इस्लाम और मानवाधिकार-11
हमने यह साबित किया कि मानवाधिकार के नियम को तय करने का अधिकार ईश्वर है।
इसी प्रकार यह भी बताया कि विद्वानों और वे बुद्धिजीवियों के विचार और इंसान की बुद्धि पूरी दुनिया के इंसान के लिए मानवाधिकार के नियम नहीं तय कर सकती। चूंकि मानवाधिकार के नियम का विषय इंसान की ओर पलटता है।
मनुष्य को उसके स्वभाव के कारण पदार्थ की ज़रूरत है। इसी प्रकार उसमें ऐसी प्रवृत्ति पायी जाती है जिसका आधार ईश्वरीय आत्मा है। इंसान में सभी अच्छी चीज़ों का आधार उसकी प्रवृत्ति और सभी बुराइयों का आधार उसका स्वभाव है। इन दोनों के बीच हमेशा संघर्ष रहता है। जब प्रवृत्ति इच्छाओं पर क़ाबू पा लेती है कि उसे जेहादे अकबर अर्थात सबसे बड़ा संघर्ष कहा जाता है। जब इस संघर्ष में प्रवृत्ति तो जीत होती है तो सभी फ़रिश्ते इंसान के सामने नत्मस्तक हो जाते हैं और जब स्वभाव क़ाबू पा लेता है तो इंसान जानवर से भी ज़्यादा गिर जाता है।
ईरान में दर्शनशास्त्र के प्रसिद्ध उस्ताद व पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकर्ता अल्लामा तबातबाई का इंसान के जीवन के स्वाभाविक आयाम के संबंध में मानना है कि इंसान स्वाभाविक रूप से बर्बर है न कि सभ्य व क़ानून का पालन करने वाला। सभ्यता इंसान पर थोपी गयी चीज़ है वरना वह बर्बरता में रहना पसंद करता है। हर व्यक्ति किसी न किसी हद तक अतिक्रमणकारी है और जब देखता है कि दूसरे भी अतिक्रमण कर रहे हैं तो वह क़ानून बनाकर अतिक्रमण को सीमित करने की कोशिश करता है। अगर इंसान क़ानून पर आधारित व्यवस्था को स्वीकार करता है तो इसका कारण यह है कि वह इस सामूहिक अतिक्रमण को व्यवस्थित रूप देना चाहता है।
स्वभाव से हटकर अगर देखें तो इंसान की आत्मा परिपूर्णतः चाहती है। पवित्र क़ुरआन के इसरा नामक सूरे की 70वीं आयत में इसान को ऐसा प्राणी कहा गया है जिसे ईश्वर ने सम्मान दिया है। 70वीं आयत में ईश्वर कहता है, हमने आदम की संतान को सम्मानित किया। हमने उन्हें जल और थल में सवारियों पर सवार किया और हमने उन्हें पवित्र चीज़ों से आजिविका दी और उन्हें, बहुत से प्राणियों से जिन्हें हमने पैदा किया, श्रेष्ठ बनाया।
ईश्वर का इंसान को सम्मान देना यह दर्शता है कि उसके अस्तित्व में ऐसी चीज़ है जो उसे विशिष्टता के योग्य बनाती है। दूसरे शब्दों में इंसान को ईश्वर की ओर से सम्मान इस बात को दर्शाता है कि वह दुनिया के अन्य प्राणियों में सर्वोत्तम प्राणी है। यही कारण है कि ईश्वर ने इस उत्कृष्ट प्राणी को बनाने के बाद इब्लीस से कहा, “किस चीज़ ने तुझे उसके सामने नत्मस्तक होने से रोका जिसे मैने अपनी विशेष क़ुदरत से बनाया।”
यहां पर ईश्वर का यह कहना कि उसने इंसान को अपनी विशेष क़ुदरत से बनाया, इस बात को दर्शाता है कि इंसान एक मूल्यवान प्राणी है। इस सम्मान के मद्देनज़र, सभी नैतिक व क़ानूनी शिक्षाओं को इससे समन्वित होना चाहिए। अगर हम इस बात को मान ले कि इंसान एक मूल्यवान रत्न की तरह है तो इस बात को भी मान लेंगे कि न सिर्फ़ आज़ादी सुरक्षा इत्यादि उसका अधिकार हैं बल्कि इन चीज़ों को भी उसकी इस विशेषता से समन्वित होना चाहिए।
इंसान ऐसा प्राणी है जिसकी प्रवृत्ति में ईश्वर की खोज की इच्छा निहित है। उसे ईश्वर से संबंध की अपरिहार्य ज़रूरत है। ईश्वर पवित्र क़ुरआन के फ़ातिर नामक सूरे की 15वीं आयत में कह रहा है, “हे लोगो! तुम्हें ईश्वर की ज़रूरत है।”
इस आयत से दो तथ्य स्पष्ट होते हैं। एक यह कि इंसान पूरी तरह आज़ाद प्राणी नहीं है। दूसरे यह कि वह किसी दूसरे प्राणी पर निर्भर नहीं है और उसका संपर्क सिर्फ़ ईश्वर से है। इसलिए ज़रूरी है कि उसके लिए ऐसा क़ानून बनाया जाए जो उसकी आत्मा से मेल खाए क्योंकि ईश्वर की प्राप्ति की इच्छा उसकी आत्मा में रची बसी है। ऐसे विचार जिसमें इंसान को पूरी तरह आज़ाद प्राणी माना गया है या इंसान को ऐसा प्राणी माना गया है जो ईश्वर के अलावा किसी और पर निर्भर है, सच्चाई से बहुत दूर हैं।
पवित्र क़ुरआन में इंसान को अमर प्राणी कहा गया है। इन्शेक़ाक़ सूरे की आयत नंबर 6 में ईश्वर कह रहा है, “हे इंसान तू मशक़्क़त करता हुआ अपने पालनहार की ओर खिंचा चला जा रहा है और अंततः उससे मिलने वाला है।”
ईश्वर से मुलाक़ात का विषय सिर्फ़ मोमिन बंदों से विशेष नहीं बल्कि इसके दायरे में पूरी मानवता शामिल है। इस आयत के बाद वाली आयत में ईश्वर कह रहा है कि प्रलय के दिन एक गुट को उसका कर्मपत्र उसके दाहिने हाथ में मिलेगा। ऐसे लोग मोमिन होंगे और एक गुट वह होगा जिसका कर्मपत्र उसके बाएं हाथ में दिया जाएगा। ऐसे लोग नास्तिक होंगे।
पवित्र क़ुरआन की नज़र में इंसान अमर रहने वाला प्राणी है। मौत से जीवन का अंत नहीं होता बल्कि मौत इंसान की आत्मा को शरीर के बंधन से मुक्त करती है और उसका जीवन चलता रहता है यहां तक कि ईश्वर से मुलाक़ात हो। इसलिए इंसान को इस लंबे मार्ग पर चलने के लिए कुछ नियम व क़ानून की ज़रूरत है जिसे ईश्वर ने निर्धारित किए हैं।
जैसा कि क़ुरआन में इंसान को अमर प्राणी कहा गया है, यह इस बात की दलील है कि ईश्वर इस संसार का चलाने वाला है। उसने इंसान के अमर जीवन के सभी चरण के लिए कार्यक्रम बनाए हैं और उसके जीवन के सभी भाग के लिए कुछ संस्कार तय किए हैं। इंसान के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन का संबंध सिर्फ़ इस संसार से नहीं है। परलोक में भी व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन मौजूद है लेकिन लोक और परलोक की सामूहिक जीवन व्यवस्था में कुछ अंतर ज़रूर है। इन दोनों व्यवस्थाओं में मूल अंतर के कारण इस दुनिया में इंसान अकेले अपनी सभी ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकता जबकि इसके विपरीत जानवरों में ऐसा नहीं है। बल्कि जानवर की पैदाइश के वक़्त ही उसके शरीर पर खाल की शक्ल में कपड़ा और शिकार के लिए पंजा होता है। इसी प्रकार जानवर पैदा होते ही दौड़ने व कूदने की शक्ति से संपन्न होता है किन्तु इंसान के पास पैदाइश के वक़्त ये सभी चीज़ें नहीं होतीं। जैसा कि ईश्वर निसा नामक सूरे की आयत नंबर 28 में इंसान के पैदाइश के वक़्त कमज़ोर होने का यूं उल्लेख करता है, “इंसान को अक्षम पैदा किया गया है।”
यही कारण है इंसान दुनिया में अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दूसरों पर निर्भर होता है इसलिए वह सामूहिक जीवन में शामिल होता है जबकि परलोक में ऐसा नहीं है। परलोक में रोज़ी का अथाह दस्तरख़ान बिछा होगा। किसी व्यक्ति को काम करने की ज़रूरत नहीं होगी बल्कि परलोक में हर व्यक्ति का दस्तरख़ान उसके कर्म के अनुसार होगा जो उसने दुनिया में अंजाम देकर परलोक के लिए भेजा होगा।
स्वर्ग में किसी व्यक्ति को काम करने की ज़रूरत नहीं होगी। बल्कि हर व्यक्ति जो चाहेगा उसे उसी वक़्त मिल जाएगा। इसके साथ ही स्वर्ग में सामाजिक जीवन का भी आनंद होगा। वहां एक परिवार और संबंधियों के इकट्ठा होने पर आनंद का आभास होगा। यह सामूहिक रूप से इकट्ठा होना आनंद लेने के लिए होगा न यह कि एक दूसरे की ज़रूरत को पूरी करने के लिए।
यही व्यक्तिगत व सामूहिक स्वरूप नरक में भी होगा। प्रलय में जिस चीज़ की इंसान को ज़रूरत होगी वहां मौजूद होगी सिर्फ़ इस फ़र्क़ के साथ कि जो चीज़ उसे मिलेगी व बुराई के रूप में मिलेगी। जिस तरह स्वर्ग में सोतों का बहना, पेड़ों का उगना और अन्य नेमतों की मौजूदगी स्वर्गवासियों की इच्छा का नतीजा होगा। उसी तरह नरकवासियों के लिए वह सारी चीज़ें मौजूद होंगी जिससे उन्हें डर होगा। नरकवासियों का सामूहिक स्वरूप इस प्रकार होगा कि उन्हें उन लोगों के साथ रह कर प्रकोप झेलना होगा जिन लोगों से वे घृणा करते थे। जैसा कि ईश्वर मरयम नामक सूरे की आयत नंबर 68 में कह रहा है, “तुम्हारे पालनहार की क़सम उन्हें शैतानों के साथ इकट्ठा करेंगे। उसके बाद उन्हें घुटनों के बल नरक में डालेंगे।”
मानवाधिकार के संबंध में इस्लामी विचारधारा का एक महत्वपूर्ण बिन्दु, इस दुनिया से इंसान के विशेष संबंध और इस दुनिया में ईश्वर की अनुकंपाओं के संबंध में उसके कर्तव्य के बारे में है। इस विचार का आधार यह है कि इंसान के भले या बुरे कर्म के नतीजे में इस दुनिया में अनुकंपाएं बढ़ती या कम होती हैं। इंसान इस दुनिया में जहां कहीं भी हो अपने कर्म से सृष्टि की अनुकंपाओं को विस्तृत कर सकता है।
जैसा कि हेजाज़ के बारे में पवित्र क़ुरआन में आया है कि इस भूभाग की हालांकि उचित भौगोलिक स्थिति नहीं थी और सामाजिक जीवन की स्थिति भी अच्छी नहीं थी किन्तु वहां काबे के अस्तित्व ने इस क्षेत्र को स्वस्थ अर्थव्यवस्था और सुरक्षा जैसी अनुकंपाओं से नवाज़ा। इस बिन्दु के ज़रिए यह बात समझी जा सकती है कि इंसान की क़ानूनी ज़िम्मेदारियों को बयान करने के लिए दुनिया से उसके संबंध का स्वरूप क्या है और सृष्टि की अनुकंपाओं के संबंध में उसके दायित्व क्या हैं।
पवित्र क़ुरआन के अनुसार, इस संसार को इसलिए इंसान के नियंत्रण में दिया गया है ताकि वह इस संसार में रह कर मुक्ति हासिल करे और इस मुक्ति का अर्थ आत्मनिर्माण है। इसलिए इस दुनिया में रहते हुए उसी नेमतों को इस तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए कि वह शांति के प्रतिकूल हो। औद्योगिकीकरण की प्रकिया ऐसी न हो कि दुनिया तबाह हो जाए। पवित्र क़ुरआन में ऐसे भले लोगों का उल्लेख है जो भव्य अनुकंपाओं से समृद्ध थे किन्तु उन्होंने कभी भी अतिक्रमण व विध्वंस के बारे में नहीं सोचा। हज़रत सुलैमान, हज़रत दाऊद और हज़रत ज़ुलक़रनैन इसी प्रकार के भले लोग थे। जैसे हज़रत सुलैमान के पिता हज़रत दाऊद के हाथों में लोहा मोम की तरह नर्म हो जाता था और वे उससे कवच बनाते थे। साथ ही वह शक्तिशाली शासक भी थे किन्तु उन्होंने इस चमत्कारी शक्ति को आक्रमक हथियारों के निर्माण व विध्वंसकारी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं किया। इस प्रकार पवित्र क़ुरआन हमें यह बताना चाहता है कि ईश्वरीय अनुकंपाओं को सही दिशा में इस्तेमाल करें। इनके ज़रिए सुधार लाए।
पवित्र क़ुरआन की नज़र में इंसान ऐसा प्राणी है जिसे ईश्वर ने सम्मान दिया है। उसकी प्रवृत्ति में ईश्वर को पाने की इच्छा है। इसी प्रकार वह अमर प्राणी है। उसके जीवन के दो आयाम हैं एक व्यक्तिगत और दूसरा सामूहिक। सृष्टि के साथ इंसान का निकट संबंध है। इस दुनिया की अनुकंपाएं उसके नियंत्रण में हैं ताकि उसके ज़रिए मुक्ति हासिल करे। ईश्वर ने अपने दूतों व ग्रंथों के ज़रिए ये नियम इंसान के लिए निर्धारित किए हैं। इंसान ईश्वरीय आदेशों का पालन करके ऐसे उच्च स्थान तक पहुंच सकता है कि फ़रिश्ते उसके सामने नत्मस्तक हो जाएं और वह ईश्वर का उत्तराधिकारी कहलाने लगे या अपने बुरे कर्म के ज़रिए इतना गिर जाए कि जानवरों से भी बदतर हो जाए।