Feb १०, २०१६ ०९:३० Asia/Kolkata

मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी के निधन को शताब्दियां बीत चुकी हैं, लेकिन आज भी दुनिया भर के विद्वान उनके विचारों से लाभ उठाते हैं।

मौलाना जलालुद्दीन मोहम्मद मौलवी के निधन को शताब्दियां बीत चुकी हैं, लेकिन आज भी दुनिया भर के विद्वान उनके विचारों से लाभ उठाते हैं। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं, मकातीब, फ़ीहे माफ़ीहे, मजालिसे सबआ, दीवाने कबीर और मसनवी मानवी। इन किताबों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। बड़ी संख्या में लोग उनकी शायरी के दीवाने हैं। दीवाने कबीर उनकी महत्वपूर्ण रचना है। मौलवी के विचारों के अध्ययन के लिए यह किताब महत्वपूर्ण है।

 

 

दीवाने कबीर, दीवाने शम्स के नाम से भी प्रसिद्ध है, इसमें ग़ज़लों और रुबाइयों समेत 36 हज़ार शेर हैं। इस किताब के दीवाने शम्स तबरेज़ी के नाम से मशहूर होने का कारण यह है कि मौलवी ने शम्स से मुलाक़ात से पहले शायरी शुरू नहीं की थी। मौलवी ने अपनी समस्त कविताएं जो 70 हज़ार शेरों पर आधारित हैं, अपनी आयु के अंतिम दौर और शम्स से परिचित होने और उससे जुदा होने के बाद लिखी हैं। अधिकांश कविताओं में मौलवी ने शम्स तबरेज़ी को याद किया है। ईरान के समकालीन बुद्धिजीवी शफ़ीई कदकनी का मानना है कि मौलवी का दीवाने कबीर मौलाना की ग़ज़लों पर आधारित है।

निःसंदेह फ़ार्सी साहित्य, इस्लामी संस्कृति और उससे बढ़कर पूर्ण मानवीय संस्कृति में दीवाने शम्स की तरह जीवन का जोश और प्रेम की लहरे नहीं उठती हैं। अगर हम शायरी को भावनाओं और विचारों से मिलकर बनने वाली रचना मानेंगे तो भावना, विचार, भाषा और संगीत इसके तत्व होंगे। मौलवी की ग़ज़लों में यह समस्त तत्व अपनी उत्कृष्टता के साथ पाये जाते हैं।

 

 

समस्त आलोचकों और अध्ययनकर्ताओं की दृष्टि में शायरी, शायर के विचारों का प्रतिबिंब है। ब्रह्माण्ड के बारे में शायर की पहचान और जानकारी जितनी अधिक होगी, उतनी ही उसकी शायरी में गहराई होगी। मौलवी की शायरी में भावना बहुत व्यापक है, जैसा कि शफ़ीई कदकनी ने कहा है कि उनके विचारों की व्यापकता ब्रह्माण्ड की व्यापकता की जितनी है और उनकी शायरी में तुच्छ और कम अहमियत के विषयों के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका कारण यह है कि मौलवी को बौद्धिक एवं मानवीय विषयों में पूर्ण दक्षता प्राप्त थी, इसी प्रकार वे आध्यात्मिक विषयों में उत्कृष्टता के शिखर पर पहुंच गए थे। मौलवी ने अपने इस ज्ञान के आधार पर संसार में एक इंसान के रूप में अनुभव किया और अपने इर्दगिर्द की दुनिया का बहुत ही व्यापक दृष्टिकोण से अध्ययन किया। ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का आरम्भ और अंत, ब्रह्माण्ड और ईश्वर का संबंध, एकेश्वरवाद और अंततः इंसान और प्रेम, आज़ादी, उत्कृष्टता जैसी उससे संबंधित गुण और इंसान के ईश्वर से निकट होने के मार्ग कुछ ऐसी विशेषताए हैं जो मौलवी की ग़ज़लों में व्याप्त हैं।

मौलवी की ग़ज़लों का एक मूल तत्व, इंसान का मूल वतन है। मौलवी ने अपनी अधिकांश ग़ज़लों में इस बिंदु की ओर संकेत किया है और इस वतन की ओर इंसान की वापसी के लगाव का उल्लेख किया है। ऐसा वतन जो निश्चित रूप से यह दुनिया नहीं है, बल्कि उस तक पहुंचने के लिए काफ़ी प्रयास की ज़रूरत है। मौलवी के विचार इतने अधिक विस्तृत हैं कि उनमें लोक एवं परलोक को आपस में जोड़ दिया गया है और इस प्रकार वे ब्रह्माण्ड जितनी व्यापक तस्वीर पेश करते हैं। उनकी शायरी के अधिकांश आलोचकों ने इस तस्वीर को नवीन और विशिष्ट क़रार दिया है। मौलवी सुन्दरता को महानता और व्यापकता में खोजते हैं और उसके उल्लेख के लिए पुरानी एवं नई उपमाओं का सहारा लेते हैं और विशिष्ट चित्र गढ़ते हैं। मौलवी अपने विचारों की व्याख्या के लिए नई सत्वीरें बनाने के अलावा, अपने पूर्ववर्तियों की तस्वीरों से भी लाभ उठाते हैं, लेकिन नए अर्थ के साथ।

 

 

इस संदर्भ में डा. कदकनी कहते हैं कि इन तस्वीरों में वे नई जान और रूह फूंक देते हैं। नरगिस जो फ़ार्सी शायरी में आँखों का प्रतीक है, या वाइलेट, जो दुख और शोक का प्रतीक है, मौलवी की शायरी में एक नए अर्थ में है। इस प्रकार से कि पाठक को आभास नहीं होता कि यह वही नरगिस और वाइलेट हैं जो रूदकी, फ़र्ख़ी और मनूचेहरी की शायरी में थे। यह तस्वीरें अगर उन कवियों की शायरी में परलोक के रंग में रंगी हुई थीं तो मौलवी ने इन्हें आत्मिक्ता प्रदान की। मौलवी जिस नरगिस या वाइलेट को चित्रित करते हैं उसमें इंसान के जीवन के समस्त आयाम अपनी पूरी व्यापकता के साथ पाये जाते हैं।

मौलवी की अधिकांश ग़ज़ले उनके सफल जीवन का उदाहरण हैं। मौलवी ने अपनी शायरी में अपने अनुभवों का उल्लेख किया है। यह शायरी यद्यपि संगीत, भाषा और चित्रण जैसे तत्वों की दृष्टि से विविध है, लेकिन आंतरिक स्वरूप की दृष्टि से इसमें एकता और व्यवस्था पायी जाती है। इस एकता का स्रोत, मौलवी की वैचारिक शैली और नज़र की गहराई है।

समकालीन शोधकर्ता उस्ताद बदीउज्ज़माँ फ़रूज़ान्फ़र मौलवी की शायरी की शैली के बारे में कहते हैं, वास्तविक शायरी वह है जो पढ़ने और सुनने वाले को प्रभावित करे और पाठक को शायरी की दुनिया में ले जाए। मौलवी की शायरी में निश्चित रूप से और व्यापकता से यह विशेषता पायी जाती है। दूसरे शब्दों में हमारा कोई दूसरा कवि इस हद तक पाठक में परमानंद और उत्साह उत्पन्न नहीं करता है, जितना मौलवी ने किया है।

 

 

उस्ताद फ़रूज़ान्फ़र के मुताबिक़, मौलवी की शायरी की सफलता एक कारण और वास्तव में मौलवी की ग़ज़लों की विशिष्टता, उसमें विभिन्न प्रकार के तालमेल का होना है। संगीत के बारे में मौलवी के ज्ञान ने वास्तव में उन्हें यह पूंजी प्रदान की है। उनके शेरों में अन्य कवियों की तुलना में विविधतापूर्ण तालमेल पाया जाता है, बल्कि उनकी शायरी में एक प्राकृतिक संगीत पाया जाता है।

मौलवी की शायरी में तालमेल और शायरी के प्रचलित तत्वों द्वारा एक प्रकार का संगीत पाया जाता है। इसी प्रकार, कवि के परमानंद और उत्साह के कारण, शायरी के आतंरिक स्वरूप में भी एक संगीत मौजूद है। डा. सीरूस शमीसा के अनुसार, मौलवी की ग़ज़लों में संगीत की दृष्टि से बहुत अधिक आनंद है और यह विशेषता अन्य कवियों में या नहीं है या बहुत कम है। अनेक अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक़, यहां तक कि अगर मौलवी अपने विचारों और भावनाओं को पारम्परिक शायरी के रूप में बयान भी नहीं करते तो उनके व्यक्तित्व में पाए जाने वाले संगीत के कारण उनकी शायरी में विशेष उत्साह और जोश पाया जाता।

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