहले 1994 में तुर्की में मध्यावधि चुनाव में अर्बकान के नेतृत्व में रिफ़ाह पार्टी ने भारी बहुमत प्राप्त किया था और उन्होंने गठबंधन मंत्रीमंडल बनाया था। किंतु देश के सैनिक अधिकारियों और धर्मविरोधी धड़ों ने उनके मार्ग में भारी रुकावटें डालीं। अर्बकान इस्लामी झुकाव वालों के जनसंहार को अनुचित तथा ज़ायोनी शासन से संबंधों को अवैध मानते थे। उन्होंने इस्लामी देशों से तुर्की के संबंधों को प्रगाढ़ बनाने के लिए व्यवहारिक क़दम उठाए। किंतु फरवरी सन 1997 में तुर्की की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने जिसमे सैनिकों का प्रभाव है प्रधान मंत्री के लिए कार्यसूची तैयार की जिसमें इस्लामी झुकाव रखने वालों का दमन भी शामिल था। इन परिस्थितियों को देखते हुए अर्बकान आज के दिन त्यागपत्र देने पर विवश हो गये। इसके कुछ समय बाद अर्बकान पर इस्लामी विचारधारा का स्वामी होने के नाते मुक़ददमा चलाकर 5 वर्ष तक राजनैतिक मंच से दूर रहने का दंड दिया गया। इसी प्रकार उनके रिफाह दल को भी भंग कर दिया गया।

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29 ख़ुर्दाद सन 1330 हिजरी शम्सी को ईरान में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के कानून के पास हो जाने के पश्चात ईरानी विशेषज्ञों की एक समिति ने ईरान के तेल उद्योग का प्रशासनिक कार्यभार संभाला। आयतुल्लाह काशानी और डॉक्टर मुसददिक़ के प्रस्ताव और संसद की सहमति के बाद इस समिति के गठन के साथ ही तेल उद्योग, ब्रिटेन की कम्पनी के हाथों से निकल गया और आज के दिन को ब्रिटिश तेल कम्पनी से मुक्ति का नाम दिया गया। आज ही के दिन ईरानी लम्बे संघर्ष और बड़े बलिदान के बाद एक बड़ी सफलता तक पहुंचे थे। इस सफलता के बाद ईरान के तेल उद्योग में कार्यरत 450 विदेशी कर्मचारियों और विशेषज्ञों की सेवाएं रोक दी गयीं और उन्हें स्वदेश भेज दिया गया। ईरान के इस क़दम से बौखलाए ब्रिटेन ने ईरान को सैनिक कार्रवाई की धमकी दी थी।
29 ख़ुर्दाद सन 1356 हिजरी शम्सी को ईरान के विख्यात बुद्धिजीवी विचारक व कुशल लेखक डॉक्टर अली शरीअती का लंदन में निधन हुआ। वे सन 1312 हिजरी शम्सी में पूर्वोत्तरी ईरान के सब्ज़वार नगर के निकट एक स्थान पर जन्में थे। उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में अपनी शिक्षा पूरी की और शिक्षा प्राप्ति के दौरान ही वे शाह के अत्याचारी शासन के विरूद्ध राजनैतिक संघर्ष में लग गये। कुछ दिनों बाद डॉक्टर अली शरीअती अपनी शिक्षा के क्रम को आगे बढ़ाने के लिए फ़्रांस चले गये।
उन्हें इमाम ख़ुमैनी से गहरा लगाव था। उन्होंने इस्लामी क्रान्ति की सराहनीय सेवा की है।
उनकी लगभग 200 पुस्तकें, लेख और भाषणों के संकलन मौजूद हैं।
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26 शैव्वाल वर्ष 1293 हिजरी क़मरी को ईरान के मुसलमान बुद्धिजिवी एवं धर्म शास्त्री सैयद अब्दुल मुहम्मद मूसवी का निधन हुआ। उन्होंने सात वर्ष की आयु में क़ुरआन का स्मरण करके अपनी धार्मिक शिक्षा आरम्भ की । वे 24 वर्ष की आयु में धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ बन गए और फिर अध्यापन का कार्य आरम्भ किया। वे बड़े धार्मिक शिक्षकों में गिने जाते थे और धार्मिक पाढशालओं की स्थापना फ़िक़्ह तथा उसूले फ़िक़्ह की शिक्षा देना और इसी प्रकार इसरी सामाजिक गतिविधियों के साथसाथ धार्मिक नियमों को लागू करना उन के बड़े कार्यों में गिने जाते हैं। सैयद अब्दुल मुहम्मद मूसवी की रचनाओं में शरहे इस्तेदलाली बर डरवतुल वुस्क़ा तथा रेसालए ज़ख़ीरतुल एबाद की ओर संकेत किया जा सकता है।