Sep १५, २०२५ १७:४५ Asia/Kolkata
  • क़ुरआन ईश्वरीय चमत्कार-1020

सूरए सफ़ आयतें 7 से 14

आइए सबसे पहले सूरए सफ़ की आयत संख्या 7 से 9 तक की तिलावत सुनते हैं:

 

وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُوَ يُدْعَى إِلَى الْإِسْلَامِ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ (7) يُرِيدُونَ لِيُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَاللَّهُ مُتِمُّ نُورِهِ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ (8) هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَى وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ (9)  

इन आयतों का अनुवाद है: 

- उस व्यक्ति से बड़ा अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह पर झूठा इलज़ाम लगाए, जबकि उसे इस्लाम की दावत दी जा रही हो? अल्लाह अत्याचारी लोगों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता। [61:7]  वे (काफ़िर) चाहते हैं कि अल्लाह के प्रकाश को अपने मुँह से बुझा दें, लेकिन अल्लाह अपने प्रकाश को पूरा करके रहेगा, भले ही काफ़िरों को यह पसंद न हो। [61:8]  वही अल्लाह है जिसने अपने रसूल (पैगंबर) को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा, ताकि उसे सभी धर्मों पर प्रभुत्व प्रदान करे, भले ही मुशरिकों को यह पसंद न हो। [61:9]

पिछले कार्यक्रम में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के उस वचन की चर्चा हुई थी जिसमें उन्होंने अपने बाद आने वाले पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद की खुशख़बरी दी थी। ये आयतें बताती हैं कि कुछ अहले-किताब (यहूदी व ईसाई) जब हज़रत मुहम्मद सलामुल्लाह अलैह द्वारा इस्लाम की दावत दी जा रही थी, तो वे अल्लाह पर झूठे इलज़ाम लगाते थे और कहते थे कि अल्लाह ने तुम्हें पैग़म्बर नहीं बनाया। इस तरह उन्होंने खुद को अल्लाह की हिदायत से वंचित कर लिया और अपने ऊपर ज़ुल्म किया। 

वे समझते थे कि अल्लाह का नूर मोमबत्ती की लौ की तरह है, जिसे फूँक मारकर बुझाया जा सकता है। लेकिन अल्लाह ने चाहा कि वह इस्लाम के पैग़म्बर के ज़रिए अपने हिदायत के नूर को सूरज की तरह पूरी दुनिया में फैला दे और इस्लाम को सभी धर्मों और विचारधाराओं पर प्रभुत्व दिलाए। यह स्पष्ट है कि कोई भी अल्लाह की मर्ज़ी को रोक नहीं सकता। 

इतिहास गवाह है कि पिछले 1400 सालों में, दुश्मनों द्वारा खड़ी की गई सभी रुकावटों के बावजूद, इस्लाम का प्रसार होता रहा है और पूरब से लेकर पश्चिम तक मुसलमानों की आबादी बढ़ती जा रही है। 

इन आयतों से हमने सीखा: 

 मानवता पर सबसे बड़ा ज़ुल्म यह है कि लोगों तक अल्लाह के स्पष्ट संदेश को पहुँचने से रोका जाए और पैग़म्बरों की शिक्षाओं को समाज में लागू होने से रोका जाए। 

 क़ुरआन के अनुसार, दीन नूर है, यानी पहचानने, रास्ता पाने, विकास करने और आगे बढ़ने का साधन। 

  दीन के दुश्मन हमेशा हिदायत की रोशनी को बुझाने की कोशिश करते हैं और इसके लिए हर हथकंडा अपनाते हैं। 

 सभी विचारधाराओं में केवल इस्लाम ही सदाबहार है और उसका दूसरे मतों पर प्रभुत्व उसकी सच्चाई के कारण है। 

 निस्संदेह, हक़ का बातिल पर विजय पाना अल्लाह की मर्ज़ी है, और यह मर्ज़ी काफ़िरों और मुशरिकों की इच्छा पर भारी पड़ती है। 

आइए अब सूरए सफ़ की आयत संख्या 10 से 13 तक की तिलावत सुनते हैं: 

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَى تِجَارَةٍ تُنْجِيكُمْ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ (10) تُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَتُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ بِأَمْوَالِكُمْ وَأَنْفُسِكُمْ ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (11) يَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَيُدْخِلْكُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ وَمَسَاكِنَ طَيِّبَةً فِي جَنَّاتِ عَدْنٍ ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (12) وَأُخْرَى تُحِبُّونَهَا نَصْرٌ مِنَ اللَّهِ وَفَتْحٌ قَرِيبٌ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ (13)

इन आयतों का अनुवाद है: 

ऐ ईमान वालो! क्या मैं तुम्हें एक ऐसा सौदा बताऊँ जो तुम्हें दर्दनाक अज़ाब (क़यामत के दिन) से बचा ले?  [61:10] अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और अल्लाह के रास्ते में अपने धन और जान से जिहाद करो। यही तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम समझो। [61:11] (अगर तुम ऐसा करोगे तो) अल्लाह तुम्हारे गुनाह माफ़ करेगा और तुम्हें ऐसे बाग़ों (जन्नत) में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बहती हैं और पाक-साफ़, ख़ूबसूरत घरों में जो हमेशा रहने वाले बाग़ों (जन्नत-ए-अदन) में हैं। यही बड़ी कामयाबी है।  [61:12]  और एक और नेमत जिसे तुम पसंद करोगे—अल्लाह की मदद और जल्द ही फ़तह (विजय)। ऐ पैग़म्बर! ईमान वालों को यह खुशखबरी सुना दो। [61:13]  

पिछली आयतों में इस्लाम के ख़िलाफ़ दुश्मनों की साज़िशों का ज़िक्र था। ये आयतें मोमिनों को दुश्मनों के मुक़ाबले में अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए प्रेरित करती हैं और कहती हैं: तुम जो ईमान का दावा करते हो और ख़ुद को रसूले ख़ुदा का अनुयायी कहते हो, अल्लाह के दीन की हिफ़ाज़त के लिए जिहाद करो और इस राह में माल और जान क़ुर्बान करने से पीछे न हटो। जान लो कि जो कुछ तुम इस राह में खर्च करोगे, अल्लाह उसका ख़रीदार है और वह सबसे बेहतरीन क़ीमत पर ख़रीदेगा। 

अगर दुश्मन इस्लाम और मुसलमानों को ख़त्म करने के लिए हर हथकंडा अपना रहा है, तो तुम भी उनका मुक़ाबला करने के लिए अपनी सारी क्षमता लगा दो और समझ लो कि तुम्हारी दुनिया और आख़ेरत तुम्हारी मेहनत और जिहाद पर निर्भर है। अगर तुम अपना फ़र्ज़ अदा करोगे, तो दुनिया में अल्लाह की मदद से फ़तह पाओगे और आख़ेरत में अल्लाह की रहमत और मग़फ़ेरत के हक़दार बनोगे, जहन्नम से नजात पाओगे और हमेशा रहने वाली, नेमतों भरी जन्नत में जगह पाओगे। 

इन आयतों से हमने सीखा: 

 व्यापार सिर्फ़ दुनियावी चीज़ों तक सीमित नहीं है। अल्लाह के साथ किया गया सौदा और उसके रसूलों का अनुसरण एक लाभदायक व्यापार है जो दुनिया और आख़ेरत दोनों में फ़ायदा पहुँचाता है। 

 मोमिन को न सिर्फ़ अपने दीन की हिफ़ाज़त करनी चाहिए, बल्कि दुश्मनों की साज़िशों के ख़िलाफ़ माल और जान क़ुर्बान करने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

 अल्लाह के रास्ते में लड़ने वाले दो में से एक नेमत पाते हैं—या तो शहीद होकर हमेशा की जन्नत में पहुँच जाते हैं (जो बड़ी कामयाबी है) या फिर अल्लाह की मदद से दुश्मन पर विजय पाते हैं (वो भी एक बड़ी सफलता है)। 

ईमान वाले के लिए दीन की हिफ़ाज़त माल और जान से ज़्यादा अहम है, इसलिए वह उन्हें अल्लाह के रास्ते में क़ुर्बान करने को तैयार रहता है। 

आइए अब सूरए सफ़ की आयत संख्या 14 की तिलावत सुनते हैं:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا كُونُوا أَنْصَارَ اللَّهِ كَمَا قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ لِلْحَوَارِيِّينَ مَنْ أَنْصَارِي إِلَى اللَّهِ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ نَحْنُ أَنْصَارُ اللَّهِ فَآَمَنَتْ طَائِفَةٌ مِنْ بَنِي إِسْرَائِيلَ وَكَفَرَتْ طَائِفَةٌ فَأَيَّدْنَا الَّذِينَ آَمَنُوا عَلَى عَدُوِّهِمْ فَأَصْبَحُوا ظَاهِرِينَ (14)

इस आयत का अनुवाद हैः

ऐ ईमान वालो! तुम अल्लाह (के दीन) के मददगार बनो, जैसे हज़रत ईसा बिन मरयम ने (अपने खास साथियों) हवारियों से कहा: 'अल्लाह के रास्ते में मेरे सहायक कौन हैं?' हवारियों ने जवाब दिया: 'हम अल्लाह (के दीन) के मददगार हैं।' तो बनी इस्राईल में से एक गिरोह ईमान लाया और एक गिरोह ने कुफ़्र किया। तो हमने ईमान वालों को उनके दुश्मनों पर मदद दी, और वही विजयी हुए। [61:14]

पिछली आयतों में मोमिनों को अल्लाह के रास्ते में जिहाद करने का निमंत्रण दिया गया था। यह आयत कहती है: हमेशा और हर हाल में अल्लाह के मददगार बनो। ज़ाहिर है कि अल्लाह को हमारी मदद की ज़रूरत नहीं है, यहाँ मददगार बनने का मतलब अल्लाह के दीन, उसके पैग़म्बरों और औलिया की मदद करना है। 

अल्लाह के दीन की मदद करने के दो पहलू हैं: 

1. इस्लाम को दुनिया में फैलाने के लिए प्रचार और मीडिया जैसे साधनों का इस्तेमाल करना। 

2. इस्लाम के दुश्मनों की साज़िशों को पहचानना और उनका सोच-समझकर मुक़ाबला करना। 

आयत आगे अल्लाह के दीन की मदद का एक उदाहरण देती है: हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने हवारियों (यानी 12 शिष्यों) से मदद माँगी, और उन्होंने आमादगी जताई। हालाँकि, बाद में कुछ ने हज़रत ईसा की मदद करना छोड़ दिया और उनके दुश्मनों का साथ देने लगे। लेकिन अल्लाह ने ईमान वालों को उनके दुश्मनों पर विजय दिलाई। 

इस आयत से हमने सीखा: 

सिर्फ़ ईमान रखना और उसे बचाए रखना काफ़ी नहीं है, बल्कि अल्लाह के दीन को दुनिया में फैलाने के लिए मेहनत करनी चाहिए। 

अगर हम अल्लाह के दीन की मदद करेंगे, तो अल्लाह भी हमारी मदद करेगा और हम दुश्मनों पर विजय पाएँगे। 

दोस्तो इसी के साथ