ईदे नौरोज़
https://parstoday.ir/hi/radio/uncategorised-i5002-ईदे_नौरोज़
ईदे नौरोज़, ईरानियों का राष्ट्रीय पर्व है जो बसंत ऋतु के आरंभ में मनाया जाता है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Mar २०, २०१६ १४:१८ Asia/Kolkata
  • ईदे नौरोज़

ईदे नौरोज़, ईरानियों का राष्ट्रीय पर्व है जो बसंत ऋतु के आरंभ में मनाया जाता है।

ईदे नौरोज़, ईरानियों का राष्ट्रीय पर्व है जो बसंत ऋतु के आरंभ में मनाया जाता है। यह त्योहार नए साल के आगमन और शीत ऋतु की समाप्ति व ग्रीष्म ऋतु के आरंभ का सूचक होता है। प्रकृति के इस परिवर्तन पर ईरानी जनता के जीवन में भी विभिन्न प्रकार की सांकेतिक प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं जो अलग-अलग संस्कारों और रीति-रिवाजों में दिखाई देती हैं। ये संस्कार नया साल शुरू होने से एक महीने पहले आरंभ होते हैं और नए साल की तेरह तारीख़ तक जारी रहते हैं। 

साल के अंतिम दिनों में और नौरोज़ से कुछ दिन पहले बसंत ऋतु व नौरोज़ का संदेश देने देने वाले शहरों व गांवों की सड़कों और गलियों में घूमते हैं और गीत गा कर तथा छोटे मोटे नाटक करके लोगों को सर्दियों के जाने और बहार व नौरोज़ के आने की शुभ सूचना देते हैं। बहार के आने की सूचना देने वाले गुटों के सड़कों पर आने की प्रथा, ईरान में प्राचीन काल से प्रचलित है। इन नाटक प्रथाओं में से कुछ सबसे अधिक मशहूर, कूसे बर निशीन, आतिश अफ़रूज़ और मीर नौरोज़ी हैं।

इन नाटकों के मंचन का मुख्य लक्ष्य सर्दियों के जाने, गर्मियों के आगमन और वसंत के जन्म को सांकेतिक रूप से दर्शाना है। ईरान के प्रख्यात विद्वान अबू रैहान बीरूनी ने अपनी एक किताब में लिखा है कि कूसे बर निशीन नाटक का मंचन, कियानी शासन श्रृंखला के काल से चला आ रहा है। वे लिखते हैं कि एक व्यक्ति को हंसाने वाले वस्त्र पहना कर गधे पर बिठाया जाता था और पूरे शहर में फिराया जाता था। वर्ष के अंतिम दिनों में सड़कों पर दिखाया जाने वाला यह नाटक काफ़ी समय तक ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित था।

एक अन्य नारक जो नौरोज़ आने से कुछ दिन पहले और नए साल के आरंभ के दो सप्ताह बाद तक दिखाया जाता था, आतिश अफ़रूज़ था जिसमें लोगों को बसंत ऋतु के आगमन की शुभ सूचना दी जाती थी। इस नाटक में भाग लेने वाले कुछ कलाकार और गाने बजाने वाले ही थे जिनमें से हर एक विशेष प्रकार का वस्त्र पहनता था। कोई अपने चेहरे पर कालिख पोत कर लाल रंग का कपड़ा पहना था, दूसरा हाथ में मशाल उठा लेता था, कोई अन्य दो लकड़ियों पर खड़ा हो जाता था और उनके सहारे चलने लगता था। ये लोग बजाने वालों के साथ मिल कर हास्य नाटकों का मंचन करते थे और पटाख़े छोड़ते थे। लोग, इनाम के रूप में इन्हें पैसे देते थे। समय बीतने के साथ साथ इन नाटकों में परिवर्तन आया और अब इन नाटकों के कलाकारों में से हाजी फ़ीरूज़ नामक चरित्र ही बचा है जो इस्फ़ंद मास के अंतिम दिनों में सड़कों पर दिखाई देता है। इस चरित्र को जीवंत करने वाले लोग लाल कपड़े पहन कर और मुंह पर कालिख पोत कर सड़क पर निकल आते हैं और गा-बजा कर लोगों को नौरौज़ व बहार के आने की शुभ सूचना देते हैं। इनका लाल वस्त्र, बहार की प्रफुल्लता का सूचक है जबकि चेहरे की कालिख, सर्दी के दिनों की याद दिलाती है जो बहार से टकरा रही है लेकिन उसके बाद जाने के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं है।

नौरोज़ का एक अन्य नाटक मीर नौरोज़ी है जो अब भी ईरान के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। इस कार्यक्रम में लोगों के बीच से और समाज के सबसे निम्न वर्ग के एक व्यक्ति को शासक बनाया जाता था और शहर या गांव का शासन कुछ दिनों के लिए उसके हाथ में दे दिया जाता था। कुछ लोगों को उसके सहायकों व सेवकों का पद दिया जाता था। मीर नौरोज़ी अपनी इस अल्पकालीन सरकार में जो चाहे आदेश दे सकता था। आम तौर पर उसका शासन पांच दिन का होता था और इस दौरान वह अपने विचित्र आदेशों से लोगों का मनोरंजन करता था। अलबत्ता मीर नौरोज़ी का अल्पकालीन शासन और उससे संबंधित नाटक, फ़ारसी के साहित्यकारों के लिए नई शब्दावली का कारण बने और अब इसे आयु के कम होने और अवसरों से लाभ उठाने की आवश्यकता के अर्थ में प्रयोग किया जाता है।

नए साल और नौरोज़ की प्रथाओं और नाटकों की संख्या काफ़ी अधिक है और इनमें से अधिकतर साल के अंतिम दिनों में आम लोगों के समक्ष दिखाए जाते हैं। इन नाटकों के साथ ही नौरोज़ के कार्यक्रमों और ईद के पर्व के आयोजन का विशेष संगीत भी बजाया जाता है। प्राचीन काल में नौरोज़ी ख़ान नामक गुट हुआ करते थे जो ख़ुशी के तराने गा कर लोगों को नौरोज़ व बहार के आगमन की शुभ सूचना देते थे। घूम फिर कर काम करने वाले ये गुट ईरान के अधिकतर क्षेत्रों में हुआ करते थे लेकिन मुख्य रूप से यह गीलान, माज़ंदरान और आज़रबाइजान प्रांतों में काम करते थे। इनके गीतों में प्रकृति के चिन्हों जैसे सूरज, ज़मीन, वर्षा और प्रकाश का गुणगान किया जाता था। इसी प्रकार इन गीतों में धार्मिक आस्थाएं भी दिखाई पड़ती थीं।

पूरे ईरान में वसंत ऋतु और नए वर्ष के स्वागत के कार्यक्रम केवल विभिन्न प्रकार के नाटकों तक सीमित नहीं हैं बल्कि नौरोज़ के अनेक संस्कार प्राचीन काल से लेकर अब तक जारी हैं और अपने साथ बहार और ताज़गी की सुगंध हर जगह फैलाते हैं। इन्हीं में से एक प्रथा, जो प्रायः साल के अंतिम दिनों में हर स्थान पर दिखाई पड़ती है, सार्वजनिक और व्यापक सफ़ाई है जिसके ख़ाने तकानी कहा जाता है। सर्दी के मौसम के अंतिम दिनों में पूरे ईरान में विशेष प्रकार का कौतूहल दिखाई देता है और सभी अपने अपने घरों, घर के सामानों यहां तक कि गली, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों की सफ़ाई करके बहार का स्वागत करते हैं।

 वस्तुतः साल के अंतिम दिनों में ख़ाने तकानी और घर व शहर के वातावरण से गंदगी को दूर करना, नए साल के प्रकाश और नवीनता के स्वागत के अर्थ में है। इस्लाम धर्म ने भी सफ़ाई सुथराई पर विशेष बल दिया है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने सफ़ाई को ईमान की निशानी बताया है। ख़ाने तकानी का काम प्रायः घर के सभी लोगों की सम्मिलिति से होता है और हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार किसी न किसी काम का दायित्व उठाता है।

साल के अंतिम दिनों की एक अन्य रस्म नए साल की ख़रीदारी की है जिसमें कपड़ों, सूखे मेवों, फलों, मिठाइयों और घर के सामान की ख़रीदारी शामिल है। इसी लिए हर साल के अंतिम दिनों में विभिन्न शहरों के बाज़ार भीड़ से भर जाते हैं और लोग अपनी ज़रूरत की वस्तुएं ख़रीदने के लिए घरों से बाहर निकलते हैं। हर आदमी चाहता है कि नए साल के आरंभ में नया वस्त्र पहने और बेहतरीन खाद्य पदार्थों से अपने अतिथियों का सत्कार करे। साल के अंतिम दिनों की ख़रीदारी से दुकानदारों की आय में काफ़ी वृद्धि हो जाती है।

ईरान साल का अंतिम महीना इस्फ़ंद, अनाज और दाने बोने का समय भी होता है। सब्ज़ए नौरोज़ के नाम से विख्यात नौरोज़ के विशेष पौधे की सांकेतिक रूप से बुवाई भी ईरानी परिवारों के बीच प्राचीन काल से प्रचलित है। प्राचीन ईरान में नया साल आरंभ होने से पचीस दिन पहले शहर के चौकों पर साल के बारह महीनों के प्रतीक के रूप में कच्ची ईंट के बारह खम्बे स्थापित किए जाते थे और हर खम्बे के ऊपर गेहूं, चावल, मसूर, चने और इसी प्रकार के अन्य अनाजों के बीच बोए जाते थे। इनमें से हर अनाज से कोंपल निकलने को नए साल में उस अनाज की बहुतायत का चिन्ह माना जाता था। आज भी ईरानियों के बीच यह रिवाज है कि नौरोज़ से दस पंद्रह दिन पहले छोटे या बड़े प्यालों में विभिन्न अनाजों के बीज बोए जाते हैं ताकि नया साल आने के अवसर पर उसकी सब्ज़ी को हफ़्त सीन के नाम से विख्यात दस्तरख़ान पर रखा जाए।

 इस दस्तरख़ान पर सीन अक्षर से शुरू होने वाली सात चीज़ें रखी जाती हैं, जैसे सब्ज़ी, सिरका, सिक्का इत्यादि। इसके अलावा घरों के आंगन में भी फूलों के पौधे लगाए जाते हैं। खिले हुए फूलों और सब्ज़े से प्रकृति में परिवर्तन और वसंत ऋतु के आगमन का पता चलता है और साथ ही घर में प्रफुल्लता आती है।

नौरोज़ की विशेष मिठाइयों की तैयारी भी नए साल के संस्कारों में शामिल है। ईरान के कुछ क्षेत्रों में महिलाएं एक दूसरे की सहायता से नए साल के लिए विभिन्न प्रकार की मिठाइयां तैयार करती हैं। घर में तैयार की जाने वाली ये मिठाइयां बड़ी दक्षता से बनती हैं और इन्हें बड़ी सुंदरता से सजाया जाता है। इन्हीं मिठाइयों में से एक समनू नामक हलवा भी है जो हफ़्त सीन के दस्तरख़ान पर रखा जाता है। यह हलवा कई लोग मिल कर तैयार करते हैं और इसके लिए गेहूं की कोंपल का प्रयोग होता है। ईरानी परिवार, प्रायः नए साल की रात में विशेष व्यंजन तैयार करते हैं और पूरा परिवार एक साथ मिल कर बड़े अच्छे वातावरण में रात का खाना खाता है।

नौरोज़ की एक अन्य प्रथा, अपने मृतकों को याद करने की है। इसके लिए लोग क़ब्रिस्तानों में जाते हैं। वे अपने साथ तैयार खाने, खजूर या हलवा लेकर जाते हैं और दूसरों को खिलाते हैं। इस दिन लोग अपने मृतकों की क़ब्रों पर मोम बत्ती जलाते हैं, फ़ातेहा पढ़ते हैं और उनकी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। कुछ शहरों में लोग ईदे नौरोज़ से पहले, हाल ही में मरने वाले व्यक्ति के परिजन अपने निकटवर्ती लोगों को खाना और हलवा खिलाते हैं और मृतक की क़ब्र पर एकत्रित होते हैं। इस प्रकार वे यह दर्शाते हैं कि वे अपने मरने वालों को भूले नहीं हैं।

एक अन्य प्रथा ग़रीबों व दरिद्रों की सहायता करने की है। हर साल नववर्ष के अवसर पर लोग पूरे देश में सार्वजनिक रूप से ग़रीबों की सहायता का प्रयास करते हैं। ईरानी लोगों का विचार है कि हर किसी को अपनी क्षमता भर दूसरों की समस्याएं दूर करने और उनकी सहायता करने की कोशिश करनी चाहिए। नए साल के अवसर पर यह काम अधिक वांछित है और हर मुसलमान को ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए ग़रीबों की सहायता करनी चाहिए। लोग, सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठनों के माध्यम से सहायता करके ग़रीबों को भी ईदे नौरोज़ के अवसर पर प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं।