Apr ११, २०१६ ०६:५३ Asia/Kolkata

सूरए ज़ोमर मक्के में उतरा है और इसमें 75 आयतें हैं।

इस सूरे में जिस विषय पर सबसे अधिक ध्यान दिया गया है वह एकेश्वरवाद का निमंत्रण विशेषकर उपासना और बंदगी में निष्ठा है। इस सूरे में एक अन्य विषय जिस पर चर्चा की गयी है वह प्रलय का विषय है। अर्थात प्रलय के दिन लोग अपने कर्मों के आधार पर ईश्वर की अदालत में उपस्थित होंगे और उनके कर्मो के आधार पर उनका फ़ैसला किया जाएगा कि वे स्वर्ग के योग्य हैं या नरक के।

 

इस सूरे की पहली और दूसरी आयत में पढ़ते हैं कि यह प्रतिष्ठित व तत्वदर्शी ईश्वर की ओर से उतारी गयी किताब है। हमने आपकी ओर इस को सत्य के साथ उतारा है इसीलिए आप पूरी निष्ठा के साथ ईश्वर की उपासना करें।

 

हर किताब का महत्व तब पता चलता है जब हमें यह पता चले कि यह महा किताब तत्वदर्शी ईश्वर के ज्ञान का स्रोत है और दुनिया की कोई भी चीज़ उससे छिपी नहीं है तो हम उसके वैभव को अधिक समझ सकेंगे और पूरा विश्वास हो जाएगा कि इसमें वर्णित बातें पूरी तरह से सत्य हैं जो पूरी तरह तत्वदर्शिता, प्रकाश और मार्गदर्शन से ओतप्रोत है।

 

दूसरी आयत में आया है कि हमने आपकी ओर इस को सत्य के साथ उतारा है अर्थात पूरा का पूरा क़ुरआन सत्य है। यह हर प्रकार की ग़लत बातों और कल्पनाओं से दूर है। उसके बाद आयत कहती है कि इसीलिए आप पूरी निष्ठा के साथ ईश्वर की उपासना करें।

 

यह आयत उपासन के सही होने की शर्त बयान कर रही है। अर्थात उपासना निष्ठा के साथ हो और हर प्रकार के दिखावे और अनेकेश्वरवाद से दूर हो। धर्म, मनुष्य के जीवन के विभिन्न भौतिक व आध्यात्मिक आयामों को शामिल किए हुए होता है इसीलिए ईश्वर के निष्ठावान बंदों को अपने जीवन को उसकी निष्ठा के रूप में ढाल देना चाहिए। ईश्वर के अतिरिक्त सब को अपने मन से निकाल दे और सदैव उसकी प्रसन्नता के मार्ग में क़दम बढ़ाए। धर्म की निष्ठा, इसी का नाम है।

 

तीसरी आयत में एक बार फिर निष्ठा के विषय पर बल दिया गया है। यह आयत कहती है कि जान लो कि निष्ठापूर्ण बंदगी केवल अल्लाह के लिए है और जिन लोगों ने उसके अतिरिक्त अभिभावक बनाएं हैं, यह कहके कि हम उनकी उपासना केवल इसलिए करते हैं कि यह हमें अल्लाह से निकट कर देंगे। अल्लाह उनके मध्य समस्त विवादित मुद्दों में निर्णय कर देगा कि अल्लाह किसी भी झूठे और आभार व्यक्त करने वाले का मार्गदर्शन नहीं करता है।

 

सूरए ज़ोमर की आयत संख्या 21 में आया है कि क्या तुमने नहीं देखा कि ईश्वर ने आसमान से पानी उतारा है फिर उसे विभिन्न सोतों में जारी कर दिया है फिर उसके द्वारा विभिन्न रंगों की खेतियां पैदा करता है फिर वह खेती सूख जाती है तो पीले रंग में देखते हो फिर उसे भूसा बना देता है, इन समस्त बातों में बुद्धिमान लोगों के लिए उपदेश और नसीहत का सामान पाया जाता है।

 

यह आयत व्यवस्था में ईश्वर की महानता और वैभव की निशानी है। उसके एक इशारे पर वर्षा होती है और उसके बाद विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधों की इसी पानी से सिंचाई होती और वे बड़े होते हैं।

 

क्या तुमने नहीं देखा कि ईश्वर ने आसमान से पानी उतारा है फिर उसे विभिन्न सोतों में जारी कर दिया है? वर्षा के जीवनदायक क़तरे ज़मीन में प्रविष्ट होते हैं ताकि उसके सीने को चीर कर पौधा निकाले। कभी कभी यह एक स्थान पर जमा हो जाता है और उसके बाद सोतों, नहरों और कुंओं द्वारा बाहर आता है।

 

यदि ज़मीन सख़्त होगी और उसमें तनिक भी पानी प्रविष्ट न हो सका तो वह आसमान से गिरने के बाद शहरों में दाख़िल हो जाएगा, न सोता होगा और न ही कुंआ। यदि ज़मीन नर्म होगी तो समस्त पानी उसके भीतर चला जाएगा, इस प्रकार से कि उस तक पहुंचना संभव नहीं होगा। कठोर और नर्म, दो प्रकार की ज़मीन बनाना, एक व्यवस्थित दूरी पर, ईश्वर की महान निशानियों में से है।

 

उसके बाद ईश्वर कहता है कि फिर उसके द्वारा विभिन्न रंगों की खेतियां पैदा करता है फिर वह खेती सूख जाती है तो पीले रंग में देखते हो फिर उसे भूसा बना देता है, विभिन्न प्रकार के सुन्दर फूल, सब्ज़ियां, फल इत्यादि पैदा करता है।

 

फिर उसके बाद वनस्तपतियों और फूल पत्तियों के जीवन के बारे में बताया गया है। उसके बाद वह सूख जाती है तो पीले रंग में देखते हो फिर उसे भूसा बना देता है, उसके बाद हर ओर से तेज़ हवाएं चलती हैं और उनको एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं, फिर परिणाम स्वरूप वह टूट जाती हैं और छोटी छोटी हो जाती हैं।

 

यद्यपि यह वनस्पतियों और फूल पत्तियों के बारे में बताया गया है किन्तु यह मनुष्य को सचेत करता है कि यही घटना तुम्हारे जीवन में भी घटती है और उसके सिद्धांत एक ही हैं। जन्म, प्रफुल्लता और जवानी और उसके बाद बुढ़ापा, निढाल और अंततः मौत।

 

इस बड़े पाठ के बाद आयत मोमिनों और काफ़िरों के मध्य अंतर को बयान करती है ताकि यह वास्तविकता स्पष्ट करे कि पवित्र क़ुरआन और वह भी वर्षा के क़तरों की भांति है जो हरे भरे दिल पर गिरते हैं जैसा कि बारिश के क़तरे नर्म धरती पर पड़ते हैं तो उसको लाभ पहुंचता है इसी प्रकर इन आयतों से वही दिल केवल लाभान्वित होते हैं जो उसकी कृपा और उसके आत्मनिर्माण की छत्रछाया में तैयार होते हैं। सूरए ज़ोमर की आयत संख्या 22 में आया है कि क्या वह व्यक्ति जिसके दिल को ईश्वर ने इस्लाम के लिए खोल दिया है वह अपने ईश्वर की ओर से प्रकाशमयी है, पथभ्रष्ट जैसा हो सकता है। खेद उन लोगों के हाल पर है जिनके दिल ईश्वर के गुणगान के लिए कठोर हो गये हैं तो वह खुली हुई पथभ्रष्टता में लिप्त हैं।

 

कठोर दिल, मार्गदर्शन और सत्य के प्रकाश के सामने झुकते नहीं हैं जबकि दिल की कठोरता के मुक़ाबले में नर्म और स्वीकार करने वाले दिल होते हैं। खुला मन, बात स्वीकार करने के लिए तैयार रहने की ओर संकेत है। एक बड़े घर में बहुत से लोगों को रखा जा सकता है इसी प्रकार एक खुली आत्मा अधिक से अधिक सत्य बातों को स्वीकार करती है। अपने दिल के दर्पण को पापों से बचाए और अपने दिल के घर को आतंरिक इच्छाओं से पवित्र करें ताकि उसी घर में प्रेमी का स्वागत करें।

 

बाद की आयत में पवित्र क़ुरआन को बेहतरीन बात बताया गया है और क़ुरआन की विशेषताएं बयान की गई हैं। ज़ोमर की 23वीं आयत में आया है कि अल्लाह ने बेहतरीन बात को इस पुस्तक के रूप में उतारा है जिसकी आयतें आपस में मिलती जुलती हैं और बार बार दोहराई गई हैं कि उन से ईश्वरीय भय रखने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, उसके बाद उनके शरीर और दृदय ईश्वर की याद के लिए नर्म हो जाते हैं, यही ईश्वर का वास्तविक मार्गदर्शन है। वह जिसको चाहता है देता है और जिसको वह पथभ्रष्टता में छोड़ दे उसको कोई सही मार्ग पर लाने वाला नहीं है।

 

पवित्र क़ुरआन की आयतें और सूरे एक दूसरे से मिलती जुलती और एक दूसरे से समन्वित हैं। उनमें कभी भी मतभेद और विवाद नहीं पाया जाता। लोगों की बातों के विपरीत जब बातें बढ़ जाती हैं तो जाने अनजाने में उनमें विरोधाभासी चीज़ें निकलने लगती हैं। पवित्र क़ुरआन में कहानियां और उपदेश हैं जिनको बार बार बयान किया गया है किन्तु उनका दोहराया जाना कभी भी दुखद नहीं होता और यह शब्दांलंकार का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

 

पवित्र क़ुरआन की विशेषताओं में से एक यह है कि यह दिलों पर बहुत गहरा प्रभाव डालता है। इसकी आयतें इतनी प्रभावशाली हैं कि तैयार दिलों को पहले भयभीत करती हैं जिसके कारण उसमें जागरूकता पैदा हो जाती है। उसके बाद के चरण में अंदर और भीतर से उसको नर्म करती है, उसे ईश्वर की याद दिलाती है, उसके स्वभाव को नर्म करती है और सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार करती है और उसके बाद उसका मन शांत हो जाता है।

 

 

सूरए ज़ोमर की आयत संख्या 53 में समस्त पापों से लौटने का मार्ग दिखाया गया है। ईश्वर इस आयत में बहुत ही नर्म लहजे में अपने प्रेम, कृपा और दया का द्वार अपने बंदों पर खोलने की सूचना देता है और उन सबको माफ़ किए जाने का आदेश देता है।

 

सूरए ज़ोमर की 53वीं आयत में आया है कि पैग़म्बर आप यह संदेश पहुंचा दीजिए कि हे मेरे बंदों जिन्होंने अपनी आत्मा पर ज़ियादती की है, वे ईश्वर की दया से निराश न हों, अल्लाह समस्त पापों को माफ़ करने वाला है और वह निश्चित रूप से बहुत अधिक क्षमाशील और दयावान है।

 

इस आयत को पापों को क्षमा करने के बारे में पवित्र क़ुरआन की सबसे अच्छी आयत कहा जाता है। ईश्वर की दया असीमित है और वह समस्त पापों को क्षमा कर देता है। अलबत्ता कभी समाप्त न होने वाली यह क्षमा और दया इस बात से सशर्त है कि वह पाप करने के बाद पछताए और अपना मार्ग परिवर्तित कर दे। मनुष्य की सबसे महत्वपूर्ण समस्या, अपने पिछले पापों का आभास है, विशेषकर उस समय जब यह पाप बहुत बड़ा हो। मनुष्य का मन सदैव इस बात में उलझा रहता है कि यदि उसने पवित्रता और ईश्वरीय भय का रास्ता चुन लिया और ईश्वर की ओर लौट आया तो वह स्वयं को किस प्रकार पिछले पापों के भार से छुटकारा दिलाएगा। यह विचार उसके लिए एक दुःस्वपन की भांति होता है और उसकी आत्मा को झिंझोड़ता रहता है।

 

पवित्र क़ुरआन की शिक्षाएं इन समस्याओं का समाधान करती हैं। पवित्र क़ुरआन विशेष शर्त के साथ क्षमा याचना को पिछली बातों से छुटकारा पाने और नई ज़िंदगी शुरु करने का माध्यम बताता है, जैसा कि वह अभी अभी पैदा हुआ हो।

 

पवित्र क़ुरआन हर मनुश्य पर ईश्वरीय कृपा के द्वार खोल देता है। इसका उदाहरण यही आयत है जो अपराधियों को ईश्वर की ओर बुलाती है और उन्हें यह विश्वास दिलाती है कि प्रायश्चित द्वारा अपने पिछले पापों से छुटकारा पा सकते हैं।

 

पैग़म्बरे इस्लाम का कहना है कि यदि कोई पाप से तौबा करे तो वह उस व्यक्ति की भांति है जिसने पाप ही न किया हो।

 

निसंदेह ईश्वर की ओर पलटने की भी कुछ शर्तें होती हैं। एक ओर पापियों को चहिए कि वह अपने पूरे अस्तित्व से पलटे और उसके भीतर अंदरूनी क्रांति पैदा हो। दूसरी ओर पापों से क्षमा के बाद उसके ईमान और आस्था के आधार का जो पापों के तूफ़ान से गिर गया था, पुनर्निमाण करे। इसके अतिरिक्त नेक काम करके अपनी नैतिक व मानसिक समस्याओं की भरपाई करे। इन चरणों को तय करने के बाद वह ईश्वर की अनुकंपाओं के महासागर में सरलता से प्रविष्ट हो जाएगा यद्यपि उसके पापों का भार कितना ही अधिक क्यों न हो।