Feb १३, २०१८ १६:५२ Asia/Kolkata

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ जारी हिंसा और उनके बांग्लादेश भागने के परिणामों के बारे में इस देश के विदेशमंत्री अब्दुल हसन महमूद अली ने म्यांमार की अपनी समकक्ष आंग सान सूची के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था।

इस समझौते पर हस्ताक्षर म्यांमार की राजधानी नैप्पीडा में हुआ था। इस समझौते के अनुसार अगले दो वर्षों में रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार लौट जायेंगे। बांग्लादेश की सरकार ने राजधानी ढ़ाका में जो विज्ञप्ति जारी की उसके अनुसार इस देश की सरकार रोहिंग्या मुसलमानों की म्यांमार वापसी के लिए अपनी सीमा पर पांच शिविरों की स्थापना करेगी और हर हफ्ते इन शिविरों से डेढ़ हज़ार शरणार्थियों को म्यांमार की सीमा में स्थित शिविरों में भेजा जायेगा। यद्यपि रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार कब भेज जायेगा इस संबंध में अभी सही समय की ओर संकेत नहीं किया गया है पंरतु बांग्लादेश के विदेशमंत्रालय की ओर से जारी विज्ञप्ति में बल दिया गया है कि जब रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार वापस भेजा जायेगा तो पारिवारिक मामलों पर ध्यान दिया जायेगा। म्यांमार की सरकार भी इस बात पर वचनबद्ध हुई है कि इस देश के सैनिकों और अतिवादी बौद्धों की ओर से रोहिंग्या मुसलमानों को दी जाने वाली यातनाओं के समाप्त हो जाने के बाद वह रोहिंग्या मुसलमानों को भागने से रोकेगी। जो आंकड़े प्रकाशित हुए हैं उनके अनुसार लगभग सात लाख म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में शरण लिये हुए हैं। ये मुसलमान म्यांमार में इस देश के सैनिकों और अतिवादी बौद्धों के आतंकवादी गुटों के हमलों के भय से अपना घर बार छोड़कर बांग्लादेश भाग गये और वहां पर वे बहुत ही विषम व दयनीय स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

शरणार्थी मामलों में संयुक्त राष्ट्र संघ के उच्चायुक्त प्रवक्ता मार्क पिर्यस ने कहा है कि बहुत से रोहिंग्या शरणार्थी भूखे- प्यासे और थके हैं और उनके पास खाना- पानी नहीं है। उनकी संख्या बहुत अधिक है अगर उनकी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया गया तो उनकी जान गम्भीर ख़तरे में पड़ जायेगी।"

 इस आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों की वापसी के बारे में बांग्लादेश और म्यांमार की सरकार के बीच सहमति हो जाने के बावजूद बांग्लादेश और दूसरे पड़ोसी देशों में रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति के बारे में चिंता समाप्त नहीं हुई है विशेषकर इसलिए कि इस समझौते के बारे में म्यांमार की सरकार ने भी अभी कुछ नहीं कहा है। इस संबंध में कुछ बिन्दु ध्यान योग्य हैं। पहला बिन्दु यह है कि बांग्लादेश के विदेशमंत्री ने कहा है कि रोहिंग्या मुसलमानों के म्यांमार वापस जाने के बाद उन्होंने अपना जो घर बार छोड़ा है उसके निकट शिविर में उन्हें रखा जायेगा परंतु अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि जब वे म्यांमार वापस जायेंगे तो उन्हें म्यांमार के किस क्षेत्र में रखा जायेगा। इसी तरह अभी यह भी ज्ञात नहीं है कि उन्हें म्यांमार के राखीन प्रांत में उनके पैतृक गांव में बसाया जायेगा या म्यांमार की सरकार इस देश के विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें बसायेगी क्योंकि राख़ीन प्रांत और वहां के गांवों में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के घरों के निर्माण के संबंध में अभी कोई व्यवहारिक क़दम नहीं उठाया गया है और अपेक्षा है कि इस संबंध में भारत और चीन से सहायता का आह्वान किया जायेगा।

                       

इसके अलावा यह कहा जा रहा है कि उन्हीं रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश से म्यांमार वापस जाने की अनुमति दी जायेगी जो म्यांमार में रहने का प्रमाण पत्र दिखायेंगे। यह एसी स्थिति में है कि जब रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार से भाग रहे थे तो उनमें से बहुत कम म्यांमार में अपने दस्तावेज़ों व प्रमाणों को लेकर भाग सके और यह वह चीज़ है जो शरणार्थी रोहिंग्या मुसलमानों की म्यांमार वापसी की दिशा में महत्वपूर्ण रुकावट है। इसी कारण बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शैख़ हसीना वाजिद ने घोषणा की है कि इस संबंध में वह म्यांमार की सरकार से अपनी वार्ता जारी रखेंगी ताकि इस संबंध में समाधान का कोई मार्ग ढूंढ सकें।

यूनिसेफ़ के एक वरिष्ठ अधिकारी साइमन इन्ग्रेम कहते हैं" रोहिंग्या मुसलमानों के संकट का समाधान इतनी जल्दी नहीं होगा। मामला यह है कि सीमाओं को खोल दिया जाये। क्योंकि बहुत से रोहिंग्या मुसलमान किसी दस्तावेज़ या पहचान पत्र के बिना बांग्लादेश भाग गये हैं और उनके बच्चों को कुपोषण का सामना है।"

 

बांग्लादेश से म्यांमार वापस जाने वाले शरणार्थियों के संबंध में दूसरी समस्या यह है कि बांग्लादेश और म्यांमार की सरकारों के मध्य रोहिंग्या मुसलमानों की वापसी के बारे में जो सहमति बनी है क्या उसका मतलब म्यांमार की सरकार की ओर से रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान और उनके अधिकारों को मान्यता देने के अर्थ में है? क्योंकि रोहिंग्या मुसलमानों की एक महत्वपूर्ण समस्या यह है कि वर्ष 1982 में होने वाली जनगणना के अनुसार म्यांमार की सैनिक सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को बंगाली शरणार्थी बताया था और उन सबको समस्त अधिकारों से वंचित कर दिया था। म्यांमार की सरकार की ओर से यह सोचा समझा फैसला था और यह इस बात का कारण बना कि म्यांमार के सैनिकों और अतिवादी बौद्धों ने अधिक दुस्साहस के साथ रोहिंग्या मुसलमानों को उनकी मातृभूमि से निकालने के लिए अपने हमलों में गति प्रदान कर दी।

रोहिंग्या मुसलमानों की बांग्लादेश से म्यांमार वापसी के संबंध में राष्ट्रसंघ की शरणार्थी एजेन्सी की चिंता उनकी स्थिति के संबंध में एक प्रकार की चेतावनी है और यह इस बात का सूचक है कि म्यांमार की सरकार ने केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करने के लिए रोहिंग्या मुसलमानों की वापसी को स्वीकार किया है और म्यांमार वापसी के बाद रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति क्या होगी यह स्पष्ट नहीं है। बांग्लादेश की सरकार को वित्तीय कठिनाइयों का सामना है और वह यथासंभव स्थिति में रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश से निकालना चाहती है। क्योंकि बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमान बहुत ही दयनीय स्थिति में हैं और यह स्थिति बांग्लादेश को पसंद नहीं है।

                          

संयुक्त राष्ट्रसंघ में बांग्लादेश के प्रतिनिधि शमीम एहसान कहते हैं” वर्ष 1994 में रोवांडा में होने वाले नरसंहार के बाद किसी देश में सामूहिक रूप से होने वाला सबसे बड़ा नरसंहार और पलायन रोहिंग्या मुसलमानों का है। म्यांमार सरकार के दावे के बावजूद अभी भी इस देश में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा न केवल रुकी नहीं है बल्कि अपनी जान के भय से रोहिंग्या मुसलमानों का भागना अब भी जारी है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की बालकोष संस्था यूनिसेफ ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बांग्लादेश में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के शरणार्थी शिविरों की स्थिति के बारे में चेतावनी दी है और घोषणा की है कि इन शिविरों में पांच लाख 20 हज़ार रोहिंग्या मुसलमान बहुत ही दयनीय स्थिति में रह रहे हैं और उनकी जान एवं स्वास्थ्य को भारी ख़तरा है। बांग्लादेश की सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार भेजने के लिए जो प्रयास कर रही है वह इस बात का सूचक है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों के जीवन की आवश्यकताओं की आपूर्ति की क्षमता नहीं रखती है और विश्व समुदाय भी इस संबंध में ढ़ाका सरकार की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर रहा है।

एक जर्मन पत्रकार व विशेषज्ञ यर्गन टीजेन हफर कहते हैं” मैंने निकट से शरणार्थी शिविरों में रोहिंग्या मुसलमानों की दयनीय दशा को देखा है। उन्हें खाने- पीने की वस्तुओं, दवाओं और गर्म करने वाले संसाधनों की भारी कमी का सामना है। हम विश्व समुदाय का आह्वान करते हैं कि वह म्यांमार की सरकार पर दबाव में वृद्धि करे ताकि वह रोहिंग्या मुसलमानों की समस्याओं के समाधान के लिए बाध्य हो जाये।

बांग्लादेश की सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने के लिए जो प्रयास कर रही है वह इस बात का भी सूचक है कि ढ़ाका सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को बंग्लादेश के नागरिक के रूप में स्वीकार नहीं करती है बल्कि वह रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार का नागरिक समझती है और उसका मानना है कि इन मुसलमानों को विश्व समुदाय और म्यांमार सरकार की सहायता से अपनी मातृभूमि में लौटाया जाना चाहिये।

राजनीतिक हल्कों का मानना है कि जब तक रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता के मामले का समाधान म्यांमार की सरकार की ओर से नहीं हो जाता तब तक बांग्लादेश से उन्हें म्यांमार वापस भेजने से न केवल उनकी कठिनाइयों में वृद्धि हो जायेगी बल्कि इस बात की भी संभावना है कि म्यांमार के सैनिक और अतिवादी बौद्ध दोबारा उन पर हमला करें। इस आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या के बुनियादी समाधान के लिए ज़रूरी है कि उनके नागरिक अधिकार और राष्ट्रीय पहचान के लिए राष्ट्र संघ को चाहिए कि वह म्यांमार की सरकार पर अधिक दबाव डाले।