हालीवूड में भेदभाव- 2
इससे पहले हम आपको यह बता चुके हैं कि हॉलीवुड के भीतर अश्वेत लोगों के ख़िलाफ़ नस्लभंद की जड़ें कितनी गहरी हैं।
यह बात तो जगज़ाहिर है कि वहां पर नस्लवाद और जातिवाद जैसी बुराई आम सी बात है।
“द बर्थ आफ अ नेशन” हालीवुड में बनने वाली एक मूक फिल्म है। यह फ़िल्म 8 फरवरी 1915 को रिलीज़ हुई थी। द बर्थ आफ अ नेशन, मूल रूप से एक नाविल पर आधारित फ़िल्म है जिसका निर्देशन डी.डब्लू ग्रिफिथ ने किया है। यह तीन घण्टे लंबी फिल्म है। इस फ़िल्म में अमरीका में गृहयुद्ध आरंभ होने वाले काल का उल्लेख किया गया है।

द बर्थ आफ अ नेशन के आंरभिक सीन में दिखाया गया है कि उत्तरी अमरीका के दो युवा, फ़िल और टेड स्टोनमेन, दक्षिणी कैरोलीना में अपने एक दोस्त बेन केमरन से मिलने जाते हैं। दोनो युवाओं में से एक फ़िल, बेन कैमरन की बहन मार्गरेट को देखते ही उसका आशिक़ हो जाता है। उधर बेन कैमरून भी फ़िल की बहन की फोटो देखकर उसका दीवाना हो जाता है। वक़्त गुज़रने के साथ ही साथ दोनों परिवारों के बीच दोस्ती बढ़ने लगती है। इसी बीच उत्तरी और दक्षिणी अमरीका के बीच गृह युद्ध आरंभ हो जाता है। युद्ध में टेड स्टोनमेन और उसके दो छोटे बेटे मारे जाते हैं। बेन कैमरून घायल हो जाता है। अस्पताल में वह एलिज़ स्टोनमेन नामक नर्स से परिचित होता है। दोनो ही आपस में शादी करना चाहते हैं। अपने पिता की सहायता करने के लिए एलिज़, बेन को छोड़ देती है। 1865 में अमरीका के गृहयुद्ध की समाप्ति पर काले या अश्वेत, आज़ाद हो जाते हैं।
द बर्थ आफ़ अ नेशन में आगे दिखाया जाता है कि युद्धग्रस्त क्षेत्रों का पुनरनिर्माण किया जा रहा है। यह भी दिखाया जाता है कि दक्षिणी कैरोलीना में क़ानून लागू करने की ज़िम्मेदारी अश्वत वर्ग के लोगों और राजनैतिक अवसरवादियों को मिल जाती है। वे परिस्थितियों का दुरूपयोग करते हुए लूटपाट करते हैं जिससे आम लोगों का जीवन जीना दूभर हो जाता है। द बर्थ आफ अ नेशन में यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि अश्वेत लोग मानो जानवरों की तरह व्यवहार कर रहे हैं जिसके कारण स्थानीय अश्वेत लोग परेशान हैं। इस फ़िल्म के अंत में दिखाया जाता है कि समाजिक असमानता को समाप्त करने के लिए दक्षिण के श्वेत लोग, बेन कैमरून के नेतृत्व में एक दल का गठन करते हैं जिसका उद्देश्य अश्वेतों से बदला लेना है। इस दल का नाम है कू-क्लक्स-क्लान। इसे संक्षेप में “केकेके” भी कहा जाता है। यह संगठन अमरीका में कालों पर गोरों को वरीयता देता है और नस्लवाद का प्रबल समर्थक है। कू-क्लक्स-क्लैन या “केकेके” नामक अतिवादी एवं क्रूर संगठन, अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसा के प्रयोग को वैध समझता है। काले लोगों की हत्या करना इनके निकट कोई बुरी बात नहीं है। फ़िल्म के अंत में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि कू-क्लक्स-क्लैन या “केकेके” नामक अतिवादी संगठन ने कालों की हत्या करके दक्षिणी अमरीका में शांति स्थापित कर दी और इस प्रकार से वहां के श्वेत या गोरी चमड़ी वाले शांतिपूर्ण ढंग से जीवन गुज़ारने लगे।

“द बर्थ आफ अ नेशन” ने व्यवसायिक रूप से तो बहुत सफलता प्राप्त की किंतु नस्लभेदी विचारधारा के कारण इसकी व्यापक स्तर पर आलोचना भी होती रही। सामान्यतः अश्वेत इसके आलोचक रहे जबकि श्वेत वर्ग, इसका समर्थन करता था। सिनेमा इतिहास के जानेमाने लेखक डेविड कूक लिखते हैं कि “द बर्थ आफ अ नेशन” एसी पहली फ़िल्म है जिसे वाइट हाउस में दिखाया गया। अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने स्वयं इसे देखा और इसकी सराहना की। फिल्म में यह भी बताने की कोशिश की गई कि अब्राहम लिंकन की हत्या के बाद दक्षिणी अमरीका के कालों ने वहां के गोरे लोगों को मारने और उनकी संस्कृति को नष्ट करने के प्रयास किये। कहा जाता है कि “द बर्थ आफ अ नेशन” के रिलीज़ होने के बाद कुख्यात अतिवादी गुट कू-क्लक्स-क्लान या “केकेके” की सदस्यता ग्रहण करने वालों की संख्या में नाटकीय ढंग से वृद्धि हो गई जिससे इस संगठन का प्रभाव भी काफ़ी बढ़ गया। विल्सन ने स्वयं कू-क्लक्स-क्लान या “केकेके” का समर्थन किया और उसके गठन को ज़रूरी बताया था।
वास्तव में हालिवुड ने कू-क्लक्स-क्लान या “केकेके” जैसे अतिवादी गुट की सकारात्मक छवि पेश करते हुए एक प्रकार से इसका मौन समर्थन किया। यह ऐसा संगठन है जिसकी करतूतों को संयुक्त राज्य अमरीका में हर ओर स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। अमरीका के ही कई जानेमाने लेखकों, इतिहासकारों और आलोचकों ने “द बर्थ आफ अ नेशन” की कड़े शब्दों में निंदा की है। इनका कहना है कि इस फ़िल्म ने अमरीका में नस्लवाद को फैलाने में मदद की है। फ़िल्म के माध्यम से अश्वेत लोगों को असभ्य और रूढ़ीवादी बताने की लगातार कोशिश कोशिश की गई।
यहां पर हम यह बताने का प्रयास करेंगे कि “द बर्थ आफ़ अ नेशन” में किस प्रकार के अफ्रीकी मूल के लोगों का अपमान किया गया है। फ़िल्म के एक सीन में दिखाया जाता है कि अमरीका में गृहयुद्ध समाप्त हो चुका है। दक्षिणी केरोलीना का नियंत्रण अश्वेत वर्ग के लोगों के हाथों में आ चुका है। अब दिखाया जा रहा है कि दक्षिणी केरोलीना की संसद या विधानसभा में अश्वेत और श्वेत लोगों के बीच विवाह के लिए क़ानून बनाया जा रहा है। पूरा सदन अश्वेत प्रतिनिधियों से भरा हुआ है। सदन में बहुत शोरग़ुल हो रहा है। सदन के पटल से सभापति एक बयान पढ़ रहे हैं। सीन में दिखाया जा रहा है कि सभापति अश्वेत प्रतिनिधियों को चुप कराने और अपनी बात उनतक पहुंचाने के लिए बहुत कोशिश कर रहे हैं किंतु प्रतिनिधि उनकी ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। वे लोग आपसी बातचीत में लगे हुए हैं। फिल्म में अश्वेत लोगों को असभ्य व मूर्ख दर्शाने के प्रयास के अन्तर्गत दिखाया जा रहा है कि अफ़्रीकी मूल का एक प्रतिनिधि सदन में बैठा हुआ कुछ खा रहा है। एक अन्य सीन में दिखाया जा रहा है कि एक अश्वेत प्रतिनिधि अपना जूता सदन में उतार रहा है और वहीं पर खड़ा एक अन्य काला प्रतिनिधि, चाकलेट खाते हुए उसे घूर रहा है। उसी के निकट एक अन्य प्रतिनिधि को सिगरेट पीते हुए दिखाया गया है। इन सब बातों से यह बताने का भरसक प्रयास किया गया है कि सदन के अश्वेत प्रतिनिधि, न तो सभापति की बात ही सुन रहे हैं और न ही उनकी ओर कोई ध्यान दे रहे हैं बल्कि वे एसे अशिष्ट काम कर रहे हैं जो सदन में शोभा नहीं देते।
इसी फ़िल्म का अगला सीन यह है कि सदन की दूसरी मंज़िल पर श्वेत वर्ग के कुछ प्रतिनिधि नीचे की ओर देख रहे और अश्वेत प्रतिनिधियों का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं। वे इनके व्यवहार पर खेद जताते हुए दिखाई दे रहे हैं। इन दृष्यों के माध्यम से यह निष्कर्श निकालने का प्रयास किया गया है कि अफ़्रीकी मूल के अश्वेत प्रतिनिधि असभ्य और मूर्ख हैं। उनके भीतर क़ानून बनाने या संसद में जाने की योग्यता ही नहीं है अतः उनको समाज के संचालन का कोई अधिकार नहीं है इसलिए उन्हें यह सबकुछ छोड़कर अमरीका में रहने वाले श्वेत वर्ण का केवल अनुसरण करना चाहिए। गोरे लोग जो भी कहें अश्वेतों को वही करना चाहिए।