इस्लाम और मानवाधिकार-13
मानवाधिकारों के रूप में आज जो नियम मौजूद हैं, वह दूसरे विश्व युद्ध के बाद मानवाधिकारों के नियमों की ज़रूरत के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आए हैं।
मानवाधिकारों के लिए नियम बनाए जाने का बुनियादी कारण, उसकी ज़रूरत है। मानवाधिकारों के विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सर्वप्रथम ऐसे नियम बनाए जाने चाहिएं, जो समस्त देशों में लागू हो सकें। दूसरे इन नियमों में सभी समाजों के संयुक्त हितों को दृष्टि में रखा गया हो।
तीसरे मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इस बात को नज़र में रखा था कि इस प्रकार के नियमों का आधार जीवन की वास्तविकता होनी चाहिए, न कि अंधविश्वास और कल्पना। यह समस्त बिंदु सही और तार्किक हैं। मतभेद का मूल कारण, इस सवाल का जवाब है कि कल्पना और वास्तविकता के बीच क्या अंतर है और कौन इस अंतर को निर्धारित कर सकता है। भौतिक क़ानून बनाने वालों की दृष्टि में भौतिकता के अलावा कुछ भी वास्तविक नहीं है और जो महसूस नहीं किया जा सके वह मौजूद नहीं है। इस लिहाज़ से आत्मा और अध्यात्मविज्ञान कल्पना के अलावा कुछ नहीं है।
हालांकि ईश्वरीय क़ानूनों का आधार केवल भौतिकता पर निर्भर नहीं है। इसके अनुसार, संसार में भौतिकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मूल्य मौजूद हैं और वही वास्तविक हैं। अगर समस्त इंसानों का हित मद्देनज़र हो तो केवल यही शैली प्रासंगिक होगी। इसलिए कि भाषा और परम्परा जैसे भौतिक स्रोत पूरे विश्व में एकता उत्पन्न नहीं कर सकते। यही कारण है कि मानवाधिकारों के निर्धारण के लिए बेहतरीन स्रोत ईश्वर हो सकता है। ईश्वर ने अपने दूत और धर्म भेजकर अधिकारों और नियमों को मानवता के समक्ष पेश कर दिया है।
हमने कहा था कि इंसान ईश्वर की रचना है और बुद्धि के कारण अन्य जीव जन्तुओं से श्रेष्ठ है। इसी कारण ईश्वर ने भौतिक एवं आध्यात्मिक मामलों में बुद्धि के मार्गदर्शन के लिए अपने दूतों को भेजा। इसके अलावा ईश्वर ने इंसान के मार्गदर्शन के लिए किताब नाज़िल की। अंतिम ईश्वरीय दूत होने के कारण इस्लाम धर्म ने समस्त इंसानों को मानवता से प्रेम का संदेश दिया है। इस्लाम ने समस्त इंसानों को संबोधित किया है। इस्लाम की सबसे पवित्र किताब क़ुरान में भी समस्त इंसानों से प्रेम की सिफ़ारिश की गई है न कि केवल मुसलमानों से।
इस बीच कुछ लोगों की ओर से सवाल होता है कि इस्लामी नियम 1400 वर्ष पुराने हैं, इसलिए वर्तमान समय में अप्रासंगिक हैं। हो सकता है कि सबके मन में सवाल उठे कि अगर इस्लाम, क़ुरान और हदीस केवल मानवाधिकारों का स्रोत हों तो पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके उत्तराधिकारी इमामों के बाद घटने वाली अनगिनत घटनाओं के बारे में क्या किया जाएगा?
कुछ लोग इस सवाल का ग़लत जवाब देते हुए कहते हैं कि इस्लाम केवल मोटे तौर पर मूल्यों का उल्लेख करता है और शासन एवं जीवन की गुणवत्ता को निर्धारित नहीं करता। उदाहरण स्वरूप इस्लाम कहता है कि अपने जीवन को न्याय के आधार पर गुज़ारो, लेकिन इस उद्देश्य तक पहुंचने के लिए नियमों के निर्धारण को ख़ुद इंसान के ज़िम्मे छोड़ देता है।
यह जवाब ग़लत है। इसलिए कि इस्लाम ने न केवल मूल्यों को बल्कि प्रलय के दिन तक व्यक्तिगत एवं सामाजिक नियमों समेत इंसान की समस्त ज़रूरतों का उल्लेख कर दिया है।
कई मुस्लिम विद्वानों का मानना है कि इस्लाम ने न केवल मूल्यों और सिद्धांतों को बयान किय है, बल्कि प्रलय के दिन तक व्यक्तिगत एवं सामाजिक नियमों समेत इंसान की समस्त ज़रूरतों का उल्लेख कर दिया है।
इस्लामी किताबों में उल्लेख है कि इंसान की ज़रूरतों का हल क़ुरान और हदीसों में छुपा हुआ है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, वास्तव में महान ईश्वर ने हर चीज़ को क़ुरान में स्पष्ट रूप से बयान किया है, यहां तक कि ईश्वर की सौगंध, ईश्वर ने कोई भी ऐसी चीज़ को बयान करने से नहीं छोड़ा है, जिसकी बंदों को ज़रूरत होती है, ताकि कोई बंदा नहीं कह सके कि काश क़ुरान में इसका उल्लेख होता। लेकिन वास्तव में ईश्वर उसे क़ुरान में बयान कर चुका है।
इस मूल्यवान हदीस के मुताबिक़, जिस चीज़ की भी इंसान को ज़रूरत होती है, वह क़ुरान में मौजूद है, ताकि कोई यह नहीं कह सके कि काश क़ुरान ने इसका उल्लेख किया होता। इस प्रकार यह दावा नहीं किया जा सकता कि शासन या मानवाधिकार से संबंधित समस्याओं का समाधान क़ुरान और हदीस में नहीं है। यह कैसे संभव हो सकता है कि जो धर्म अर्थव्यवस्था और वर्यावरण से संबंधित छोटे से छोटे व्यक्तिगत एवं सामाजिक मामलों को महत्व देता है, इनसे संबंधित नियमों के निर्धारण को इंसान के सीमित विचारों पर छोड़ दे। इमाम बाक़िर (अ) फ़रमाते हैं, वास्तव में महान ईश्वर ने हर वह चीज़ जिसकी उम्मत को ज़रूरत है, क़ुरान और हदीस में बयान कर दिया है और उसे अपने पैग़म्बर के लिए स्पष्ट रूप में बयान कर दिया है और प्रत्येक वस्तु के लिए एक सीमा निर्धारित कर दी है और उसके लिए स्पष्ट तर्क रख दिया है, इस सीमा का उल्लंघन करने वालों के लिए सज़ा का प्रावधान है।
इस हदीस के मुतबिक़, उम्मत की समस्त ज़रूरतों का उल्लेख क़ुरान और हदीस में है, यह व्यक्तिगत ज़रूरत हो या सामाजिक ज़रूरत। इसका अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर ने ज़रूरतों का हल वर्तमान इमाम (अ) के हवाले कर दिया है और उनके प्रकट होने तक मानवीय समाज उनके मार्गदर्शन से वंचित रहेगा, बल्कि यह दिशानिर्देश बयान भी किए गए हैं और उन्हें प्राप्त भी किया जा सकता है।
हालांकि यह स्पष्ट है कि क़ुरान द्वारा बयान किए गए मूल सिद्धांतों का समझना हर किसी के बस की बात नहीं है, बल्कि क़ुरान के वास्तविक व्याख्याकार, अर्थात मासूम इमाम ही उन्हें समझ सकते हैं और दूसरों के लिए बयान कर सकते हैं। परिणाम स्वरूप कहा जा सकता है कि हर काल में इंसानों की समस्त ज़रूरतों का हल क़ुरान और हदीस में मौजूद है, लेकिन स्पष्ट रूप से उन्हें समझने के लिए इमामत और उच्च धार्मिक शिक्षा की ज़रूरत होती है।
यद्यपि क़ुरान के नाज़िल होने और पैग़म्बरे इस्लाम के ईश्वरीय दूत के रूप में नियुक्त होने को एक लम्बा समय बीत चुका है और इमामे ज़मान के नज़रों से ओझल होने के कारण लोगों के लिए सीधे रूप से उनसे संपर्क संभव नहीं है, इसके बावजूद इस्लाम का व्यापक एवं समृद्ध धर्मशास्त्र और इजतेहाद नए पेश आने वालों समस्याओं का हल पेश करने में समर्थ हैं। इजतेहाद के प्रावधान के कारण, इस्लाम के नियम एवं सिद्धांत कभी पुराने नहीं होते और जीवन से क़दम से क़दम मिलाकर आगे बढ़ते हैं।
इस वास्तविकता को समझने के लिए जानना ज़रूरी होगा कि इस्लाम की आरम्भिक शताब्दियों में धर्मशास्त्र एवं मानवाधिकार नियमों का इतना अधिक विस्तार नहीं हुआ था, लेकिन जैसे जैसे इन नियमों की ज़रूरत पड़ती गई, इजतेहाद ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई और इन ज़रूरतों को पूरा किया। हालांकि कुछ समय पहले तक यह ज़रूरतें नागरिक अधिकारों और इबादत के विषय से संबंधि थीं, इसीलिए उनका हल भी इन्हीं विषयों से संबंधित था।
वरिष्ठ धर्मगुरू या फ़क़ीह को ईश्वरीय आदेश की प्राप्ति या उसका ज्ञान हासिल करने के लिए तीन चरणों से गुज़रना होता है। पहले चरण में इस्लामी दृष्टिकोण के आधार पर धार्मिक स्रोतों का निर्धारण करना होता है। यह स्रोत हैं, क़ुरान, हदीस, बुद्ध और किसी विषय पर मुस्लिम विद्वानों की समग्र सहमति। दूसरे चरण में इन स्रोतों से धार्मिक दिशा निर्देशों को प्राप्त किया जाता है। तीसरे चरण में प्राप्त होने वाले दिशा निर्देशों से फ़तवा हासिल किया जाता है।
जब क़ानून का कोई विशेषज्ञ अधिकारों का निर्धारण करता है तो वह उन्हीं चरणों को तय करना है, जिनसे एक वरिष्ठ धर्मगुरू को गुज़रना पड़ता है। पहले अधिकारों के स्रोतों का अच्छी तरह ज्ञान प्राप्त करे। उसके बाद उन स्रोतों से अधिकारों के दिशा निर्देश प्राप्त करे औऱ उसके बाद अधिकारों के लिए नियम बनाए।
मासूम इमामों के अलावा, इस्लामी नियमों के निर्धारण में संभवतः इंसान भूल चूक कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मासूम इमामों के अलावा कोई दूसरा वास्तविकता तक नहीं पहुंच सकता। इसके लिए इतना ही काफ़ी है कि ईश्वरीय दूतों ने लोगों को वास्तविकता की प्राप्ति का आहवान किया है।
अतः वह व्यक्ति अधिकारों के स्रोतों तक पहुंच बना सकता है, जो दृढ़ संकल्पित हो और अपने उद्देश्य की प्राप्ति के प्रति गंभीर हो। इस प्रकार का व्यक्ति कभी भी ज्ञान के मामलों में विश्वास और संदेह को मिश्रित नहीं करता है और इन दोनों की सीमाओं को भलीभांति जानता है।