Apr २७, २०१६ ११:२४ Asia/Kolkata

जैसा कि हमने आपको बताया कि हकीम अबू मोहम्मद इल्यास जो निज़ामी गंजवी के नाम से मशहूर हैं, छठी शताब्दी हिजरी क़मरी बराबर 12वीं शताब्दी ईसवी के शायर हैं।

निज़ामी गंजवी का जन्म 530 से 540 हिजरी बराबर 1135 से 1145 ईसवी के बीच गंजे में हुआ था और 70 साल के बाद 599 हिजरी क़मरी में उनका इसी शहर में देहान्त हुआ। वे अपने समय का प्रचलित ज्ञान रखते थे। चूंकि वे एक समृद्ध घर में पैदा हुए थे इसलिए उन्हें काम करने या पेशावराना शायरी के ज़रिए जीवन यापन करने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

 इसलिए उन्होंने एकान्तवास को अपनाया और उस अवस्था में वे शोधकार्य, पवित्र क़ुरआन की व्याख्या, पैग़म्बरे इस्लाम के कथन, दर्शनशास्त्र और आत्मज्ञान की प्राप्ति में लीन हो गए।

प्राचीन ईरान की शिक्षा व प्रशिक्षा व्यवस्था में दर्शनशास्त्र और धर्मशास्त्र का ज्ञान अर्जित किया जाता था और इसे हिकमत कहते थे और निज़ामी गंजवी ने इन दोनों शाखाओं का पर्याप्त ज्ञान था। उनकी मौजूद रचनाओं में ख़ास तौर पर मख़ज़नुल असरार, इक़बाल नामा और उनकी सभी मसनवियों की प्रस्तावनाओं से इस बात की पुष्टि होती है कि वे तत्वदर्शी थे।

निज़ामी गंजवी के बारे में ज़्यादातर शोध करने वालों का यह मानना है कि निज़ामी के बचे हुए शेर की सिर्फ़ शायरी व कला के आयाम से समीक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने कहानी या अपनी विशेष शैली में हिकमत के विभिन्न विचारों को पेश किया है और वास्तव में इन विचारों को बयान करके लोगों को अपने विचारों व आस्था का ज्ञान दिया है। उनकी बची हुयी रचनाएं पंज गंज और क़सीदों व ग़ज़लों का दीवान है। उनके धर्मशास्त्र, नैतिकता व आत्मज्ञान पर आधारित शेर इतने अर्थपूर्ण हैं कि उन पर ध्यान देने की ज़रूरत है।

निज़ामी ने अपनी कुछ रचनाओं में धर्मशास्त्र व नैतिकता के विभिन्न विचारों को दक्षता के साथ बहुत ही आसान अंदाज़ में बयान किया है। उनकी रचनाओं में जो तत्वदर्शिता दिखाई देती है वह वही है जो ईरान में प्रचलित थी। दर्शनशास्त्र के उस्ताद डाक्टर असग़र दादबे का मानना है कि फ़िरदोसी ने जिस तत्वदर्शिता को पेश किया है निज़ामी ने भी उसी को पेश किया है जिसे हिकमते इशराक़ी कहा जाता है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि निज़ामी की रचनाओं को देख कर यह किसी अतिश्योक्ति के बिना यह कहा जा सकता है कि वह नैतिक गुणों से संपन्न एक महान व्यक्ति थे। जिनकी नज़र मानव समाज के नैतिक व प्रशिक्षा के आयाम पर केन्द्रित है। यह बिन्दु निज़ामी की सारी रचनाओं में दिखाई देता है सिर्फ़ इस अंतर के साथ कि नैतिकता व तत्वदर्शिता के विषय मख़ज़नुल असरार में स्पष्ट हैं जबकि लैला-मजनू, ख़ुसरो-शीरीन और हफ़्त पैकर में निहित रूप में मौजूद है जिसे समझने के लिए अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है।

 

निज़ामी ने अपनी मसनवी और लघु व बड़ी कथाओं के ज़रिए अच्छे व्यवहार व उच्च जीवन की शिक्षा दी है। निज़ामी के शेर पढ़ने से पता चलता है कि उन्होंने विभिन्न कहानियों को पद्य के ज़रिए लोगों को इस बात की शिक्षा दी है कि किस तरह एक इंसान अपने व्यक्तिगत जीवन में और दूसरे इंसानों के साथ व्यवहार करे। कुछ रचनाओं में उन्होंने इससे आगे बढ़ कर सामाजिक मामलों पर टिप्पणी भी की।

उन्होंने जनता के साथ शासक के व्यवहार की भी समीक्षा की है। इसी प्रकार उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए न्याय और न्यायी शासक की विशेषताओं का उल्लेख किया है। बूढ़ी औरत और शासक सन्जर या नौशीरवान के अपने मंत्री के साथ व्यवहार की कहानी इसी श्रेणी में आती है।

बूढ़ी औरत और शासक सन्जर की कहानी कुछ इस प्रकार है। एक दिन एक बूढ़ी औरत शासक सन्जर के पास न्याय के लिए जाती है और उसकी आलोचना करते हुए कहती है कि लोगों को तुमसे अन्याय के सिवा और कुछ न मिला। तुम्हारे कारिन्दे अपराध व अत्याचार पर तुले हुए हैं। फिर वह बूढ़ी औरत शासक सन्जर को सचेत करते हुए कहती है कि अगर तुम यह चाहते हो कि पीड़ितों की बददुआ से सुरक्षित रहो तो अत्याचार से हाथ रोक लो।

निज़ामी के शेरों में आत्मज्ञान का पहलु भी मौजूद है। बल्कि आत्मज्ञान भी निज़ामी की शायरी की मुख्य विशेषताओं में शामिल है। शायरों के अनुसार, शायरी प्रेम, रूचि और भावना से जन्म लेती है और जो शायर इस तरह के शेर न कहे वह शायर नहीं है। निज़ामी की शायरी में भी ये बिन्दु मौजूद हैं। आत्मज्ञान के सिद्धांत के अनुसार, इश्क़ अंतिम चरण है और यह प्रेम का परिपूर्ण रूप है। आत्मज्ञानी अपनी आइडियॉलजी की व्याख्या इश्क़ से करते हैं और इश्क़ को सत्य को पहचानने का ज़रिया मानते हैं। इसी प्रकार उनका मानना है कि सृष्टि की रचना और इंसान के वजूद का कारण ही इश्क़ है। निज़ामी भी आत्मज्ञानियों की तरह इश्क़ को सृष्टि का आधार मानते हैं।

   

निज़ामी का मानना है कि सिर्फ़ बुद्धि के ज़रिए ईश्वर की पहचान नहीं हासिल की जा सकती। उनहोंने मख़ज़नुल असरार किताब में इससे भी आगे बढ़ते हुए बुद्धि को भ्रम की श्रेणी में रखा है। उनका मानना है कि बुद्धि ईश्वर की पहचान में भ्रम, कल्पना व इंद्रीय की तरह अक्षम है और वह इश्क़ के बिना ईश्वर तक नहीं पहुच सकती। यही कारण है कि उन्होंने जगह जगह पर बुद्धि को लंगड़ा और ईश्वरीय सच्चाई को समझने में अक्षम कहा है।

निज़ामी को इस्लामी शिक्षाओं के सभी आयामों, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र और खगोलशास्त्र का ज्ञान था किन्तु उन्हें दर्शनशास्त्र या धर्मशास्त्र के किसी विशेष मत जैसे मशाई या अशअरी मत का अनुयायी नहीं कहा जा सकता। यह कहा जा सकता है कि निज़ामी मशाइयों, अशअरियों और मोअतज़लियों के दर्शनशास्त्र व धर्मशास्त्र के विचारों से अवगत होने के साथ ही ईश्वर पर आस्था पर आधारित तत्वदर्शिता को मानते थे। यह तत्वदर्शिता का ऐसा पहलू है जिसकी जड़ क़ुरआन से मिली हुयी है। वह ईश्वर की हस्ती, उसके नाम और विशेषताओं तथा मनुष्य की उत्पत्ति के बारे में एक ऐसे दक्ष शोधकर्ता की तरह बात करते हैं जिसने आध्यात्म का लंबा सफ़र तय किया हो और अपनी आंतरिक आंख से आध्यात्मिक दुनिया को देखा हो। निज़ामी ने ईश्वर के गुणगान और वजूद के विभिन्न स्तरों पर उसके जलवे का जिय ज़बान में वर्णन किया है वही ज़बान बड़े आत्मज्ञानियों की रचनाओं में दिखाई देती है।

ईश्वर न सिर्फ़ यह कि एकमात्र रचयिता है बल्कि महान आत्मज्ञानियों के शब्दों में सृष्टि की उत्पत्ति और सभी जलवों का स्रोत भी है।

 

इस संसार में जो कुछ है उसका वजूद ईश्वर की कृपा से है और ये सब चीज़ें ईश्वर के नाम व विशेषताओं का जलवा हैं।