अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच वार्ता क्यों विफल हो गयी?
अब वाशिंग्टन ने प्यूंगयांग की परमाणु क्षमता के संबंध में नया दृष्टिकोण अपना लिया है।
कोरिया प्रायद्वीप संकट उन समस्याओं में से एक है जिस पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने उस समय से ध्यान दिया है जबसे वह सत्ता में आये हैं।
ट्रंप ने आरंभ में कोरिया प्रायद्वीप के आस पास युद्धक जलपोत भेजकर उत्तर कोरिया को सैनिक हमले की धमकी देकर उसे डराने का प्रयास किया पंरतु जब इस धमकी का उत्तर कोरिया पर कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने उत्तर कोरिया के नेता के साथ राजनीतिक वार्ता आरंभ कर दी।
इस संबंध में ट्रंप का एक महत्वपूर्ण सुझाव उत्तर कोरिया के नेता के साथ सीधी बात चीत का था और किम जोंग ऊन और डोनाल्ड ट्रंप अब तक दो बार सीधी बात चीत कर चुके हैं। पहली बार जून 2018 में सिंगापुर में दोनों देशों के नेताओं के मध्य सीधी भेंटवार्ता हुई थी जबकि दूसरी बार वार्ता पिछले फरवरी महीने में वियतनाम की राजधानी हनोई में हुई।
यद्यपि पहली बार की भेंटवार्ता सफल रही थी परंतु दूसरी बार की वार्ता किसी परिणाम के बिना समाप्त हो गयी। यह वार्ता उस वक्त किसी परिणाम के बिना समाप्त हो गयी जब अमेरिका ने उत्तर कोरिया के खिलाफ लागू प्रतिबंधों को समाप्त करने से इंकार कर दिया।
उत्तर कोरिया ने बारमबार अमेरिका की यह कहकर आलोचना की है कि वाशिंग्टन उत्तर कोरिया के खिलाफ आर्थिक दबावों को जारी रखे हुए है जबकि उत्तर कोरिया ने अपने कुछ परमाणु और मिसाइल प्रतिष्ठानों को ध्वस्त भी कर दिया है।
यह ऐसी स्थिति में है जब वाशिंग्टन ने प्यूंगयांग की परमाणु क्षमता के संबंध में नया दृष्टिकोण अपना लिया है। उत्तर कोरिया के मामलों में अमेरिकी प्रतिनिधि स्टिफेन बियेगन ने कहा है कि वाशिंग्टन उत्तर कोरिया के क्रमशः परमाणु निरस्त्रीकरण का विरोधी है। उन्होंने बल देकर कहा है कि वाशिंग्टन इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु शस्त्रागार को क्रमशः नष्ट करे।
उत्तर कोरिया और अमेरिका के मध्य दो बार हो चुकी वार्ता के बाद उत्तर कोरिया के मामलों में अमेरिकी प्रतिनिधि ने प्यूंगयांग के साथ दोनों देशों के नेताओं के मध्य तीसरी बार की वार्ता को रद्द नहीं किया और कहा कि यह विषय डोनल्ड ट्रंप पर निर्भर है।
यद्यपि अमेरिका की उत्तर कोरिया से सबसे महत्वपूर्ण मांग यह है कि वह परमाणु निरस्त्रीकरण करे किन्तु प्यूंगयांग भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को समाप्त किये जाने, कोरिया प्रायद्वीप संकट को खत्म करने के लिए शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने और इस प्रायद्वीप से अमेरिकी सैनिकों के निष्कासन का इच्छुक है।
बहरहाल उत्तर कोरिया और अमेरिकी नेताओं के मध्य हनोई में होने वाली वार्ता ने दर्शा दिया है कि अमेरिकी जैसा सोचते हैं उत्तर कोरिया के नेता उतने भोले नहीं हैं कि वे अमेरिका के खोखले वादों पर विश्वास करके अपनी मांगों से पीछे हट जायेंगे। MM