ईश्वरीय वाणी-७७
‘मुजादेला’ पवित्र क़ुरआन का 58वां सूरा है।
‘मुजादेला’ पवित्र क़ुरआन का 58वां सूरा है। यह सूरा मदीना में नाज़िल हुआ और इसमें 22 आयते हैं।
इस सूरे के विषय इस प्रकार हैं, ज़ेहार नामी अज्ञानता के काल की तलाक़ की रस्म, लोगों के बीच बैठने का शिष्टाचार, काना-फूंसी पर रोक, सभा में ताज़ा पहुंचने वाले को स्थान देना, मिथ्याचारियों के बारे में चर्चा, ईश्वर का गुट और शैतान का गुट।
‘मुजादेला’ सूरे की पहली आयत में ईश्वर कह ता रहा है, “ईश्वर ने उस महिला की बात सुनी जिसने अपने पति के बारे में आपसे बहस की और ईश्वर से शिकायत की। और ईश्वर ने आप दोनों लोगों की बात सुनी। ईश्वर सब कुछ सुनने वाला व देखने वाला है।”
अंसार क़बीले की ख़ौला नामक महिला का पति किसी बात पर उससे नाराज़ हो गया। चूंकि उसका शौहर बहुत क्रुद्ध स्वभाव का था उसने अपनी बीवी से अलग होने का फ़ैसला किया और कहा, “तुम मेरी निगाह में मेरी मां की तरह हो।”
दरअस्ल यह अज्ञानता के काल में एक प्रकार का प्रचलित तलाक़ था जिसके तहत शौहर अपनी बीवी से फिर से संबंध नहीं स्थापित कर सकता था और इसके आधार पर बीवी भी अपने लिए किसी नए शौहर का चयन नहीं कर सकती थी। यह किसी किसी पति वाली औरत के लिए सबसे बुरी हालत थी। कुछ समय बाद शौहर शर्मिन्दा हुआ लेकिन अज्ञानता की रस्म के मुताबिक़ अब कुछ नहीं कर सकता था। इस कारण उसकी बीवी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सलल्म के पास पहुंची ताकि इस बारे में हुक्म पता करे। ख़ौला ने पैग़म्बरे इस्लाम से कहा, “हे ईश्वरीय दूत! जिस वक़्त मेरे शौहर ने मेरे साथ शादी की मैं जवान, ख़ूबसूरत और पैसे वाली थी। शौहर ने मेरे पैसे ख़र्च कर दिये। अब जबकि मेरी उम्र ज़्यादा हो गयी तो उसने ज़ेहार किया और अब शर्मिन्दा है। क्या फिर से पिछली ज़िन्दगी की ओर लौटने का कोई रास्ता है?” पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, तुम उस पर वर्जित हो गयी हो लेकिन ख़ौला अपने पास छोटे बच्चे होने के कारण अपनी बात पर बल देती रही। आख़िरकार उसने ईश्वर की ओर प्रार्थना करते हुए कहा, “हे ईश्वर! तुझसे अपनी बेबसी व कठिनाइयों की शिकायत करती हूं। हे ईश्वर! अपने पैग़म्बरे पर आदेश नाज़िल कर और इस मुश्किल को हल कर।”
थोड़ी ही देर गुज़री थी कि ‘मुजादेला’ सूरे की आरंभिक आयतें नाज़िल हुयीं और यह आदेश आया कि जो कोई ज़ेहार करे उसे कफ़्फ़ारा अर्थात एक प्रकार का विशेष जुर्माना देना चाहिए और किसी प्रकार का तलाक़ नहीं माना जाएगा। इस प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम की मदद से उस महिला के शौहर ने जुर्माना अदा किया और अपनी सामान्य ज़िन्दगी की ओर लौट गया। इस प्रकार इस्लाम ने ज़ेहार नामी ग़लत परंपरा को अमान्य घोषित किया। शौहर का अपनी पत्नी की पीठ को अपनी मां की पीठ जैसा कहना ज़ेहार कहलाता है।
‘मुजादेला’ सूरे की आयत नंबर 7 में ईश्वर कह रहा है, “क्या तुम नहीं जानते कि जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है उसका ज्ञान ईश्वर को है? तीन लोगों के बीच कोई राज़ की बात नहीं होती मगर यह कि वह उनका चौथा होता है और पांच के बीच राज़ की बात नहीं होती है तो वह उनका छठा होता है। और इससे कम या ज़्यादा में राज़ की बात नहीं होती मगर यह कि वह उनके साथ ज़रूर रहता है।”
किसी के कान में धीरे से कुछ कहने से आम तौर पर पास मौजूद लोगों के मन में संदेह पैदा होता है। जो व्यक्ति दो लोगों की कानाफूंसी को देखता है तो ख़ुद उस व्यक्ति में आत्मिक व मानसिक दृष्टि से बदलाव पैदा होता है। वह ख़ुद को वहां अजनबी महसूस करता है और कानाफूंसी से उसके मन में भ्रान्ति मज़बूत होती है।
सबको इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि ईश्वर उनकी कानाफूंसी को सुन रहा है और उनकी बातों से अवगत है। क्योंकि आसमान और ज़मीन, ज़ाहिर और निहित सब ईश्वर के अथाह ज्ञान के सामने समान है।
‘मुजादेला’ सूरे की आयत नंबर 8 में ईश्वर कह रहा है, “क्या तुमने उस व्यक्ति को नहीं देखा जिसे कानाफूंसी से मना किया लेकिन फिर भी वह ऐसी बातें करते हैं। पाप, अत्याचार और पैग़म्बर की अवज्ञा में एक दूसरे से कानाफूंसी करते हैं। जिस वक़्त आपके पास आते हैं तो इस तरह से आपको संबोधित करते हैं जिस तरह से ईश्वर ने उन्हें नहीं सिखाया है। और आपस में कहते हैं, क्यों ईश्वर हम पर उस बात के लिए प्रकोप नहीं भेजता जो हम कहते हैं? उनके लिए नरक की आग ही काफ़ी है जिसमें वह दाख़िल होंगे तो वह कितना बुरा ठिकाना व अंजाम है।”
कुछ यहूदी और इस्लाम का पाखंड करने वाले आपस में कानाफूंसी करते थे और कभी कभी अपनी आंखों से मोमिनों की ओर दुखी करने वाला इशारा करते थे। उनके इस व्यवहार से मोमिनों को दुख होता था।
आयत से यह अर्थ निकलता है कि पहले उन्हें सचेत किया गया था कि उनके इस काम से दूसरों में भ्रान्ति पैदा होगी। हालांकि पैग़म्बरे इस्लाम ने उनसे कहा था कि मुसमलानों के पास एक दूसरे से कानाफूंसी न करें किन्तु उन्होंने इस आदेश को नहीं माना और कानाफूंसी की। उनकी इस कानाफूंसी का लक्ष्य मोमिनों को दुखी करना था।
‘मुजादेला’ सूरे की आयत नंबर 9 में ईश्वर मोमिनों से कहता है कि जब वह कानाफूंसी करें तो यह भले कर्म के लिए होनी चाहिए न कि पाप या पैग़म्बरे इस्लाम की अवज्ञा के लिए और उस ईश्वर का विरोध करने से बचें जिसकी ओर पलट कर जाना है।
इस सूरे की आयत नंबर 10 में ईश्वर ने पाखंडियों की कानाफूंसी का आधार उनके मन में उठने वाले शैतानी विचार को बताया है। शैतान पाखंडियों को कानाफूंसी के लिए उकसाता है ताकि वह मोमिनों को सताएं। मोमिनों को यह बात जाननी चाहिए कि सृष्टि में सबसे प्रभावशाली हस्ती ईश्वर की है। तो मोमिनों को सिर्फ़ ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए और ईश्वर के सिवा किसी चीज़ से न घबराएं। वे ईश्वर पर भरोसा करके समस्याओं से निपट और शैतान के चेलों के षड्यंत्रों को नाकाम बना सकते हैं।
इस्लामी इतिहास में है कि एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम मस्जिदुन्नबी के पास सुफ़्फ़ा नामक चबूतरे पर बैठे थे और उनके आस-पास अनुयाइयों का एक गुट मौजूद था। लोग इस तरह से बैठे थे कि किसी और को बिठाने के लिए जगह बहुत तंग थी। पैग़म्बरे इस्लाम बद्र नामक जंग के जियालों का बहुत सम्मान करते थे।
इसी बीच बद्र लड़ाई के जियालों का समूह ऐसी हालत में आ पहुंचा कि पैग़म्बरे इस्लाम के आस-पास जगह नहीं थी। वे सबको सलाम करके वहीं खड़े रहे ताकि दूसरे उन्हें जगह दें किन्तु कोई भी अपनी जगह से नहीं हटा। पैग़म्बरे इस्लाम को यह बात पसंद नहीं आयी। पैग़म्बरे इस्लाम अपने पास मौजूद लोगों में से कुछ लोगों से कहा कि वे अपनी जगह से उठें ताकि नए आने वाले वहां बैठें। वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम ईमान और ईश्वर के मार्ग में जेहाद करने वालों में अग्रणी रहने वालों का सम्मान करना सिखा रहे थे। किन्तु जिन लोगों को सुफ़्फ़ा नामक चबूतरे से उठना पड़ा वे ख़ुश नहीं थे। उस वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम पर मुजादेला सूरे की आयत नंबर 11 उतरी जिसमें सभाओं में उठने-बैठने के शिष्टाचार का उल्लेख है। इस आयत में ईश्वर कह रहा है, हे ईमान लाने वालो! जब तुमसे सभा में जगह देने के लिए कहा जाए तो जगह दो ताकि ईश्वर तुम्हारे काम को आसान कर दे और जब तुमसे उठने के लिए कहा जाए तो उठ जाओ! ईश्वर तुमसे से ईमान रखने वालों और ज्ञान रखने वालों का स्थान ऊंचा करेगा और जो कुछ तुम करते हो ईश्वर सब जानता है। यह आयत सामाजिक संबंध के एक अहम सिद्धांत अर्थात सभाओं में उठने-बैठने के शिष्टाचार और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने पर बल देती है। आम सभाओं में ताज़ा पहुंचने वालों को जगह देना, इस्लामी शिष्टाचार का हिस्सा है। जब कुछ लोग किसी सभा में पहुंचे तो पहले से मौजूद लोगों को चाहिए कि वे और सिमट कर बैठें ताकि बाद में आने वालों के लिए जगह हो ऐसा न हो कि वे थक जाएं। इसलिए पवित्र क़ुरआन ने अनुशंसा की है कि जब किसी सभा में हो और तुमसे कहा जाए कि दूसरों को जगह दो, तो जगह दे दो ताकि ईश्वर तुम्हारे काम को आसान कर दे। कभी कभी सभा में इतनी भीड़ होती है कि पहले से बैठे लोगों के लिए उठना ज़रूरी पड़ जाता है ताकि ताज़ा पहुंचने वालों के लिए जगह बने। यही कारण है कि इस आयत के अगले भाग में ईश्वर कह रहा है, जब तुमसे उठने के लिए कहा जाए तो उठ जाओ! क्योंकि नए पहुंचने वाले थके होने, अधिक उम्र के होने या उन्हें हासिल विशेष सम्मान के मद्देनज़र, तुमसे ज़्यादा बैठने का अधिकार रखते हैं। उसके बाद ईश्वर इस आदेश पर अमल करने के बदले के बारे में कहता है, अगर ऐसा किया तो ईश्वर तुममे से ईमान लाने वालों और ज्ञानी लोगों को उच्च स्थान देगा। मुजादेला सूरे की आख़िरी आयत में ईश्वर मोमिन बंदों को सचेत करता है कि एक मन में ईश्वर पर आस्था और ईश्वर के दुश्मनों से दोस्ती इकट्ठा नहीं हो सकते। इनमें से किसी एक का चयन करना होगा। अगर सच्चे मोमिन हैं तो ईश्वर के दुश्मनों से दोस्ती न करें। जैसा कि ईश्वर कह रहा है, ऐसा गुट नहीं पाओगे कि जिसके मन में ईश्वर और प्रलय के दिन पर आस्था हो और वह ईश्वर और उसके पैग़म्बर के दुश्मनों से दोस्ती करे चाहे वे उसके मां-बाप, बेटे भाई या संबंधी क्यों न हों। सीधी सी बात है कि मां-बाप, भाई बहनों और बिरादरी से मोहब्बत बहुत अच्छी व ज़रूरी चीज़ है और यह इंसान में भावनाओं के जागृत होने का चिन्ह है लेकिन जब यह मोहब्बत ईश्वर से आस्था से टकराव की हालत में आ जाए तो फिर इस मोहब्बत का मूल्य ख़त्म हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस गुट को महा प्रतिफल मिलता है जिसके मन में पूरी तरह ईश्वर पर आस्था हो। इस आयत के अगले भाग में ईश्वर ऐसे लोगों के बारे में कह रहा है, वे ऐसे लोग हैं कि ईश्वर ने उनके मन में अपनी आस्था को मज़बूत व स्थिर कर दिया है। उन्हें ऐसे बाग़ में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी होंगी। जिसमें वे सदैव रहेंगे। ईश्वर उनसे प्रसन्न और वे ईश्वर से प्रसन्न होंगे। जब मोमिन बंदा इस अवस्था में पहुंच जाए कि ईश्वर उससे प्रसन्न हो तो ऐसी हालत में वह ऐसे आनंद का आभास करता है जिसकी तुलना किसी आनंद से नहीं की जा सकती।
इस आयत के अंतिम भाग में ईश्वर एक आम घोषणा करता है, वे ईश्वर के गुट हैं और जान लो कि ईश्वर का गुट ही सफलता व मुक्ति पाने वाला है। वे न सिर्फ़ परलोक बल्कि इस दुनिया में भी ईश्वर की कृपा से अपने दुश्मन पर विजयी होते हैं।