ईश्वरीय वाणी-८२
तग़ाबुन पवित्र कुरआन का 64वां सूरा है।
यह सूरा मदीना में नाज़िल हुआ है और इसमें 18 आयतें हैं। इस सूरे में जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है वे इस प्रकार हैं। महान ईश्वर की विशेषताओं व कार्यों का बयान, आसमान और ज़मीन की रचना, महान ईश्वर को इंसानों और समस्त कार्यों का ज्ञान होना, अतीत की क़ौमों व जातियों का अंजाम, प्रलय, प्रलय के दिन इंसानों के एक गुट का सफल होना और दूसरे गुट का विफल होना, ईश्वर और उसके पैग़म्बर के आदेशों का पालन, दुनिया की धन- सम्पत्ति से दिल लगा बैठने से परहेज़ और महान ईश्वर के मार्ग में खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करना।
इस सूरे की पहली आयत में आया है जो कुछ आसमान और ज़मीन में हैं ईश्वर का गुणगान करता है स्वामित्व और प्रशंसा उसी से विशेष है वह हर कार्य करने में पूर्ण सक्षम है।“
यह सूरा महान ईश्वर की प्रशंसा से आरंभ होता है। महान ईश्वर इस ब्रह्मांड का मालिक और वह हर कार्य करने पर पूर्ण सक्षम है। ब्रह्मांड के कण- कण में उसी का आदेश चलता है। हर प्रशंसा करने वाले की प्रशंसा उसी की ओर पलटती है यानी हर प्रशंसा का स्रोत वही है वही ब्रह्मांड का आरंभ और अंत है और उसकी शक्ति असीमित है।
इस सूरे की दूसरी आयत इंसान की रचना में प्रतिबिबित महान ईश्वर की असीम शक्ति की ओर संकेत करती है। उसने इंसान की रचना की है और उसे स्वतंत्रता व आज़ादी की नेअमत प्रदान की है। तो लोगों का एक गुट काफिर और दूसरा गुट मोमिन हो गया है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इंसान की आज़ादी व स्वतंत्रता ने ईश्वरीय परीक्षा के लिए भूमि प्रशस्त कर दी है।
अलबत्ता इस संबंध में इंसान जो कुछ अंजाम देता है महान ईश्वर उसे देखता और पूर्णरूप से उससे अवगत है।
सूरे तग़ाबुन की तीसरी आयत महान ईश्वर की रचना को अधिक स्पष्ट करते हुए कहती है” ईश्वर ने आसमान और ज़मीन की रचना सत्य के साथ की है।“
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि महान ईश्वर ने उद्देश्य व कार्यक्रम के अंतर्गत आसमान और ज़मीन की रचना की है। उसके बाद महान ईश्वर इंसान की रचना की बात करता है और कहता है कि इंसान के स्वरूप की रचना हमने की है। वह कहता है” उसने तुम्हें स्वरूप प्रदान किया और तुम्हारी रचना अच्छी सूरत में की है।“
महान ईश्वर ने इंसान की रचना की और उसे बुद्धि जैसी नेअमत प्रदान की और जो कुछ इस ब्रह्मांड में है उसके नमूने की रचना इंसान के अंदर की। महान ईश्वर ने जो यह कहा है कि उसने इंसान की अच्छी सूरत में रचना की है तो इसमें इंसान की भीतरी और बाहरी दोनों सूरतें शामिल हैं। वास्तव में अपने उद्देश्य तक पहुंचने के लिए जिस चीज़ की भी आवश्यकता है उसे उसने इंसान के अधिकार में दिया है। वास्तव में इंसान की सृष्टि इस बात की सूचक है कि महान ईश्वर ने उसकी रचना इस ब्रह्मांड की सुन्दरतम चीज़ के रूप में की है और महान ईश्वर ने इंसान की रचना में अपनी विचित्र शक्ति का प्रदर्शन किया है। सूरे तग़ाबुन की तीसरी आयत के अंत में महान ईश्वर कहता है “अंत में हर चीज़ की वापसी उसी की ओर है।“
हां इंसान ब्रह्मांड का एक भाग व अंश है। बहुत ही निम्न स्तर से उसका आरंभ हुआ है जबकि उसका अंत महाशिखर अर्थात महान ईश्वर की ओर उन्मुख है। चूंकि इंसान की रचना बड़े उद्देश्य के लिए की गयी है इसलिए हमेशा उसकी निगरानी व निरीक्षण की आवश्कता है और महान ईश्वर उसके अंदर और बाहर से पूर्णतः अवगत है। अतः वह सूरे तग़ाबुन की चौथी आयत में कहता है जो कुछ आसमान और ज़मीन में है वह उसे जानता है और जिसे तुम छिपाते हो और जिसे स्पष्ट करते हो वह भी जानता है और जो कुछ दिलों में है ईश्वर उसे भी जानता है। यह आयत महान ईश्वर के ज्ञान को तीन चरणों व भागों में वर्गिकृत करती है। पहला यह कि जो कुछ आसमान और ज़मीन में है उन सबके बारे में वह पूर्ण जानकारी रखता है।
दूसरा यह कि वह इंसानों के समस्त कार्यों को जानता है वह इंसान के उन कर्मों को जानता है जिसे वह व्यक्त करता है और उन कार्यों को भी जानता है जिसे वह स्पष्ट नहीं करता है। उसके ज्ञान का तीसरा चरण यह है कि इंसान के मन में क्या है उसके दिल में क्या है और उसकी नीयत क्या है सबको वह जानता है।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इन वास्तविकताओं को ध्यान में रखने का इंसान की प्रशिक्षा और सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका है और उसे वांछित उद्देश्य व परिपूर्णता तक पहुंचाने में इस कल्पना से मदद मिलती है। चूंकि इंसान की प्रशिक्षा में एक महत्वपूर्ण चीज़ इंसान द्वारा अतीत की कौमों व जातियों के अंजाम पर ध्यान देना है इसलिए महान ईश्वर इंसान को संबोधित करते हुए कहता है” जो लोग काफिर व नास्तिक हो गये थे क्या उनके बारे में तुम्हें ख़बर नहीं पहुंची है? तो उन्होंने अपने कार्य का स्वाद चख लिया है और उनके लिए कड़ा दंड है।“
हममें बहुत से ऐसे लोग होंगे जो तबाह व नष्ट हुए नगरों से गुज़रे होंगे और नास्तिकों व काफिरों के कर्मों का अंजाम अवश्य चुके होंगे। उन लोगों के बुरे अंजाम का कारण यह था कि उन सबने ईश्वरीय दूतों को झुठलाया और वे घमंड से कहते थे क्या हम लोगों जैसा इंसान हमारा मार्ग दर्शन करना चाहता है? इस प्रकार की चीज़ संभव नहीं है। इस आधार पर उन्होंने कुफ्र अपनाया और सत्य की ओर से मुंह मोड़ लिया जबकि महान ईश्वर को उनके ईमान और आदेश पालन की कोई आवश्यकता नहीं है।“
सूरे तग़ाबुन की 6ठीं आयत के अंत में महान ईश्वर इस विषय की ओर संकेत करता है कि अगर समूचा ब्रह्मांड काफिर हो जाये तो महान ईश्वर को लेशमात्र भी नुकसान नहीं पहुंचेगा। वास्तव में यह हम इंसान हैं जिन्हें अपनी परिपूर्णता के लिए ईश्वरीय प्रशिक्षा के कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
सूरे तग़ाबुन की 7वीं और 8वीं आयतें इस ओर संकेत करती है कि काफिरों ने यह सोचा कि प्रलय के दिन उन्हें उठाया नहीं जायेगा। हे पैग़म्बर उनसे कह दो कि ईश्वर की सौगन्द तुम सबको प्रलय में उठाया जायेगा फिर तुम्हें उसकी सूचना दी जायेगी जो कुछ तुम अंजाम दे चुके दिये हो और यह कार्य ईश्वर के लिए सरल है। जब ऐसा है तो ईश्वर, उसके दूत और उस प्रकाश अर्थात क़ुरआन पर ईमान ले आओ जिसे हमने नाज़िल किया है।“
सूरे तग़ाबुन की 9वीं आयत प्रलय के दिन इंसानों के जीवित किये जाने और उनके हिसाब- किताब की सूचना देती है। वह दिन पछताने और हाथ मलने का दिन होगा। उस दिन कुछ लोग सफल होंगे और हमेशा 2 के लिए उनका कल्याण हो जायेगा जबकि कुछ लोगों को घाटा होगा। उस दिन यह स्पष्ट हो जायेगा कि किन लोगों ने दुनिया के अपने व्यापार में घाटा उठाया। सूरे तग़ाबुन की नवीं आयत महान ईश्वर पर आस्था व ईमान रखने वालों की हालत को बयान करते हुए कहती है” इकट्ठा होने के दिन वह तुम्हें इकट्ठा करेगा वह परस्पर लाभ-हानि का दिन होगा जो भी ईश्वर पर ईमान लाये और अच्छा कर्म करे उसकी बुराइयां ईश्वर उससे दूर कर देगा और उसे ऐसे बाग़ों में प्रविष्ट करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी उनमें वे हमेशा रहेंगे यही बड़ी सफलता है।“
सूरे तग़ाबुन की 16वीं आयत में महान ईश्वर कहता है” तो जितना हो सके ईश्वर से डरो, सुनो और उसके आदेशों का पालन करो और ख़र्च करो कि तुम्हारे लिए बेहतर है और जो अपने मन के लोभ से सुरक्षित रहा ऐसे लोग सफल होने वाले हैं।“
इस आयत में महान ईश्वर सबसे पहले पापों से दूर रहने का आदेश देता है क्योंकि तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय व सदाचारित पापों से बचे बिना संभव नहीं है। उसके बाद ईश्वर की बात सुनने और उसके आदेशों के पालन की बात की गयी है। महान ईश्वर के आदेशों के पालन के मध्य ईश्वरीय मार्ग में खर्च करने पर बहुत बल दिया गया है और यह भी रेखांकित किया गया है कि इसका लाभ भी इंसान को ही मिलेगा।
आयत के अंत में बल देकर कहा गया है कि जो लोग कंजूसी व लालच से सुरक्षित रह जायें वे सफल हैं। कंजूसी और लालच दो ऐसे अवगुण हैं जो खर्च करने और सफलता के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट हैं। अगर इंसान यह चाहता है कि महान ईश्वर उस पर कृपा करे और खर्च करने के मार्ग पर चले तो कंजूसी और लालच जैसे अवगुणों से मुकाबला करके अपनी सफलता को सुनिश्चित बनाये। रवायत में आया है कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम रात से लेकर सुबह तक काबे की परिक्रमा करते और फरमाते थे” ईश्वर मुझे अपनी आत्मा की कंजूसी से सुरक्षित रख।“
जब इमाम से पूछा गया कि आप यह दुआ क्यों पढ़ते- रहते हैं? तो इमाम ने फरमाया कौन सी चीज़ कंजूसी और लालच से ज़्यादा महत्वपूर्ण है? उसके बाद इमाम ने इस आयत की तिलावत की जो लोग कंजूसी से सुरक्षित हैं तो वही लोग सफल हैं।“
सूरे तग़ाबुन की 17वीं आयत लोगों को खर्च करने, कंजूसी से रोकने और खर्च के प्रभावों व परिणामों की ओर संकेत करते हुए कहती है अगर ईश्वर को ऋण देगो तो वह उसके पुण्य को तुम्हारे लिए कई गुना बराबर कर देगा और तुम्हें माफ कर देगा और ईश्वर बड़ा गुणग्राहक और सहनशील है।“
इस परिभाषा का पवित्र कुरआन में बारमबार उल्लेख हुआ है जिसमें ईश्वर को ऋण देने की बात कही गयी है। वह ईश्वर हमसे ऋण मांगता है और कहता है कि उसका बदला हम कई गुना देंगे जो ब्रह्मांड की रचना करने वाला है और ब्रह्मांड की समस्त वस्तुओं का वास्तविक मालिक है और वह हमारा आभार भी कर रहा है। यह इसलिए नहीं है कि ईश्वर को हमारे ऋण की आवश्यकता है और उसके बदले में प्रतिदान को कई गुना और क्षमा करने का वादा करता है बल्कि यह अपने बंदों के प्रति महान ईश्वर के असीम प्रेम व कृपा के कारण है।
इससे बड़े प्रेम, दया व कृपा की कल्पना नहीं की जा सकती। हम क्या हैं और हमारे पास क्या है कि हम उसे ऋण देंगे? यह सब खर्च करने के महत्व और अपने बंदों के बारे में महान ईश्वर की अनन्य कृपा का सूचक है।