बुधवार - 27जून
27जून सन 1880 ईसवी को अमरीका की नेत्रहीन, अध्ययनकर्ता हेलेन एडम्ज़ कलर का जन्म हुआ।
बचपन में एक बीमारी में उन्हें ऑख और कान से हाथ धोना पड़ा। उन्होंने सात वर्ष की आयु से शिक्षा प्राप्त करनी आरंभ की । उन्होंने नेत्रहीनों की शिक्षा के विशेष प्रंबंध के अंतर्गत शिक्षा प्राप्त की। धीरे धीरे उनकी श्रवण शक्ति दोबारा कार्यरत हो गयी और अपने शिक्षक की सहायता से उन्होंने बोलना आरंभ किया। हेलेन केलर ने बहुत सी पुस्तकें और लेख लिखे। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर महत्वपूर्ण भाषण भी दिए।
केलेर ने अपनी कमाई से अमरीका और दूसरे देशों में नेत्रहीनों की शिक्षा के लिए कई स्कूल खोले। मेरे जीवन की कहानी उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक के नाम का अनुवाद है।
- 27 जून सन् 1693 में महिलाओं की पहली पत्रिका “Ladies’ Mercury” लंदन में प्रकाशित हुई।
- 27 जून सन् 1950 में संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद् का प्रस्ताव अपनाया गया।
- 27 जून सन् 1957 में ब्रिटेन की मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें बताया गया कि धूम्रपान की वजह से फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। ये रिपोर्ट 25 साल के शोध पर आधारित थी।
- 27 जून सन् 2002 में जी-8 देश परमाणु हथियार नष्ट करने की रूसी योजना पर सहमत।
- 27 जून सन् 2003 में अमेरिका में समलैंगिकता पर प्रतिबंध रद्द।
- 27 जून सन् 2004 में अमेरिका और यूरोपीय संघ ने जी.पी.एस. गैलेलियो के विकास में सहयोग से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- 27 जून सन् 2005 में ब्रिटेन ने भारत की वीटो रहित स्थायी सदस्यता का समर्थन किया।
- 27 जून सन् 2008 में भारत व पाकिस्तान ने ईरान से आने वाली गैस पाइप लाइन परियोजना को चालू करने के लिए आ रही रुकावटों को हल किया।
27 जून सन 1977 ईसवी को जिबूती देश को फ़्रांस के अधिकार से स्वतंत्रता मिली। हर वर्ष आज के दिन इस देश में स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में उत्सव मनाया जाता है। यह क्षेत्र सन 1893 में फ़्रांस का उपनिवेश बना लिया गया। 8 दशकों तक स्थानीय जनता ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किए और अंतत: स्वतंत्रता प्राप्त की। अरब संघ से जुड़ने वाला यह अंतिम देश है। यह देश पूर्वी अफ़्रीका में लाल सागर और हिंद महासागर के संगम पर स्थित है। इस लिए स्ट्रेटेजिक दृष्टि से इसे विशेष महत्व प्राप्त है।

27 जून सन 1993 ईसवी को अमरीका ने 33 प्रक्षेपास्त्रों द्वारा इराक़ की राजधानी बग़दाद और उसके आस पास के क्षेत्रों को निशाना बनाया। अमरीका ने यह आक्रमण यह बहाना पेश करके किया कि इराक़ की सरकार तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की कुवैत यात्रा के दौरान उनकी हत्या की साज़िश में शामिल थी। बुश ने अपने राष्ट्रपति काल में इराक़ की सेना को कुवैत से बाहर निकालने के लिए इराक़ पर आक्रमण का आदेश दिया था। अमरीका के प्रक्षेतपास्त्रिक आक्रमण में 6 असैनिक मारे गये और इराक़ के एक सुरक्षा केंद्र को हानि पहुँची।
27 जून सन 1997 ईसवी को ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमाम अली रहमानोफ़ और इस देश के विद्रोही गुट के नेता सैयद अब्दुल्लाह नूरी ने मॉस्को में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर करके इस देश के पांच वर्षीय गृह को समाप्त किया। सन 1991 में ताजिकिस्तान की स्वतंत्रता के एक वर्ष बाद देश की प्रशासन शैली को लेकर रूस के समर्थक ताजिक अधिकारियों और इस्लामी गुटों के बीच मतभेद आरंभ हुआ। जिससे बहुत हानि हुई। क्षेत्रीय देशों और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने ताजिकिस्तान मे शांति स्थापना के लिए व्यापक प्रयास किए। जिसके परिणाम स्वरूप पहले रुस और ईरान के माध्यम से एक समझौता तेहरान में हुआ जिसे 1997 में मॉस्को में अंतिम रूप दे दिया गया।
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6 तीर सन 1360 हिजरी शम्सी को ईरान की इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह उज़मा सैयद अली ख़ामेनई पर आतंकवादी गुट एम के ओ के तत्वों ने आक्रमण किया। वे उस समय तेहरान के इमाम जुमा और उच्च सुरक्षा परिषद में इमाम ख़ुमैनी के प्रतिनिधि थे।
आतंकवादियों ने एक मस्जिद में जहॉं आयतुल्लाह उज़्मा ख़ामेनई भाषण दे रहे थे विस्फ़ोट करके उन्हें घायल कर दिया। इस दुर्घटना में वरिष्ठ नेता का दाहिना हाथ बुरी तरह धायन हुआ।
इमाम ख़ुमैनी ने इस संदर्भ में कहा था इस समय आप जो कि पैग़म्बरे इस्लाम के वंशज और इमाम हुसैन के परिवार से हैं और इस्लाम की सेवा के अतिरिक्त आपने कोई पाप नहीं किया है, युद्ध के मार्चों पर निडर होकर लड़े हैं, मेहराब के कुशल और रचनात्मक शिक्षक और मिंबर के सक्षम वक्ता और क्रान्ति के मंच पर सहानुभूति रखने वाले कार्यकर्ता हैं, आक्रमण का निशाना बने हैं, आक्रमणकारियों ने अपने इस काम से अपनी राजनैतिक सोंच और जनता के समर्थन तथा अत्याचारियों के विरोध के स्तर को स्पष्ट कर दिया है।

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13 शव्वाल सन 1323 हिजरी क़मरी को इस्लामी जगत के प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और धर्मगुरु शैख़ मोहम्मद ताहा का 83 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनका जन्म इराक़ के नजफ़ नगर में हुआ। उन्होंने तत्कालीन वरिष्ठ धर्मगुरुओं जैसे शैख़ मुर्तज़ा अन्सारी आदि से शिक्षा ली। उन्होंने इस्लामी विषयों में कई पुस्तकें भी लिखीं हैं।
