Apr ०६, २०१६ ०७:२७ Asia/Kolkata

ईरानी साहित्य विशेषकर परिज्ञान में निर्धनता और समृद्धि का इतिहास बहुत पुराना है और सर्वोच्च स्थान से संपन्न है।

शब्दावली में निर्धनता का अर्थ होता है दरवेशी, फ़क़ीरी और कुछ न होना। इसके मुक़ाबले में समृद्धि है जिसका अर्थ है सक्षमता, आवश्यकतामुक्त और धन दौलत से संपन्न होना। परिज्ञानियों की दृष्टि में समृद्धि का अर्थ, वास्तविक सक्षमता और धन दौलत से संपन्न होना जो केवल ईश्वर से ही विशेष है और रचना की विशेष समृद्धि और दिल की समृद्धि, दिल की मज़बूती और सक्षमता के अर्थ में है। दिल की मज़बूती और सक्षमता वह स्थान है जिसमें मनुष्य, स्वयं को पूरी दुनिया से आवश्यकतामुक्त समझता है क्योंकि उसे सत्य मिल चुका होता है और उसका ध्यान ईश्वर के अतिरिक्त किसी और पर नहीं होता। 

ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी ने सद मैदान नामक पुस्तक में पवित्र क़ुरआन की आयत का हवाला देते हुए समृद्धि को सक्षमता बताया है और बंदों की सक्षमता को तीन भागों में विभाजित किया है। माल की समृद्धि, आत्मा की समृद्धि और दिल की समृद्धि। लोगों की नज़र में माल की समृद्धि का अर्थ होता है बहुत अधिक धन दौलत से संपन्न होना किन्तु परिज्ञान के निकट माल की समृद्धि का दूसरा ही अर्थ है। उनका मानना है कि बहुत अधिक धन दौलत और पैसा, मनुष्य की अवज्ञा और पकभ्रढटता की भूमि प्रशस्त करता है और यही कारण है कि वे धन दौलत और स्थान की चाह सहित सांसारिक मोहमाया से आंखें बंद रखते हैं। ख़्वाजा अब्दुल्लाह का मानना है कि यदि धन दौलत, वैध मार्ग से क्यों न प्राप्त हो, आपदा व मुसीबत है। वे आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलने वालों को सलाह देते हैं कि धन दौलत एकत्रित करने से बचें और स्वयं को इस मार्ग में किसी मुसीबत में ग्रस्त न करें।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह की दृष्टि में आ की समृद्धि वह दूसरी समृद्धि है जिसे लोगों को प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। अध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों के लिए सबसे बड़ी रुकावट, आत्मा पर ध्यान देना और उसका अनुसरण करना है। आत्मा की विशेषता, उसकसाना और बहकाना है और जो भी अपनी आत्मा का अनुसरण करता है वह निश्चित रूप से ईश्वरीय प्रसन्नता के मार्ग में क़दम नहीं बढ़ा सकता। ख़्वाजा अब्दुल्लाह के अनुसार, आत्मा की समृद्धि, स्वयं से आवश्यकतामुक्त और ईश्वर से दिल लगाये रहना है। सत्य के मार्ग पर चलने वाले जब आत्मा की समृद्धि तक पहुंचते हैं जब वह सांसारिक लाभों की ओर से आवश्यकता मुक्त हो और केवल ईश्वर से मुलाक़ात पर भी दिल लगाये हो।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह की दृष्टि में दिल की समृद्धि, आंतरिक इच्छा और माल की समृद्धि से ही प्राप्त होती है। अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाला जब माल और आंतरिक इच्छा से आवश्यकता मुक्त और समृद्ध हो जाता है तो वास्तव में उसका दिल सक्षम हो जाता है और फिर उसके दिल में ईश्वर विराजमान हो जाता है। अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले का दिल दुनिया और दुनियावालों से आवश्यकता मुक्त होता है क्योंकि उसने ईश्वर को पा लिया होता है। ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी के अनुसार, बंदा इस सक्षमता की शरण में शांति प्राप्त करता है, ऐसी शांति जो सातों आसमान और ज़मीन से विस्तृत होती है।

दूसरी ओर निर्धनता जिसका अर्थ दरवेशी, फ़क़ीरी है जो समृद्धि के मुक़ाबले में आती है, परिज्ञान में ईश्वर से दिल लगाने तथा उससे हर चीज़ मांगने के अर्थ में है। दरवेश को दुनिया की आवश्यकता नहीं होती है और जो कुछ दुनिया में होता है उससे उसे कुछ लेना देना नहीं होता। परिज्ञानी निर्धनता और फ़क़ीरी के चरण में पहुंच कर ईश्वर में खो जाता है और वास्तविक सक्षमता प्राप्त कर लेता है।

कुछ परिज्ञानियों व सूफ़ियों का कहना है कि अध्यात्म का मार्ग तय करने के लिए ज्ञान का होना अतिआवश्यक है क्योंकि उनका मानना है कि अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले कुछ लोगों की पथभ्रष्टता का कारण उनकी अज्ञानता है। यह लोग अध्यात्म के मार्ग पर चलने के सिद्धांतों और उसकी रीतिरिवाजों से अवगत होने से पहले ही इस मार्ग पर चल निकले और अधिकतर लोग ग़लत रास्ते पर निकल गये। ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी का कहना है कि यद्यपि परिज्ञानियों के लिए ज्ञान आवश्यक है किन्तु बिना ज्ञान का परिज्ञानी शैतान से अधिक कुछ और नहीं है। उनका मानना था कि परिज्ञान के लिए अज्ञानता ऐसा विष है जो अध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को मौत के घाट उतार देता है।

उनके अनुसार, परिज्ञान से अध्यात्म के मार्ग पर चलने में ज्ञान उस दीपक की भांति है जो अध्यात्म के मार्ग को प्रकाशमयी करता है। ख़्वाजा अब्दुल्लाह अध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों को केवल ज्ञान की प्राप्ति की अनुशंसा नहीं करते बल्कि ज्ञान व पहचान दोनों की प्राप्ति पर बल देते हैं। उनकी नज़र में पहचान, ज्ञान की आत्मा है और वे पहचान के बिना प्राप्त ज्ञान की आलोचना करते हैं। ख़्वाजा अब्दुललाह के अनुसार, ज्ञान वह दीपक है जो अध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों का मार्ग प्रकाशमान करता है और पहचान वह सीढ़ी है जो उसके ऊपर चढ़ने और ईश्वर से निकट होने का कारण बनती है।

 ख़्वाजा अब्दुल्लाह के अनुसार सत्य के मार्ग पर चलने वाले को ज्ञान की प्राप्ति में रुकना नहीं चाहिए या केवल ज्ञान ही प्राप्त नहीं करना चाहिए बल्कि वास्तविक पहचान की प्राप्ति के लिए उसे ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। ईश्वर की ओर जाने वाला मार्ग वह सीढ़ी है जिसमें इस मार्ग पर चलने वाला ज्ञान व पहचान की सहायता से एक एक सीढ़ी ऊपर की ओर जाता है और ईश्वर से मुलाक़ात करता है।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी ने जिन विषयों पर विशेष रूप से ध्यान दिया है उनमें से एक भरोसा भी है। भरोसे के धार्मिक, शिष्टाचारिक व परिज्ञानी अर्थ हैं। दहख़ुदा विश्वकोष में तवक्कुल का अर्थ है भरोसा करना, विश्वास करना और किसी का सहारा लेना किन्तु परिज्ञान की शब्दावली में इसके विशेष ही अर्थ होते हैं। तवक्कुल का अर्थ होता है किसी विश्वासपात्र के हवाले अपने मामलों को करना। जिसके हवाले मामले किए जाएं वह विश्वसनीय व विश्वासपात्र हो। परिज्ञान में तवक्कुल या भरोसा वह उच्च स्थान है जिसे कुछ गिने चुने परिज्ञानी व एकेश्वरवादी ही प्राप्त कर पाते हैं। परिज्ञानियों के अनुसार, भरोसा परखने का मापदंड, ईश्वर पर भरोसा और दूसरों से नाता तोड़ लेना है।

 ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी के अनुसार, समर्पण, भरोसे से ऊंचा है और यह उस समय है जब ईश्वर के मार्ग पर चलने वाला स्वयं को ईश्वर के हवाले कर देता है। ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी के अनुसार, जैसे ही बंदा इस चरण में पहुंचे और धर्म, आजीविका और लोगों से व्यवहार और कर्मों जैसे अपने समस्त कार्यों को ईश्वर के हवाले कर दे तो उसने बहुत ही कठिन और लंबी दूरी तय की है और उच्च स्थान प्राप्त किया है और बहुत से चरण तय किए हैं।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी ने भरोसे को आम लोगों से विशेष बताया है जबकि समर्पण को विशेष लोगों अर्थात धर्मगुरुओं या गणमान्य लोगों से विशेष बताया है। ख़्वाजा अब्दुल्लाह की दृष्टि में आम लोगों से आशय, परिज्ञान के मार्ग में चलने वाले मुरीद और अनुयायी हैं, जिन्होंने इस राह पर क़दम रखा है और सत्य तक पहुंचने के लिए बहुत लंबी दूरी और जटिल रास्ता तय करना है और उनके सामने बहुत से चरण और स्थान है और भरोसा इन्हीं स्थानों में से एक है किन्तु समर्पण, ईश्वर के उन प्रेमियों से विशेष है जो अपने गंतव्य तक पहुंच गये और उन्होंने ईश्वर की मुलाक़ात का स्वाद चख लिया है।

ख़्वाजा अब्दुल्लाह अंसारी के अनुसार, भरोसा करके रास्ता तय करने वाला अभी अपने रास्ते पर चल रहा है क्योंकि उसने केवल अपना कार्य ईश्वर के हवाले किया है और उसने अभी तक स्वयं को और अपने भविष्य को ईश्वर के हवाले नहीं किया है अर्थात स्वयं को समर्पित नहीं किया है किन्तु जो समर्पित हो चुका है, वह ईश्वर की मर्ज़ी को अपने लिए स्वीकार कर लेता है और शांति प्राप्त कर लेता है।

उसने स्वयं को उसके हवाले कर दिया और उसके मन में केवल उसकी इच्छा है, वह उसके आदेशों के सामने समर्पित है क्योंकि उसका मानना है कि अच्छाई और बुराई मनुष्य के मन की उपज है और ईश्वर ने जो कुछ अपने बंदों के लिए चुना है, उसमें भलाई ही भलाई है।