Apr १३, २०१६ ०७:५४ Asia/Kolkata

13 अप्रैल सन 1919 ईसवी को भारत में जलियां वाला बाग की रक्तरंजित घटना हुई।

1919 में ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सरकार ने भारत में विद्रोह और जनान्दोलन को रोकने के लिए एक कानून पारित किया जिसके अनुसार पुलिस को इस बात का अधिकार दे दिया गया कि किसी भी व्यक्ति को संदेह हो जाने पर बिना किसी वारेंट के गिरफ़तार कर ले और अनिश्चित काल तक जेल में रखे। इस कानून से भारतवासियों में आक्रोष फैल गया और आज के दिन हज़ारों निहत्थे भारतीय अमृतसर के जलियान वाला बाग में एकत्रित हुए। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए शांत प्रदर्शन किया। जनरल डायर नामक ब्रिटिश अधिकारी के आदेश पर पुलिस ने निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसायीं। जिससे 12 सौ लोग मौत की नींद सो गये और 4 हज़ार लोग बुरी तरह घायल हो गये ब्रिटिश अधिकारी ने घायलों के उपचार की अनुमति नहीं दी इस घटना के बाद भारत में स्वतंत्रता आंदोलन और भी तेज़ हुआ और अंतत: एक दिन वो आया जब ब्रिटेन को भारत छोड़ना ही पड़ा।

 

13 अप्रैल सन 1945 ईसवी को द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम महीनों में ऑस्ट्रिया पर संयुक्त सेना का अधिकार हो गया। द्वितीयि विश्व युद्ध से पहले तक ऑस्ट्रिया एक स्वतंत्र देश था किंतु युद्ध आरंभ होने के कुछ ही समय पश्चात हिटलर ने इस देश पर अधिकार करके इसे जर्मनी का भाग घोषित कर दिया और ऑस्ट्रिया की सेना भी जर्मनी की ओर से युद्ध में शामिल हो गयी। युद्ध में जर्मनी के पीछे हटने और ऑस्ट्रिया पर संयुक्त सेना के अधिकार के पश्चात यह देश पांच भागों में बॅंट गया और हर भाग संयुक्त देशों में से किसी एक के हाथ में चला गया । जबकि ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना पर चारों संयुक्त देशों का अधिकार एक समान था। 1946 में संयुक्त देशों ने ऑस्ट्रिया की स्वतंत्रता को औपचारिकता दी और इस देश द्वारा संयुक्त देशों के साथ समझौते के पश्चात संयुक्त सेना ऑस्ट्रिया से निकल गयी।

 

13 अप्रैल सन 1966 ईसवी को इराक़ के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुस्सलाम आरिफ़ की एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। वे सन 1958 ईसवी में इराक़ में राजशाही शासन व्यवस्था को गिराने में अब्दुल करीम कासिम के निकट सहयोगी रहे।

आरिफ़ मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति जमाल अब्दुन्नासिर की तरह मिस्र और इराक़ को एक देश बनाए जाने के समर्थक थे। अब्दुल करीम कासिम के शासन काल में वे एक बार सरकार का विरोध करने के दोष में गिरफ़तार हुए और उन्हें मृत्युदंड सुना दिया गया किंतु कासिम ने उन्हें माफ़ कर दिया। इसके बावजूद सन 1963 में अब्दुस्सलाम आरिफ़ ने बास पार्टी के समर्थक सैन्य अधिकारियों के साथ मिलकर अब्दुल करीम कासिम के विरुद्ध विद्रोह किया और उन्हें तथा उनके संबंधियों और साथियों को मार कर स्वंय राष्ट्रपति बन गये और आज के दिन वायु दुर्घटना में उनकी मृत्यु के पश्चात उनके भाई अब्दुर्रहमान आरिफ़ इराक़ के राष्ट्रपति हुए और सन 1968 ईसवी में अहमद हसन अल बक्र के सैनिक विद्रोह तक वे इस पद बने रहे।

13 अप्रैल सन 1975  ईसवी को लेबनान में फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की एक बस पर चरमपंथी फ़्लांजिस्टों के आक्रमण के साथ ही गृह युद्ध आरंभ हो गया। इस आक्रमण में 30 फ़िलिस्तीनी मारे गए। इस नरसंहार के बाद लेबनान की जनता चरमपंथी फ़्लान्जिस्टों के विरुद्ध उठ खड़ी हुई। कुछ समय बाद शरणार्थी फ़िलिस्तीनियों के शिविर पर फ़्लान्जिस्टों का आक्रमण हुआ जिसके बाद फ़िलिस्तीनी छापामार भी लेबनान के गृह युद्ध में शामिल हो गए। ज़ायोनी शासन के षडयंत्र के अंतर्गत आरंभ हुए इस युद्ध ने लेबनान को भारी जानी व आर्थिक नुक़सान पहुंचाया। ज़ायोनी शासन का लक्ष्य यह था कि लेबनान में ज़ायोनी सरकार की विरोधी जनता और फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों के मध्य युद्ध आरंभ करवा दे ताकि वे ज़ायोनी सेना पर आक्रमण न कर सकें। लेबनान का गृह युद्ध वर्ष 1990 में ताएफ़ समझौते के बाद समाप्त हुआ। 

 

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19 शाबान सन 6 हिजरी क़मरी को बनी मुस्तलक़ नाम का युद्ध हुआ। यह युद्ध मुसलमानों और बनी मुस्तलक़ नामक कबीले के मध्य हुआ था जो मक्का नगर के निकट रहता था।

मक्का में यह लोग अपने धर्म का प्रचार करते थे किंतु इस्लाम के उदय के बाद इन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ गतिविधियां आरंभ की र फिर इस क़बीले ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया किंतु इस युद्ध में उन्हें बड़ी हार का सामना करना पड़ा।