यूरोप में पनाह लेने वाले पलायनकर्तांओं की दयनीय स्थिति-4
इससे पहले हमने आपको बताया कि शरणार्थी बच्चों विशेषकर एसे बच्चों की बहुत प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना है जिनके अभिभावक साथ नहीं हैं।
यूरोपीय संघ के आंकड़ों के अनुसार इन बच्चों में आधे गुम हो जाते हैं। इन बच्चों के गुमशुदा एलान कर दिए जाने का मतलब यह है कि अब इन बच्चों का कहीं कोई नामो निशान नहीं है।
चूंकि अभिभावकों के बग़ैर बच्चे यूरोप में ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रवेश करते हैं अतः वह अपराधी संगठनों के लिए बहुत आसान चारा साबित होते हैं। यह गुट उनका यौन शोषण करते हैं। इस लिए कि उनका कोई पूछने वाला नहीं है और यूरोपीय पुलिस भी इन बच्चों की मदद में कोई रूचि नहीं रखती। जब शरणार्थियों की पहली खेप यूरोप पहुंची तो यूरोपीय सरकारों ने अपने चेहरों पर मानवता प्रेम का मुखौटा चढ़ा लिया और शरणार्थियों का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया लेकिन जब शरणार्थियों की लहर जारी रही तो फिर यूरोपीय सरकारों का असली चेहरा सामने आने लगा और शरणार्थियों की दुशमनी उन्होंने खुलकर शुरू कर दी। हंग्री जैसी दक्षिणपंथी यूरोपीय सरकारों ने अंतर्राष्ट्रीय कन्वेन्शनों को नज़रअंदाज़ करते हुए शरणार्थियों के साथ कठोर बर्ताव शुरू कर दिया और उन्हें अपनी सीमाओं मे प्रवेश करने से रोकने के लिए कठोर क़दम उठाए। जब सरकारों ने यह क़दम उठाए तो दक्षिणपंथी धड़ों का मनोबल और बढ़ा तथा उनकी स्थिति मज़बूत हुई। वामपंथी तथा मध्यमार्गी दक्षिणपंथी धड़ों ने भी अपनी सामाजिक लोकप्रियता बचाने के लिए शरणार्थियों के विरुद्ध की जाने वाली सुरक्षा कार्यवाहियों का समर्थन किया। आंकड़े बताते हैं कि शरणार्थियों और उनके अस्थायी ठिकानों पर हमलों में दुगना की वृद्धि हुई है। यूरोपीय सरकारें भी शरणार्थी विरोधी और नस्लवादी गुटों के विरुद्ध कोई क़दम उठाने में गंभीर नहीं हैं। बल्कि यहां तक कहा जाता है कि यह सरकारें इन संगठनों की नस्लभेदी गतिविधियों से असहमत नहीं हैं बल्कि उन्हें एसा लगता है कि शरणार्थियों को देश से बाहर निकलने पर मजबूर करने के लिए यह एक अच्छा रास्ता है और इस तरह शरणार्थियों को यूरोप का रुख़ करने से रोका जा सकता है।
यूरोपीय सरकारो का यह रवैया सभी अंतर्राष्ट्रीय नियमों और समझौतो का खुला उल्लंघन है जो शरणार्थियों के संबंध में पाए जाते हैं। यूरोपीय सरकारों का यह रवैया उनकी आपसी एकता के लिए भी गंभीर समस्या का कारण बना है और यूरोप की एकजुटता ख़तरे में पड़ने लगी है। यूरोपीय देश ने सांस्कृतिक, धार्मिक और नस्ली सीमाओं का अंत करके ख़ुद को एक दूसरे के क़रीब किया था। जबकि शरणार्थियों को अपनी सीमा में प्रवेश से रोकना वास्तव में नस्लभेद और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाला क़दम है। इस समय यूरोपीय संघ के प्रभावशाली सदस्य देशों के चरमपंथी दक्षिणवादी संगठन धीरे धीरे सत्ता की ओर बढ़ रहे हैं। आस्ट्रिया में शरणार्थियों के विरोधी दक्षिण पंथी नेता आगामी जनवरी महीने में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनावों में जीत से एक क़दम पीछे हैं।
डेनमार्क, हालैंड, स्वेडन, जर्मनी और फ़्रांस में स्थानीय, संसदीय तथा प्रांतीय चुनावों में शरणार्थी विरोधी दक्षिण पंथी धड़ों को सफलता मिली है और उन्होंने अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है। वर्ष 2017 को यूरोप के लिए बहुत निर्णायक साल माना जाता है। जर्मनी, फ़्रांस, हालैंड और आस्ट्रिया में संसदीय और राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। इन सभी देशों में शरणार्थी विरोधी दक्षिण पंथी संगठनों की जीत का अनुमान लगाया जा रहा है। इन दलों को संसदों में अधिक सीटें मिल रही हैं। आस्ट्रिया में ग्रीन पार्टी के उम्मीदवार और दक्षिणपंथी पार्टी के उम्मीदवार के बीच सीधा मुक़ाबला है। फ़्रांस में मारियन लूपेन जो नेशनल फ़्रंट पार्टी के नेता हैं सर्वे रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण तक पहुंच सकते हैं। वह भी शरणार्थी विरोधी नज़रिया रखते हैं। फ्रांस के दूसरे दलों ने भी अपने मत बचाने के लिए चुनावी प्रचारों में शरणार्थियों के विरुद्ध क़ानूनी और सुरक्षा कार्यवाहियों का समर्थन करना शुरू कर दिया है।
जर्मनी की अलटर्नेटिव फ़ार जर्मनी पार्टी 16 में से 10 प्रांतों में स्थानीय एसेंबलियों में जगह बनाने में सफल रही है। जर्मनी में अगस्त 2017 में संसदीय चुनाव होने वाले हैं। अल्टरनेटिव फ़ार जर्मनी पार्टी के बारे में कहा जा रहा है कि वह जर्मनी की तीसरे बल्कि दूसरे नंबर की पार्टी बनने में सक्षम हो गई है। हालैंड में चरमपंथी दक्षिणवादी फ़्रीडम पार्टी जिसके अध्यक्ष ग्रेट वेल्डर्ज़ हैं इस्लाम विरोधी पार्टी मानी जाती है और उसे देश की चार प्रमुख राजनैतिक पार्टियों में गिना जाता है। ग्रेट वेल्डर्ज़ आगामी संसदीय चुनाव में सरकार बनाने में सफल हो जाएंगे इस संभावना को सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता। आस्ट्रिया में दूसरे चरण के राष्ट्रपति चुनाव रद्द कर दिए गए और अब आगामी जनवरी महीने में एक बार फिर मतदान होने वाला है। रद्द घोषित कर दिए जाने वाले राष्ट्रपति चुनाव में चरमपंथी दक्षिणवादी उम्मीदवार बहुत कम अंतर से हारे थे और इस बात की संभावना अधिक है कि जनवरी महीने में होने वाले चुनावों में दक्षिणपंथी उम्मीदवार को जीत मिल जाए।
यूरोप में राजनैतिक और सामाजिक स्तर पर होने वाले परिवर्तनों को देखकर लगता है कि यह क्षेत्र शरणार्थियों के लिए कोई अच्छा स्थान नहीं रह जाएगा। यूरोप में यदि दक्षिणपंथी संगठन सत्ता में पहुंचते हैं तो राष्ट्रवादी विचारधारा और सुरक्षा कार्यवाहियों में तीव्रता आएगी। यदि यह विचारधारा और सुरक्षा कार्यवाहियां तेज़ होंगी तो मानवाधिकारों जैसे मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे और शरणार्थियों के मामले में ह्यूमन राइट्स के मापदंडों को भुला दिया जाएगा। जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने पिछले दो साल के दौरान यूरोपीय देशों की संयुक्त शरणार्थीय नीति बनाने के लिए बड़ी कोशिशें कीं। उनका एक सुझाव यह था कि यूरोपीय संघ के सदस्य देश अपनी अपनी आबादी के अनुपात में शारणार्थियों को आपस में बांट लें। लेकिन अधिकतर यूरोपीय देशों ने शरणार्थियों को स्थान देने से इंकार कर दिया। यूरोपीय संघ की ही तरह ख़ुद जर्मनी के भीतर भी शरणार्थियों से पेश आने के तरीक़े के बारे में गहरा मतभेद उत्पन्न हो गया। यह मतभेद इतना बढ़ गया कि एंगेला मर्केल को भी शरणाथियों के बारे में अपनी नीति पर पुनरविचार के लिए मजबूर होना पड़ा।
यह सब एसी स्थिति में हो रहा है कि अफ़्रीक़ा तथा पश्चिमी एशिया के देशों में हिंसा और अशांति का संकट ख़त्म नहीं हुआ है जिसके नतीजे में इन क्षेत्रों के देशों के निवासी अपना घर बार छोड़कर और अपनी जानें ख़तरे में डालकर यूरोपीय देशों की ओर जाने पर मजबूर हैं इस लिए उन्हें बेहतर जीवन के लिए यही एक विकल्प नज़र आ रहा है। यूरोपीय देश शरणार्थियों का प्रवेश रोकने के लिए कठोर नीतियां अपना रहा हैं जबकि शरणार्थियों की लहर यूरोपीय देशों की ओर लगातार जारी है। एसे में शरणार्थियों के लिए यूरोप में मानवीय त्रासदी उत्पन्न होने की आशंका है।