शनिवार- 20 जून
20 जून सन 1660 ईसवी को ब्रिटेन के लेखक, डैनियल डूफ़ो, का लंदन में जन्म हुआ।
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20 जून सन 1660 ईसवी को ब्रिटेन के लेखक, डैनियल डूफ़ो, का लंदन में जन्म हुआ।
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20 जून सन 1837 को विक्टोरिया 18 साल की आयु में ब्रिटेन की महारानी बनीं।
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20 जून सन 1863 को पश्चिमी वर्जिनिया अमेरिका का 35वां राज्य बना।
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20 जून सन 1877 को अलेक्ज़ेंडर ग्राहम बेल ने कनाडा के ओंटारियो में दुनिया की पहली वाणिज्यिक टेलीफ़ोन सेवा शुरू की।
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20 जून सन 1887 को भारत का सबसे व्यस्ततम रेलवे स्टेशन मुंबई स्थित विक्टोरिया टर्मिनस लोगों के लिए खुला।
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20 जून सन 1990 को ईरान में आए भूकंप से लगभग 40 हज़ार लोग मरे।
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20 जून सन 1991 को एकीकृत जर्मनी की राजधानी फिर से बर्लिन को बनाने के प्रस्ताव को संसद ने मंज़ूरी दी।
20 जून सन 1660 ईसवी को ब्रिटेन के लेखक, डैनियल डूफ़ो, का लंदन में जन्म हुआ। वे एक लेखक होने के साथ ही अपने समय के राजनैतिक टीकाकार भी थे। उन्होंने बड़े ही उतार चढ़ाव वाला रोमांचक जीवन बिताया। उन्होंने अपने जीवन की घटनाओं को इतनी सुंदरता से लिखा है कि पढ़ने वाले को वह अपने आस पास की बातें लगने लगती हैं। इस लेखक की पुस्तकों में रॉबिन्सन क्रुसो, चाल्ज़ सप्तम के युद्धों के इतिहास, एक सवार की कहानी आदि का नाम लिया जा सकता है। वे सन 1731 में इस संसार से चल बसे।
20 जून सन 1875 ईसवी को जापान के दक्षिण में प्रशांत महासागर में स्थित ओकीनावा द्वीप, इस देश के क़ब्ज़े में आ गया। किंतु द्वितीय विखयुद्ध के अंतिम वर्ष में अमरीका ने जापान की सेना को हराकर इस द्धीप पर अधिकार कर लिया। अमरीकी सेनाएं सन 1958 में जापान से निकल गयीं किंतु यह द्वीप अमरीकी सेना के ही क़ब्ज़े में रहा। अंतत: अमरीका और जापान के बीच लम्बी बात चीत के बाद सन 1972 में अमरीकी सैनिक ओकीनावा द्वीप से निकले। किंतु फिर भी इस द्वीप में अमरीका ने अपने महत्वपूर्ण सैनिक ठिकाने को ख़ाली नहीं किया। उस समय से अब तक जापान के लोग ओकीनावा द्वीप में अमरीकी सैनिकों की उपस्थिति पर आपत्ति जताते आ रहे हैं।

20 जून सन 1912 ईसवी को पोलैंड के वैज्ञानिक कैसिमर फ़ंक ने पहली बार विटामिन का पता लगाया। लम्बे अनुसंधान और वैज्ञानिक खोज के बाद कैसिमर को पता चला कि खाद्य पदार्थो में एक प्रकार के तत्व होते हैं जो जीवन के लिए आवश्यक होते हैं। उन्होंने इसे विटामिन का नाम दिया।

20 जून वर्ष 2002 ईसवी को भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध धर्मगुरू अल्लामा सैयद सईद अख़्तर रिज़वी का स्वर्गवास हो गया। वह 1966 ईसवी में भारत के बिहार प्रांत के गांव गोपालपुर में जन्मे थे। 35 वर्ष की आयु में धर्म के प्रचार के उद्देश्य से अफ़्रीक़ी देश तनज़ानिया चले गये जहां उन्होंने बेलाल मिशन की स्थापना की जिसके अफ़्रीक़ा में विभिन्न विभाग हैं जो धार्मिक ज्ञान के विकास में प्रयास कर रहे हैं। अंग्रेज़ी भाषा में एक पत्रिका लाईट विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अल्लामा सईद अख़्तर कई भाषाएं जानते थे। अल्लामा सईद अख़्तर रिज़वी ने अफ़्रीक़ा में इस्लाम धर्म के प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उनके प्रचार के ही कारण हज़ारों लोगों ने इस्लाम धर्म स्वीकार किया । उनका 76 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया और तनज़ानिया की राजधानी दारुल इस्लाम के शीया मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में उन्हें दफ़्न किया गया।
20 जून वर्ष 1837 ईसवी को उन्नीसवीं शताब्दी ईसवी के ब्रिटिश नरेश विलियम चतुर्थ के निधन के बाद महारानी विक्टोरिया सिंहासन पर बैठीं। उनकी गिनती ब्रिटेन के इतिहास में सबसे प्रभावी महारानियों में होता थी। उन्होंने 64 वर्ष तक ब्रिटेन पर राज किया।

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28 शव्वाल 467 हिजरी क़मरी को ईरान के प्रसिद्ध कवि और वरिष्ठ धर्मगुरू मजदूद बिन आदम का जन्म हुआ था। उनका जन्म ग़ज़नी में हुआ था जो प्राचीनकाल में ईरान के प्रमुख नगरों में से एक था किंतु वर्तमान समय में यह अफ़ग़ानिस्तान का एक मुख्य नगर है। अपनी युवा अवस्था में मजदूद बिन आदम, राजाओं और महाराजाओं की प्रशंसा में ही कविताएं कहा करते थे किंतु बाद में उन्होंने यह कार्य छोड़ दिया और ईश्वर की प्रशंसा में कविता कहने तथा जनसेवा में लग गए। अपनी कविताओं में वे अत्याचारी शासकों की निंदा किया करते थे। मजदूद बिन आदम उन कवियों में से थे जिन्होंने कविता की शैली को परिवर्तित करके उसे विविधतापूर्ण बनाने में प्रभावशाली भूमिका निभाई है। उनके काव्य संकलन का नाम “हक़ीक़तुल हक़ीक़ा” है।
28 शव्वाल सन 1358 हिजरी क़मरी को आयतुल्लाह सैयद हुसैन बादकूबई का निधन हुआ। वे इस्लामी जगत के प्रसिद्ध ज्ञानी, दार्शनिक और धर्मगुरु थे। वह सन 1293 हिजरी क़मरी में वर्तमान आज़रबाइजान की राजधानी बाकू के निकट जन्मे थे और आरंभिक शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की और पिता के देहान्त के बाद तेहरान आ गये जहां सात वर्ष तक शिक्षा प्राप्त की और फिर इराक़ के नजफ़ नगर चले गये। उन्होंने नजफ़ में लगभग चालीस वर्षों तक दर्शनशास्त्र तथा अन्य विषयों की शिक्षा दी।