ट्रंप को अमेरिका की विफल नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहियेः ज़रीफ़
11 फरवरी की रैलियों में ईरानी जनता की भव्य उपस्थिति को देखकर ट्रंप ने जो ट्वीट संदेश दिया है उससे उनके क्रोध को भली-भांति देखा जा सकता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी प्रचार के दौरान और जनवरी 2017 में वाइट हाउस में प्रवेश करने के बाद ईरान के खिलाफ अपने प्रचारिक युद्ध में गति प्रदान कर दी और उनका लक्ष्य ईरान की इस्लामी व्यवस्था को कमज़ोर करना और उसे उखाड़ फेंकना है।
इसी प्रकार ट्रंप मई 2018 में एक पक्षीय रूप से ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते से निकल गये।
इससे उनका लक्ष्य आर्थिक दृष्टि से ईरान को कमज़ोर करना और अशांति व निर्धनता को उत्पन्न करना था परंतु इस्लामी गणतंत्र ईरान के मुकाबले में ट्रंप सरकार को बड़ी विफलता का सामना है और 11 फरवरी को इस्लामी क्रांति की सफलता की चालिसवीं वर्षगांठ के अवसर पर ईरानी जनता की भव्य रैलियों ने सिद्ध कर दिया कि वह यथावत इस्लामी क्रांति के मूल्यों की प्रबल समर्थक और उसके प्रति कटिबद्ध है।
इसी प्रकार ईरानी जनता ने अपनी भव्य रैलियों से दुश्मनों के समस्त षडयंत्रों पर पानी फेर दिया है।
11 फरवरी की रैलियों में ईरानी जनता की भव्य उपस्थिति को देखकर ट्रंप ने जो ट्वीट संदेश दिया है उससे उनके क्रोध को भली-भांति देखा जा सकता है। ट्रंप ने सोमवार की रात को अपने ट्वीट में एक बार फिर दावा किया कि ईरान आतंकवाद का समर्थन करता है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि ईरानियों को काफी समय से समस्याओं का सामना है और वे अच्छे भविष्य के पात्र हैं"
रोचक बात यह है कि ट्रंप ईरानी जनता से ऐसी स्थिति में सहानुभूति जता रहे हैं जब स्वयं उन्होंने पूरे इतिहास में ईरान के विरुद्ध सबसे कड़े प्रतिबंध लगाये हैं ताकि ईरान को घुटने टेकने पर बाध्य कर दें।
ईरानी जनता ने हालिया चार दशकों के दौरान यह सिद्ध कर दिया है कि वह न तो अमेरिकी दबावों और उसके झूठे प्रभावों से प्रभावित होगी और न ही ईरान की इस्लामी व्यवस्था के समर्थन से पीछे हटेगी।
अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने भी ईरानी राष्ट्र से अपनी दुश्मनी नहीं छिपाई और उन्होंने भी ईरान विरोधी दूसरे अमेरिकी राजनेताओं की तरह बयान दिया।
जॉन बोल्टन ने 22 बहमन की रैलियों में जनता की भारी उपस्थिति के बाद अपने ट्वीट संदेश में दावा किया कि चालिस साल के बाद भी इस्लामी गणतंत्र ईरान अपने नागरिकों के अधिकारों को पूरा नहीं कर सका है।"
अमेरिका यह कल्पना कर रहा है कि मनौवैज्ञानिक युद्ध करके और ईरान पर आर्थिक दबाव डालकर तेहरान को अपनी मांगों के सामने घुटने टेकने पर बाध्य कर देगा और इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ट्रंप ने ईरान के खिलाफ प्रतिंबधों में वृद्धि और उसे कड़ा कर दिया है ताकि इस तरह से ईरान में अशांति व अस्थिरता उत्पन्न कर सकें परंतु ईरानी जनता ने गत चालिस वर्षों से अपने साहसिक व अडिग प्रतिरोध से सिद्ध कर दिया है कि वर्चस्ववादियों विशेषकर अमेरिकी दुःस्वप्न कभी भी साकार नहीं होगा और ईरानी विदेशमंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ के उस ट्वीट संदेश को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा है कि चालिस वर्षों के ग़लत चयन के बाद अब समय आ गया है कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की विफल नीतियों की पुनरसमीक्षा करें। MM