ईरान के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंध- 4
हमने बताया था कि ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से ही विभिन्न बहानों से उसपर प्रतिबंध लगाए गए जो अब भी जारी हैं।
ईरान के विरुद्ध प्रतिबंध लगाने के लिए जो बहाने पेश किये गए थे वे थे आतंकवाद का समर्थन और मानवाधिकारों का हनन। इन बहानों को पेश करके अमरीकी नागरिकों और कंपनियों को आदेश दिया गया था कि वे ईरान के साथ किसी भी प्रकार का व्यापार न करें। कुछ वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा और बाद में सन 1990 में ईरान के विरुद्ध प्रतिबंधों का दूसरा चरण आरंभ हुआ। अब अमरीकियों ने अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हुए अन्य देशों और ग़ैर अमरीकी कंपनियों से कहा कि अगर वे ईरान के साथ व्यापार करती हैं और तेल उद्योग के क्षेत्र में वहां पूंजी निवेश करेंगी तो उनपर जुर्माना लगाया जाएगा।
सन 2003 में सद्दाम का तख़्ता पलटने के बाद इराक़ पर नियंत्रण के साथ ही ईरान के विरुद्ध एक नया षडयंत्र आरंभ हुआ। अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह दुष्प्रचार किया जाने लगा कि ईरान परमाणु शस्त्र बनाने के प्रयास कर रहा है जिसके कारण विश्व शांति ख़तरे में पड़ गई है। ईरान पर यह आरोप लगाने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में ईरान के विरुद्ध कई प्रस्ताव पारित किये गए। प्रतिबंधों के इन प्रस्तावों के कारण ईरान का तेल निर्यात प्रभावित हुआ और तेल से होने वाली आय के ईरान तक पहुंचने में बाधाएं आने लगीं। इसी के साथ ईरान के साथ बैंकिंग बहुत कम कर दी गई जिसके कारण दैनिक आवश्यकता की बहुत सी मूलभूत चीज़ों के ईरान पहुंचने में कठिनाइयां आने लगीं। इतना सब होते हुए इस्लामी गणतंत्र ईरान ने अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के अन्तर्गत, अपनी शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियां जारी रखीं। ईरान के इस काम को पश्चिम ने असैनिक क्षेत्र में किये जाने वाले काम की संज्ञा देते हुए इसका ख़ूब दुष्प्रचार किया।
यह बात हम पहले वाले कार्यक्रम में बता ही चुके हैं कि काफ़ी समय के बाद दोनों पक्ष इस परिणाम पर पहुंचे कि इस संकट से बाहर निकलने के लिए जनेवा में इस बारे में सार्थक एवं समग्र वार्ता की जाए। इसी विषय के अन्तर्गत ईरान और गुट पांच धन एक के बीच वार्ता प्रक्रिया आरंभ हुई। हालांकि ईरान और गुट पांच धन एक के बीच वार्ता का क्रम तो सन 2003 से ही आरंभ हो गया था किंतु सन 2013 से यह वार्ता नए चरण में पहुंची। बराक ओबामा के शासन काल में अमरीकी राष्ट्रपति की ओर से ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पत्र व्यव्हार करने के निर्णय, ईरान के परमाणु अधिकार को स्वीकार करने पर तत्परता तथा ईरान में नई सरकार के गठन जैसे फ़ैसलों के कारण परमाणु सहमति की भूमिका प्रशस्त हुई। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत यूरोपीय संघ की विदेश नीति आयुक्त कत्रीन एश्टन के नेतृत्व में ईरान और गुट पांच धन एक के बीच 20 नवंबर 2013 को वार्ता आरंभ हुई। यह वार्ता जनेवा के इंटरकान्टीनेंटल होटल में 4 दिनों तक जारी रही। इस बैठक के अंत में अंततः समग्र परमाणु समझौते या जेसीपीओए पर सहमति बनी थी।
समग्र परमाणु समझौते के अन्तर्गत ईरान की ओर से दिये गए वचन इस प्रकार थेः वह पांच प्रतिशत से अधिक का यूरेनियम संवर्धन छह महीनों के लिए रोक देगा, वह अराक रिएक्टर को नतंज़ और फ़ोर्दो के साथ विस्तार नहीं देगा। साथ में यह भी तय पाया था कि अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण सिद्ध करने के उद्देश्य से ईरान, अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी आईएईए के साथ सहकारिता को बढ़ाएगा।
इसी के साथ ही गुट पांच धन एक ने भी वचन दिया था कि वह नए प्रतिबंध लगाने से बचेगा, ईरान पर लगे प्रतिबंधों को ढीला करेगा और सुरक्षा परिषद एवं यूरोपीय संघ की ओर से नए प्रतिबंधों को भी रोकेगा और साथ ही अमरीका की ओर से किसी प्रकार के नए प्रतिबंध का वह विरोध करेगा। इसी के साथ यह भी तै पाया था कि अमरीका और यूरोपीय संघ की ओर से ईरान पर लगे मंहगी धातू के प्रतिबंधों के साथ ही पैट्रोकैमिकल के निर्यात पर लगे प्रतिबंध को भी हटाया जाएगा। इन प्रतिबंधों के अतिरिक्त ईरान के वाहन निर्माण उद्योग पर लगे अमरीकी प्रतिबंध को भी हटाया जाएगा। ईरान की ओर से कच्चा तेल बेचने पर लगी रोक भी हटेगी।
इन वचनों को पूरा करने के लिए अमरीका और यूरोपीय संघ ने एलान किया था कि सहमति बनने तक वे ईरान के विरुद्ध लगे प्रतिबंध हटाएंगे। इन बातों से पहले, अमरीकी कांग्रेस ने प्रतिबंध लगाए जाने वाले प्रस्ताव के पारित किये जाने से पूर्व इस देश के राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया था कि अमरीकी राष्ट्र के हितों के दृष्टिगत निर्धारित समय के लिए ईरान के विरुद्ध प्रतिबंधों को विलंबित भी किया जा सकता है जिसके बाद इसकी सूचना कांग्रेस को दी जाए। अमरीकी कांग्रेस के इसी सुझाव के दृष्टिगत बराक ओबामा, परमाणु समझौता होने तक सन 2015 तक अमरीकी सरकार या कांग्रेस की ओर से लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को हर छह महीने पर विलंबित करते रहे।
ईरान तथा गुट पांच धन एक के बीच होने वाली वार्ता में लगभग डेढ वर्षों तक पश्चिमी देशों की ओर से प्रतिबंधों को हटाने के बारे में वार्ता चलती रही। ईरानी पक्ष का कहना था कि ईरान पर परमाणु मामले में लगे प्रतिबंधों को हटाए बिना किसी भी प्रकार का कोई समझौता नहीं हो सकता और एसी स्थिति में ईरान किसी भी वचन को पूरा नहीं करेगा। इसके बावजूद अमरीका और पश्चिम, ईरान से पूरी तरह से प्रतिबंधों को हटाने में लगातार आनाकानी करते रहे। इसके लिए वे आए दिन कोई न कोई बहाना पेश करते थे। उदाहरण स्वरूप उन्होंने यह कहना आरंभ किया कि सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों का हटाया जाना, इस परिषद से संबन्धित है गुट पांच धन एक से इसका कोई लेनादेना नहीं है। कभी यह कहते थे कि अमरीकी कांग्रेस की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को हटाना उनके बस में नहीं है। बाद में कहने लगे कि ईरान से अधिक से अधिक विशिष्टनाएं लिए बिना वे प्रतिबंधों को नहीं हटा सकते। बाद में ईरानी शिष्टमण्डल के लगातार दबाव के बाद वे प्रतिबंध हटाने के बारे में सहमत हुए।
पश्चिम ने यह बात स्वीकार कर ली कि सुरक्षा परिषद की ओर से एक नया प्रस्ताव पारित करवा कर, ईरान के विरुद्ध सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों को हटाया जाए। अंततः संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव क्रमांक 2231 पारित होने के बाद इसके पहले के छह प्रस्ताव निरस्त हो गए।
उधर यूरोपीय संघ की ओर से पारित किये गए प्रस्ताव के आधार पर वार्ता करने वाले यूरोपीय देशों में से ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी ने वचन दिया कि वे यूरोपीय संघ से अनुरोध करेंगे कि वह यूरोपीय संघ की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को हटाए। बाद में 2015 में यह बात व्यवहारिक हो सकी।
समग्र वार्ता के दौरान अमरीका की ओर से ईरान के विरूद्ध लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की समस्याएं अलग प्रकार की थीं। पिछले 40 वर्षों के भीतर अमरीका की ओर से ईरान के विरुद्ध कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए। आरंभ में तो यह प्रयास किया गया कि परमाणु प्रतिबंधों और ग़ैर परमाणु प्रतिबंधों को एक-दूसरे से अलग किया जाए। पहले तो इस बारे में बात हुई कि ईरान की ओर से परमाणु समझौते की प्रतिबद्धता की पुष्टि की घोषणा के साथ ही अमरीकी राष्ट्रपति, वहां के विदेशमंत्रालय या अन्य मंत्रालयों की ओर से लगाए जाने वाले परमाणु प्रतिबंधों को हमेशा के लिए समाप्त करने की घोषणा की जाए। बाद में इस बात पर चर्चा हुई कि वे प्रतिबंध जो अमरीकी कांग्रेस ने लगाए हैं उनको विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति एक निश्चित समय में हटाएंगे।
हालांकि जेसीपीओए या संयुक्त समग्र कार्य योजना में अमरीकी कांग्रेस की ओर से लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का समाधान बताया गया है। बताए गए इस समाधान के अनुसार इस्लामी गणतंत्र ईरान ने वचन दिया है कि जेसीपीओए के लागू हो जाने के 8 वर्षों के बाद वह पूरक प्रोटोकोल को संसद में पेश करेगी जिसके साथ ही अमरीकी सरकार, कांग्रेस में प्रस्ताव पेश करके ईरान के विरुद्ध लगे सारे प्रतिबंधों को हटाने की मांग करेगी। हालांकि ईरान और अमरीका में से किसी ने भी यह वचन तो नहीं दिया है कि उनकी संसद, पेश किये गए प्रस्ताव को अवश्य पारित करेगी किंतु अगर दोनों देशों की कार्यपालिकाओं की कार्यवाहियां, इन प्रतिबंधों को सदा के लिए समाप्त कर सकती हैं।
बहरहाल वर्षों तक चलने वाली काफ़ी लंबी वार्ता के बाद जेसीपीओए अस्तित्व में आया। ईरान ने यह बात स्वीकार की है कि उसके परमाणु अधिकार को मान्यता देने और समस्त प्रतिबंधों के समाप्त किये जाने की स्थिति में वह अपनी शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियों के लिए कुछ सीमितताओं को स्वीकार कर सकता है।