ईरान की सांस्कृतिक धरोहर-38
ईरान में बुनी जाने वाली चीज़ों में एक गब्बे भी हैं।
ईरान में बुनी जाने वाली चीज़ों में एक गब्बे भी हैं। गब्बे अर्थात छोटा क़ालीन या क़ालीन का छोटा टुकड़ा। ईरान के इतिहास में पहली बार गब्बे का नाम उस समय सुना गया जब तहमास्ब सफ़वी राजा ने मुग़ल राजा हुमायूं का जो सोलहवीं शताब्दी में ईरान आया था, स्वागत किया। हुमायूं ने अपने दरबारियों के षड्यंत्रों और विश्वासघात के कारण ईरान में शरण ली। तहमास्ब सफ़वी ने उसे ईरान में शरण दी और उसने उसका तथा उसके परिजन का अद्वितीय स्वागत किया।

इस समारोह की ज़िम्मेदारी मुहम्मद ख़ान अशरफ़ ओग़ली पर थी जिन्होंने सोने के तारों से बुने हुए क़ालीनों, विशेष प्रकार के नमदे, गब्बे व बड़े बड़े कालीनों को हाल में बिछाने का आदेश दिया और मुग़ल राजा हुमायूं को बहुत ही सम्मान के साथ दरबार में लाए और उनको शरण दी।
गब्बे ऐसे क़ालीन को कहा जाता है जिसे अधिकतर लुर व क़शक़ाई क़बीले के लोग बुनते हैं। गब्बे का आकार छोटा होता है। गब्बे के रोएं उंचे और उठे हुए होते हैं और इनकी बुनाई में बहुत अधिक ताने बाने का प्रयोग किया जाता है जो गब्बे को नर्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कभी कभी किसी गब्बे में ताने बाने की संख्या तीन से आठ तक पहुंच जाती है जबकि उसके रोएं की ऊंचाई कभी कभी एक सेन्टीमीटर तक पहुंच जाती है।
गब्बे चूंकि काफ़ी मोटा क़ालीन होता है इसलिए ज़मीन की सीलन या ठंडक ऊपर तक पहुंचने नहीं देता और आरंभ में इसे क़बीले और बंजारे प्रयोग करते थे। वर्षों पहले तक गब्बे बहुत ही साधारण और बिना किसी डिज़ाइन के बुना जाता था और उसके बुनने वाले अधिकतर पर्यावरण या प्राकृतिक वातावरण से प्रभावित होकर उसकी बुनाई करते थे और अपने मन में उभरी डिज़ाइनों को गब्बे पर उतार देते थे। यही कारण है कि गब्बे मुख्य रूप से हाथों से ही बुना जाता है और उसकी बुनाई में जो डिज़ाइन प्रयोग किए जाते हैं वह उसे अन्य बुनकरों की डिज़ाइनों से अलग करते हैं।

उसके बाद गब्बे का बज़ार में बहुत अधिक स्वागत किया जाता और उसके बहुत अधिक ख़रीदार होते थे। यहां तक कि प्राचीन और मन में उभरी डिज़ाइनों का स्थान नई डिज़ाइनों ने ले लिया।
गब्बे की डिज़ाइन बुनकर की स्थिति को बयान करने वाली होती है। इसमें लैला मजनू, शीरीं फ़रहाद की कहानियां, बर्फ़ व बारिश, आग, पानी, सूरज और पलायन तथा प्रेम और घोड़े के चित्र को बहुत ही सुन्दर ढंग से उकेरा जाता है। गब्बे की डिज़ाइनें दोहराई नहीं जातीं और शहरी डिज़ाइनरों की डिज़ाइनों के विपरीत, प्रत्यक्ष रूप से प्रकृति से प्रेरित होती हैं। गब्बे की डिज़ाइनें और उनकी विशेषताओं को केवल और केवल क़बाईली बंजारो जीवन शैली से निर्धारित किया जाता है और यह गब्बे की असली होने का सबसे प्रमाण है।
गब्बे पर डिज़ाइन बनाना या उसमें रंगों को मिश्रित करना, क़ालीनों या छोटे क़ालीनों पर डिज़ाइन बनाने और उसमें रंग मिश्रित करने से भिन्न है, इसके लिए विशेष क़ानून और परंपराएं हैं। गब्बे के बुनकर डिज़ाइन बनाने में पूर्ण स्वतंत्र होने के कारण उनके हाथ क़ालीन के बुनकरों से भी अधिक खुले होते हैं। गब्बे की अधिकतर डिज़ाइनें ज्योमितीय डिज़ाइनों की स्वामी होती हैं। चूंकि इन क़ालीनों में एक या दो किनारे, एक साधारण व ज्योमितीय रूप को दोहराया जाता है, इसीलिए इसकी डिज़ाइनें सबसे अलग होती हैं। लाइनों को साधारण करना और लाइनों को ज्योमितीय रूप में ढालना, ईरान में गब्बे की बुनाई की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं जो समय बीतने के साथ अपने नये रूप में हमारे सामने है।

कोहकिलोये व बुवैर अहमद तथा बुशहर प्रांतों के मुख्य हस्त उद्योग और घर में बनने वाली वस्तुओं में गब्बे की बुनाई है जो चार महाल बख़्तियारी और फ़ार्स के कुछ भागों में भी प्रचलित है। इन प्रांतों के बहुत से शहरों और क्षेत्रों व गांवों में अधिकतर ग्रामवासियों का पहला काम या बहुत से दूसरे ग्रामियों का दूसरा काम गब्बे की बुनाई समझा जाता है।
गब्बे ईरान के दक्षिणी प्रांत बूशहर का सबसे प्रसिद्ध हस्त उद्योग है। इस क्षेत्र में प्रचलित अधिकतर डिज़ाइनें प्रकृति और बुनकरों के जीवन से प्रेरित होती हैं। भेड़ बकरियों, चिड़ियों और वृक्ष जैसी डिज़ाइनें तथा ज्योमितीय डिज़ाइनों को क़ालीन और गब्बे पर देखा जा सकता है। इन क्षेत्रों में बनने वाले गब्बे अधिकतर यूरोपीय देशों में निर्यात होते हैं।
बख़्तियारी लोग या बख़्तियारी लुर या ईल बख़्तियारी, ईरान के मूल नागरिक समझे जाते हैं जो ईरान के दक्षिण पश्चिम में चार महाल व बख़्तियारी, ख़ोज़िस्तान, लुरिस्तान, कोहगिलोए व बुएर अहमद तथा इस्फ़हान में रहते हैं। यह लोग प्रकृति के बीच जीवन व्यतीत करते हैं और अपनी बुनकरी की कला में इन्हीं प्रकृतिक दृश्यों से प्रेरणा लेते हैं। इल के लोगों की कला, उनकी दिनचर्या, आस्थाओं, विश्वासों, संस्कारों व रीति रिवाजों को बयान करने वाली होती हैं।
बख़्तियारी गब्बों की बनावट समान होती है और इसको बड़ा बनाया जाता है। उसके ताने बाने रूई से तैयार किए जाते हैं और यही कारण है कि ईरानी बाज़ारों में इन गब्बों को रूई के गब्बे के नाम से जाना जाता है। इल में प्रयोग होने वाली कुछ डिज़ाइनें इस प्रकार हैः सूर्य जो आर्य जातियों कें मध्य सौभाग्य, जीवन व प्रकाश और आकाश में उसके स्थान का प्रतीतक है, गुले हश्त पुर जो प्राचीन काल से ही इसी नाम से बिना परिवर्तन के बाक़ी है और चीड़ का वृक्ष जो प्रतीक और जीवन के वृक्ष के रूप में प्रसिद्ध रही है।

ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में बनने वाले गब्बों का धरातल अधिकतर सफ़ेद, क्रीम या दूधिया जैसे रंगों से बने होते है और इसमें बनी डिज़ाइनें काले, भूरे और मेहदी रंग की होती हैं। गब्बों को भी क़ालीन की भांति ही बुना जाता है और बुनकर उस पर डिज़ाइनों को उभारने के लिए नक़्शे का प्रयोग करते हैं। बुनकर इस काम में अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हैं और उनमें से अधिकतर के मन मे एक या दो डिज़ाइनें होती हैं जिसकी बुनाई में दक्षता की आवश्यकता होती है।
गब्बे की सुरक्षा के लिए यद्यपि बहुत ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है जिसके कारण यह काफ़ी समय तक रहता है और मूल्यवान भी होता है। कीड़े मकोड़े, दीमक, काकरोच और चूहे इसके लिए बहुत ही घातक होते हैं और इनसे मुक़ाबले के लिए इसको धोते समय या रखते समय रासायनिक पदार्थों और ज़हरीली दवाओं का छिड़काव करना चाहिए और कई स्थानों पर गब्बे के रखने के स्थान पर तंबाकू या कीटनाशक दवाएं रखी जाती हैं। इसी प्रकार गब्बे को अंधेरे या सीलन की जगह पर नहीं रखना चाहिए और उस स्थान पर नहीं रखना चाहिए जहां सीधे सूरज का प्रकाश पड़े। बेहतर है कि गब्बे को हर प्रकार की सीलन या नमी से बचाने के लिए उसके नीचे एक मुकेट बिछाना चाहिए ताकि उसके निचले भाग में हवा का आवागमन होता रहे।